हरियाणा का रोहनात गांव आज तक क्यों रह गया गुलाम? पढ़ें यहां

हरियाणा का रोहनात गांव आज तक क्यों रह गया गुलाम? पढ़ें यहां

Bhaskar Hindi
Update: 2018-01-26 06:11 GMT

डिजिटल डेस्क, भिवानी। देश को आजाद हुए 70 साल हो चुके है। लेकिन हरियाणा का एक गांव ऐसा भी है जो अब तक अपने आप को गुलाम मानता है। यहीं वजह है कि इस गांव में आज तक तिरंगा नहीं फहराया गया। न तो गणतंत्र दिवस पर न ही स्वतंत्रता दिवस पर। हरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर पहली बार गणतंत्र दिवस पर इस गांव में तिरंगा फहराने वाले थे, लेकिन कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया। बता दें कि इस गांव के लोगों ने अंग्रेजी हुकूमत के सामने घुटने नहीं टेके और शहीद हो गए।  बावजूद इसके ये गांव सालों से सरकार की उपेक्षा का शिकार बना हुआ है। इस गांव की पूरी जमीन को अंग्रेजी हुकूमत ने नीलाम कर दिया था। सरकारी रिकॉर्ड में आज भी ग्रामीणों को उनकी जमीन नहीं मिली है। यहीं वजह है कि ग्रामीण आज भी खुद को गुलाम मानते है। 

मनोहर लाल खट्टर का कार्यक्रम स्थगित

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर पहली बार यहां ग्रामीणों को गुलामी के दर्द से आजादी दिलाने आने वाले थे। यहां पर गणतंत्र दिवस पर शहीद सम्मान समारोह आयोजित किया जा रहा था, लेकिन कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया। प्रशासन ने यह कदम रोहणात के ग्रामीणों की मांग पर उठाया है, क्योंकि पिछले दिनों स्थानीय विधायक विशंबर वाल्मिकी के पुत्र विशाल का अचानक निधन हो गया था। इसी के चलते ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की थी कि वे इस दुखद घड़ी में यह समारोह नहीं करना चाहते। उपायुक्त डा. अंशज सिंह ने भी इस समारोह के स्थगित होने की पुष्टि की है। गांव की महिला सरपंच रीनू देवी ने बताया कि इस दुखद घड़ी में गांव का कोई भी व्यक्ति समारोह का आयोजन नहीं चाहता था। उन्होंने कहा कि प्रशासन ने ग्रामीणों की इच्छा पर इस समारोह को स्थगित कर दिया है। गांव के दादी गौरी मंदिर के मैदान में  होने वाले समारोह के स्थगित होने की वजह से इस बार भी ग्रामीणों को गुलामी के दर्द से आजादी नहीं मिल सकी।

जलियांवाला बाग जैसा नरसंहार

हरियाणा के इस गांव का नाम है रोहनात। इस गांव की आबादी 4200 के करीब  है। अंग्रेजों ने रोहनात गांव में भी जलियांवाला बाग जैसा नरसंहार किया था। दरअसल, यहां के लोगों को 1857 के क्रांति में भाग लेने की खौफनाक सजा दी गई थी।  ग्रामीणों के अनुसार हांसी में अंग्रेज़ों की छावनी होती थी। वर्ष 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी हिसार- हांसी भी पहुंची थी। देश को आजाद करवाने की ज्वाला दिल में लेकर 29 मई 1857 को मंगल खां के विरोध का साथ देते हुए रोहनात के निवासी स्वामी बरण दास बैरागी, रूपा खाती व नौंदा जाट सहित हिंदू व मुस्लिम एकत्रित होकर हांसी पहुंचे। गांव रोहनात के अलावा आसपास के गांवों के ग्रामीणों ने भी अंग्रेजो पर हमला बोल दिया, जिसमे हांसी व हिसार के दर्जन-दर्जन भर अंग्रेजी अफसर मारे गए। यहां के क्रांतिकारी वीरों ने जेल में बंद कैदियों को रिहा करवा दिया और तत्कालीन अंग्रेजी सल्तनत के खजाने भी लूटे। जब अंग्रेज आला अधिकारियों को इस बात की सूचना मिली तो विरोध की इस चिंगारी को दबाने के लिए एक पलाटून को जरनल कोर्ट लैंड की अगुवाई में हांसी भेजा।

