विश्व प्रसिद्ध लोनावला चिक्की को मिला जीआई टैग, पर्यटन नगरी की पहचान को मिला नया गौरव

विश्व प्रसिद्ध लोनावला चिक्की को मिला जीआई टैग, पर्यटन नगरी की पहचान को मिला नया गौरव
सह्याद्रि की हरी-भरी वादियों में बसे देश के प्रमुख पर्यटन स्थल लोनावला को एक और बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। विश्व प्रसिद्ध लोनावला चिक्की को जीआई टैग मिल गया है। इस मान्यता के साथ लोनावला की पारंपरिक चिक्की को आधिकारिक पहचान प्राप्त हुई है, जिससे न केवल इस ऐतिहासिक खाद्य उत्पाद की विशिष्टता को संरक्षण मिलेगा, बल्कि स्थानीय कारोबार, कारीगरों और पर्यटन उद्योग को भी नई गति मिलने की उम्मीद है।

लोनावला, 18 जुलाई (आईएएनएस)। सह्याद्रि की हरी-भरी वादियों में बसे देश के प्रमुख पर्यटन स्थल लोनावला को एक और बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। विश्व प्रसिद्ध लोनावला चिक्की को जीआई टैग मिल गया है। इस मान्यता के साथ लोनावला की पारंपरिक चिक्की को आधिकारिक पहचान प्राप्त हुई है, जिससे न केवल इस ऐतिहासिक खाद्य उत्पाद की विशिष्टता को संरक्षण मिलेगा, बल्कि स्थानीय कारोबार, कारीगरों और पर्यटन उद्योग को भी नई गति मिलने की उम्मीद है।

लोनावला आने वाला लगभग हर पर्यटक यहां की प्रसिद्ध चिक्की खरीदना अपनी यात्रा का अहम हिस्सा मानता है। भुशी डैम, टाइगर पॉइंट, राजमाची पॉइंट, लोहगढ़ और विसापुर किले, कार्ला एवं भाजा की प्राचीन गुफाओं की तरह ही लोनावला चिक्की भी इस पर्यटन नगरी की एक अलग पहचान बन चुकी है। अब जीआई टैग मिलने के बाद इसकी ब्रांड वैल्यू और विश्वसनीयता में और अधिक वृद्धि होने की संभावना है।

लोनावला चिक्की का इतिहास ब्रिटिश शासनकाल से जुड़ा माना जाता है। उस समय मुंबई-पुणे रेलवे लाइन के निर्माण के दौरान काम करने वाले मजदूरों के लिए गुड़ और मूंगफली से तैयार किया गया यह पौष्टिक खाद्य पदार्थ बनाया गया था। धीरे-धीरे इसका स्वाद लोगों की पसंद बन गया और समय के साथ यह पूरे देश में लोकप्रिय हो गया। आज लोनावला चिक्की की पहचान भारत ही नहीं बल्कि विदेशों तक पहुंच चुकी है।

चिक्की व्यवसायी अंकित पारेख ने इस उपलब्धि पर खुशी व्यक्त करते हुए कहा कि जीआई टैग मिलने से लोनावला चिक्की को एक मजबूत पहचान और बड़ा मंच मिला है। अब इस पहचान का उपयोग कर भारत के साथ-साथ विदेशों में भी कारोबार का विस्तार किया जा सकेगा। इससे न केवल व्यापार बढ़ेगा, बल्कि लोनावला चिक्की का नाम भी वैश्विक स्तर पर और अधिक प्रसिद्ध होगा। उन्होंने बताया कि उनका नेशनल चिक्की का कारोबार करीब 100 वर्षों से चल रहा है। जीआई टैग मिलने के बाद उनकी पारंपरिक कारीगरी और वर्षों पुराने कौशल को नई पहचान मिलेगी, जिससे स्थानीय उद्योग को भी बढ़ावा मिलेगा।

अंकित पारेख ने बताया कि जीआई टैग हासिल करने की पूरी प्रक्रिया में उनके पिता अभय कुमार पारेख ने पिछले चार वर्षों तक लगातार मेहनत की। उनकी इसी अथक कोशिश का परिणाम आज सामने आया है। इस उपलब्धि से पूरा परिवार और उद्योग जगत बेहद खुश है। उन्होंने इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले प्रोफेसर गणेश का भी विशेष रूप से आभार व्यक्त किया। अंकित ने कहा कि प्रोफेसर गणेश के मार्गदर्शन और प्रयासों के बिना यह सफलता संभव नहीं थी और जीआई टैग दिलाने में उनका योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा।

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Created On :   19 July 2026 12:20 AM IST

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