समृद्ध और बेमिसाल प्राकृतिक विरासत को बचाने की पहल, लद्दाख में देश का पहला ब्लैक नेक्ड क्रेन फेस्टिवल होगा
श्रीनगर, 31 जुलाई (आईएएनएस)। लद्दाख इलाके की समृद्ध और बेमिसाल प्राकृतिक विरासत को बचाने और सुरक्षित रखने की प्रशासन की कोशिशों के तहत लेफ्टिनेंट गवर्नर विनय कुमार सक्सेना ने शुक्रवार को केंद्र शासित प्रदेश में 11 अगस्त से 14 अगस्त तक देश के पहले ब्लैक-नेक्ड क्रेन फेस्टिवल की घोषणा की।
लेफ्टिनेंट गवर्नर सक्सेना ने शुक्रवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट में कहा, “देश का पहला ब्लैक-नेक्ड क्रेन फेस्टिवल लद्दाख की बेमिसाल प्राकृतिक विरासत और वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन के लिए हमारे मिलकर किए गए वादे का जश्न है। 11-14 अगस्त 2026 तक दुनिया के इकलौते अल्पाइन क्रेन की सुरक्षा के लिए समर्पित, कंजर्वेशन, कल्चर, बर्डवॉचिंग और कम्युनिटी एंगेजमेंट की एक अनोखी यात्रा के लिए लेह, त्सो कार और हानले में हमारे साथ जुड़ें।”
उन्होंने कहा, “आइए, हम सब मिलकर इन पवित्र पंखों की रक्षा करें और आने वाली पीढ़ियों के लिए लद्दाख के पुराने इकोसिस्टम को बचाएं।”
ब्लैक-नेक्ड क्रेन लद्दाख से बहुत जुड़ा हुआ है क्योंकि यह इसका स्टेट बर्ड है, गर्मियों में ब्रीडिंग के लिए आने वाला एक आइकॉनिक विजिटर और लोकल कल्चर में गुड लक का पवित्र सिंबल है।
लद्दाख भारत का अकेला ऐसा इलाका है जहां ये दुर्लभ पक्षी सफलतापूर्वक ब्रीडिंग करते हैं। ये मार्च और अप्रैल में लद्दाख आते हैं ताकि चांगथांग इलाके के त्सो कार, त्सो मोरीरी और हानले जैसे ऊंचे दलदल, वेटलैंड और झीलों में ब्रीडिंग कर सकें।
ये पक्षी शिकारियों से अंडों को बचाने के लिए कम गहरे वेटलैंड पानी (लगभग 30 सेमी गहरे) में अपने घोंसले बनाते हैं। इस रेयर पक्षी स्पीशीज को जंगली कुत्तों की वजह से एनवायरनमेंट पर पड़ने वाले दबाव, जानवरों के ज्यादा चरने और ब्रीडिंग के महीनों में टूरिस्ट की रुकावटों की वजह से खतरा होता है।
ज्यादातर लोग इन पक्षियों को ‘चा थुंग-थुंग’ कहते हैं। इन्हें खुशहाली और अच्छी किस्मत का पवित्र संकेत माना जाता है। लोककथाओं के अनुसार, इन पक्षियों का जोड़ा देखना लकी माना जाता है।
उनके शानदार कोर्टशिप और मेटिंग डांस ने सीधे तौर पर 'चार्टसेस' डांस जैसे पारंपरिक लद्दाखी लोक परफॉर्मेंस को प्रेरित किया है।
इन पक्षियों और उन्हें बचाने की कोशिशों को लद्दाख के खास ब्लैक-नेक्ड क्रेन फेस्टिवल जैसी क्षेत्रीय पहलों के जरिए मनाया जाता है, ताकि उनके नाज़ुक घोंसले बनाने की जगहों को बचाने के लिए जागरूकता बढ़ाई जा सके।
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Created On :   31 July 2026 4:03 PM IST












