वन अधिकार अधिनियम के तहत 54 लाख दावों में से 25 लाख को मिली मान्यता, 11 लाख अभी लंबित

कोलकाता, 10 अक्टूबर (आईएएनएस)। अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकार मान्यता) अधिनियम, 2006 (एफआरए) के तहत 31 अगस्त तक प्राप्त 54 लाख दावों में से 25 लाख उपाधियां वितरित की जा चुकी हैं। इस संबंध में एक अधिकारी ने शनिवार को जानकारी दी।
केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्रालय (एमओटीए) के संयुक्त सचिव ने कोलकाता में एफआरए के कार्यान्वयन पर दूसरे क्षेत्रीय समीक्षा सम्मेलन में कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर प्राप्त 54 लाख से अधिक दावों में से लगभग 11 लाख दावे अभी भी विभिन्न चरणों में लंबित हैं।
एक बयान के मुताबिक, अधिकारी ने कहा कि 18 लाख से अधिक दावे खारिज कर दिए गए हैं। यह भी बताया कि मध्य प्रदेश, ओडिशा और असम में विशेष रूप से कुछ जिलों में भारी संख्या में दावे लंबित हैं।
उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि क्षेत्रीय सम्मेलन में निम्नलिखित प्रमुख प्राथमिकताओं पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
बयान में कहा गया है कि सम्मेलन में पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा, झारखंड, ओडिशा, बिहार, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सहित आठ राज्यों के जनजातीय कल्याण, राजस्व एवं वन विभागों और जनजातीय अनुसंधान संस्थानों के वरिष्ठ अधिकारी एकत्रित हुए।
इसके अतिरिक्त, आंध्र प्रदेश के वरिष्ठ अधिकारियों को डिजिटलीकरण, वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) के स्वामित्व को सरकारी अभिलेखों में एकीकृत करने, आजीविका योजनाओं को एफआरए धारकों के साथ एकीकृत करने के लिए सक्रिय कदम उठाने और अधिकार धारकों को ऋण सुविधाएं प्रदान करने के संबंध में राज्य द्वारा अपनाई गई सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करने के लिए आमंत्रित किया गया था।
एफआरए दावों के बड़े पैमाने पर लंबित मामलों वाले जिलों के कलेक्टर, डिप्टी कलेक्टर और आईटीडीपी/आईटीडीए परियोजना अधिकारियों ने भी कार्यान्वयन की स्थिति की समीक्षा करने और समन्वित रूप से आगे बढ़ने के तरीके पर विचार-विमर्श करने के लिए भाग लिया।
यह सम्मेलन 10 सितंबर को बेंगलुरु में दक्षिणी राज्यों के लिए आयोजित प्रथम क्षेत्रीय समीक्षा सम्मेलन के बाद आयोजित किया गया है। वन्यजीव विकास मंत्रालय के सचिव ने कहा कि एफआरए समावेशी और सतत विकास के केंद्र में वनवासियों के अधिकारों, गरिमा और आकांक्षाओं को रखता है।
उन्होंने कहा कि मान्यता प्राप्त अधिकारों को सटीक मानचित्रों के साथ राजस्व और वन अभिलेखों में शामिल किया जाना चाहिए और उत्पादक भूमि उपयोग, आवास और आजीविका कार्यक्रमों के साथ समन्वय को कार्यान्वयन का नियमित हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
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