आबरू बचाने कुंए में कूदी महिलाएं

अंग्रेजों ने गांव पुठी मंगल क्षेत्र में तोपें लगवाकर रोहनात पर हमला बोला। गांव रोहनात के सैंकड़ों लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। गांव के बिरड़ दास बैरागी को तोप पर बांध कर उनके शरीर को चीथड़ों की तरह उड़ा दिया। अपनी आबरू बचाने के लिए गांव की कई महिलाएं गांव के एक कुंए में कूद गई।

वहीं कई नौजवानों को पेड़ पर लटकाकर फांसी दे दी गई। जिस कुएं में ये महिलाएं कूदी थीं और जिस बरगद के पेड़ पर गांव के नौजवानों को फांसी पर लटकाया गया था, वो कुआं और बरगद का पेड़ आज भी अंग्रेजों के दिए दर्द के गवाह के रूप में मौजूद हैं ।


खून से सनी सड़क बनी "लाल सड़क"

इतना ही नहीं अंग्रेजों का विरोध करने वाले ग्रामीणों को अंग्रेज़ अपने साथ हांसी ले गए, जहां पर उनके शरीर के उपर से रोड़ रोलर फेर दिया, जिससे यह सडक़ खून से लथपथ होकर लाल हो गई और वर्तमान में भी यह सडक़ लाल सडक़ के नाम से जानी जाती है। हांसी की लाल सडक़ रोहनात व आसपास के ग्रामीणों के बलिदान की निशानी है, यह सडक़ आज भी मौजूद है। गांव के लोगों  की आंखें उस मंजर को याद कर छलछला उठती हैं। दर्द ये है कि जिस गांव ने देश के लिए इतना कुछ किया उस गांव के लिए सरकारों ने कुछ भी तो नहीं किया। गांव के हर उम्र तबके के लोगों का कुछ ऐसा ही कहना था।

नीलाम कर दिया गया पूरा गांव

रोहनात गांव को नीलामी की भी सजा मिली थी। ग्रामीणों द्वारा की गई मुखालफत अंग्रेजों को फूटी आंख नहीं सुहाई और उन्होंने रोहनात को बागी गांव घोषित कर दिया गया। हिसार के तत्कालीन अंग्रेजी अधिकारी ने तत्कालीन क्षेत्र के तहसीलदार से गांव की सारी ज़मीन का रिकॉर्ड तलब किया और 20 अप्रैल 1858 को गांव की जमीन को नीलाम कर दिया, जिसके तहत 20,656 बीघे, 19 बीसवे ज़मीन की नीलामी की गई। अन्य गांवों के लोगों ने नीलामी के दौरान गांव की पूरी जमीन को 61 खरीददारों ने 8100 रुपए में खरीदा। कुल पूँजी का चौथाई हिस्सा यानि दो हज़ार 25 रुपये उसी वक्त जमा करवाया गया। शेष राशि 6075 बाद में जमा करवाते ही अंग्रेज़ों ने खरीददारों को कब्ज़ा दिला दिया और ग्रामीणों को बागी करार दे दिया।

नीलामी के दौरान 13 बीघे जमीन को छोड़ दिया गया, जहां पर यह तालाब, कुंआ और बरगद के पेड़ हैं। गांव के सरपंच प्रतिनिधि रविंद्र बूरा ने कहा कि नीलामी के कुछ सालों बाद ग्रामीणों ने मेहनत के दम पर आस-पास की जमीन खरीद ली। लेकिन आज भी सरकारी रिकॉर्ड में रोहनात के साथ उन गांवों के नाम भी जुड़े है, जिन्होंने नीलामी में उसे खरीदा था। सरकारी रिकॉर्ड में दिक्कत के कारण विकास कार्य भी प्रभावित हो रहे हैं।

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