पाकिस्तान में जबरन धर्म परिवर्तन और हिंसा के बढ़ते मामले, मानवाधिकार संस्था ने जताई चिंता

इस्लामाबाद, 6 नवंबर (आईएएनएस)। अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए काम करने वाले एक प्रमुख संगठन 'वॉयस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी' (वीओपीएम) ने शुक्रवार को पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के खिलाफ जारी उत्पीड़न पर गंभीर चिंता जताई। संगठन ने 2026 की पहली छमाही के दौरान ईशनिंदा (ब्लासफेमी) के आरोपों, लक्षित हिंसा और कथित जबरन धर्म परिवर्तन के मामलों का हवाला दिया।
वीओपीएम ने कहा कि 'यूएस कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम' (यूएससीआईआरएफ) की ओर से दर्ज मामलों से यह साफ होता है कि भेदभावपूर्ण कानूनों, कमजोर जवाबदेही व्यवस्था और पर्याप्त सरकारी सुरक्षा की कमी का लोगों और उनके परिवारों पर कितना गहरा असर पड़ता है। संगठन का कहना है कि इन पीड़ितों की समस्याओं का समाधान केवल सरकारी आश्वासनों से नहीं होगा।
संगठन ने तीन नाबालिग लड़कियों के अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और शादी के मामलों का उल्लेख किया। वीओपीएम के अनुसार, ऐसे मामले सहमति, बच्चों की सुरक्षा और न्याय तक पहुंच को लेकर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, एक अदालत ने मारिया की शादी को वैध माना। मारिया को एक 12 वर्षीय ईसाई लड़की बताया गया है, जबकि जिस व्यक्ति पर उसके अपहरण का आरोप था, उसकी उम्र 30 वर्ष बताई गई। वहीं, नेहा के परिवार का आरोप है कि एक व्यक्ति ने उसे सिलाई केंद्र से अगवा किया और जबरन धर्म परिवर्तन कराया। परिवार का यह भी कहना है कि पुलिस ने शुरू में कार्रवाई करने में देरी की।
इसी तरह सोनिया के परिवार ने भी अपहरण और जबरन धर्म परिवर्तन का आरोप लगाया। रिपोर्ट में कहा गया कि एक जन्म प्रमाण पत्र में सोनिया की उम्र 15 वर्ष बताई गई थी, लेकिन उसके कथित अपहरणकर्ताओं का दावा था कि उसकी उम्र 20 वर्ष है।
वीओपीएम ने कहा कि ऐसे मामलों की तुरंत और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, उम्र से जुड़े दस्तावेजों का निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाना चाहिए और लड़कियों की बात बिना किसी दबाव के सुनी जानी चाहिए।
संगठन ने ईसाई नर्सों नविश अरूज और मरयम लाल के मामले का भी जिक्र किया। वीओपीएम के अनुसार, यह मामला दिखाता है कि किसी पर लगा आरोप अदालत के फैसले से पहले ही उसकी जिंदगी को किस तरह प्रभावित कर सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया कि अप्रैल 2021 में दोनों नर्सों को एक सहकर्मी द्वारा इस्लामी धार्मिक लेख वाले एक स्टिकर का अपमान करने के आरोप के बाद गिरफ्तार किया गया था। दोनों महिलाओं ने पांच महीने हिरासत में बिताए और बाद में उन्हें छिपकर रहना पड़ा।
फरवरी 2026 में अदालत ने गवाहों के बयानों में विरोधाभास और पर्याप्त विश्वसनीय सबूतों की कमी को देखते हुए दोनों को बरी कर दिया। हालांकि, वीओपीएम का कहना है कि यह फैसला महत्वपूर्ण था, लेकिन इससे उन वर्षों की असुरक्षा और मुश्किलों को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता।
संगठन ने कहा कि पाकिस्तान के ईसाई सांसद फाल्बूस क्रिस्टोफर की ओर से जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ प्रस्तावित कानून सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम हो सकता है। लेकिन केवल कानून बना देना काफी नहीं है, जब तक पुलिस, अदालतें और सरकारी अधिकारी उसे निष्पक्ष तरीके से लागू न करें।
वीओपीएम ने कहा, "पाकिस्तान के धार्मिक अल्पसंख्यकों को लंबे समय तक पीड़ा सहने के बाद मिलने वाली बरी होने की राहत या किसी हमले के बाद किए गए वादों से ज्यादा की जरूरत है। उन्हें ऐसे संस्थानों की जरूरत है जो अत्याचार को रोकें, तुरंत कार्रवाई करें और न्याय दिलाएं। उनकी सुरक्षा कोई एहसान नहीं, बल्कि राज्य की जिम्मेदारी है।"
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