फूलन देवी बेहमई कांड ने बनाया 'रॉबिन हुड', 11 साल जेल की सजा काटकर बनी थीं सांसद
नई दिल्ली, 9 अगस्त (आईएएनएस)। यह बात 12 फरवरी 1983 की है। मध्य प्रदेश के भिंड जिले में लोगों की भारी भीड़ और सशस्त्र पुलिसकर्मियों के सामने 20 वर्षीय युवती ने अपने हथियार देवी दुर्गा और महात्मा गांधी की तस्वीरों के सामने रखकर आत्मसमर्पण कर दिया था। खाकी पुलिस वर्दी, लाल शॉल और माथे पर लाल पट्टी बांधे यह युवती कोई और नहीं, बल्कि 'बैंडिट क्वीन' के नाम से प्रसिद्ध दस्यु सुंदरी फूलन देवी थी।
फूलन देवी का जन्म 10 अगस्त 1963 को उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के गोरहा का पुरवा गांव में हुआ था। एक बेहद गरीब मल्लाह (निषाद) परिवार में जन्मीं फूलन के पिता देवीदीन की जमीन उनके चाचा और चचेरे भाई मैयादीन ने गांव के सरपंच को रिश्वत देकर हड़प ली थी। अन्याय के खिलाफ फूलन की लड़ाई 10 वर्ष की आयु में ही शुरू हो गई थी, जब उन्होंने अपने परिवार की जमीन और एक नीम के पेड़ को कटने से बचाने के लिए दबंगों का विरोध किया, जिसके लिए उन्हें बेरहमी से पीटा गया।
गरीबी और सामाजिक दबाव के चलते, मात्र 11 वर्ष की उम्र में उनकी शादी पुत्तीलाल नाम की एक ऐसे व्यक्ति से कर दी गई, जो उनसे उम्र में तीन गुना बड़ा था। ससुराल में शारीरिक, मानसिक और यौन प्रताड़ना झेलने के बाद उन्होंने उस विवाह को अस्वीकार कर दिया और अपने माता-पिता के पास लौट आईं।
गांव में बार-बार पुलिस और दबंगों द्वारा प्रताड़ित किए जाने के बाद 1979 में बाबू गुज्जर के डकैत गिरोह ने फूलन देवी का अपहरण कर लिया। वहां बाबू गुज्जर ने कई बार दुष्कर्म किया। गिरोह में मौजूद विक्रम मल्लाह ने इस अत्याचार का विरोध किया और बाबू गुज्जर की हत्या कर दी और फूलन को संरक्षण दिया। विक्रम ने ही उन्हें राइफल चलाना सिखाया, जिसके बाद दोनों में प्रेम हो गया और वे शोषितों के हक में सवर्ण गांवों में लूटपाट करने लगे, लेकिन यह शांति अल्पकालिक थी।
ऐसा कहा जाता है कि उच्च जाति (ठाकुर) के डकैतों-श्री राम और लाला राम ने वर्चस्व की लड़ाई में विक्रम मल्लाह की हत्या कर दी और फूलन देवी को बंधक बनाकर बेहमई गांव ले गए। वहां उन्हें कई दिनों तक बंधक बनाकर रखा गया और उनके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया।
बंधकों के चंगुल से भाग निकलने के बाद फूलन देवी ने अपना खुद का गिरोह बनाया। 14 फरवरी 1981 को फूलन देवी अपने गिरोह के साथ उसी बेहमई गांव लौटीं, जहां 20 से अधिक ठाकुर पुरुषों को पंक्ति में खड़ा करके गोली मार दी गई। 'बेहमई कांड' के नाम से चर्चित इस घटना ने शोषितों और निचली जातियों के बीच उन्हें रातों-रात एक 'रॉबिन हुड' और दुर्गा का अवतार बना दिया।
1983 में आत्मसमर्पण करने के बाद फूलन ने बिना किसी मुकदमे के 11 साल ग्वालियर और जबलपुर की जेलों में काटे। 1994 में वह रिहा हुईं। जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने लोकतांत्रिक रास्ते का चुनाव किया।
उन्होंने महिलाओं और हाशिए पर पड़े लोगों को आत्मरक्षा सिखाने के लिए 'एकलव्य सेना' का गठन किया। हिंदू धर्म में व्याप्त जातिगत भेदभाव से आहत होकर 15 फरवरी 1995 को उन्होंने नागपुर की ऐतिहासिक दीक्षाभूमि में बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया।
1996 में वह मिर्जापुर से चुनाव जीत कर भारतीय संसद की सदस्य बनीं। उन्होंने अपनी आत्मकथा 'आई फूलन देवी' भी लिखी, जिसे वैश्विक ख्याति मिली। हालांकि, शेखर कपूर की चर्चित फिल्म 'बैंडिट क्वीन' का उन्होंने कड़ा विरोध किया और लेखिका अरुंधति रॉय ने भी फिल्म पर उनके दर्द का व्यवसायीकरण करने का गंभीर आरोप लगाया। 25 जुलाई 2001 को नई दिल्ली में उनके आवास के बाहर गोली मारकर फूलन देवी की निर्मम हत्या कर दी गई थी। इस वारदात को शेर सिंह राणा ने अपने साथियों के साथ मिलकर अंजाम दिया था।
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Created On :   9 Aug 2026 9:29 AM IST












