बॉम्बे हाई कोर्ट: चांद पर पहुंच गए, लेकिन जाति व्यवस्था जारी है, अदालत ने हाथ से मैला ढोने की प्रथा के लिए राज्य सरकार की आलोचना की

चांद पर पहुंच गए, लेकिन जाति व्यवस्था जारी है, अदालत ने हाथ से मैला ढोने की प्रथा के लिए राज्य सरकार की आलोचना की
  • अदालत ने ‘खतरनाक सफाई' का काम करते मारे गए व्यक्ति के आश्रितों को 30 लाख रुपए मुआवजा देने का दिया आदेश
  • मैला ढोने की प्रथा के लिए राज्य सरकार की आलोचना
  • राज्य को बरी करने वाली पॉलिसी रद्द की

Mumbai News. बॉम्बे हाई कोर्ट ने ‘हाथ से मैला ढोने' की प्रथा के जारी रहने के लिए राज्य सरकार की आलोचना करते हुए कहा है कि भले ही भारत चांद के दूसरी तरफ पहुंच गया है, फिर भी हमारे देश में जाति व्यवस्था की सामाजिक बुराई अभी भी जारी है। यह कड़वी सच्चाई हमारे सामने है, जो नागरिकों को ऐसा काम करने के लिए मजबूर करती है, जो इंसानी इज्जत से ‘नीचे' है।

न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति मंजूषा देशपांडे की पीठ के समक्ष 2019 और 2025 में जारी एक शासनादेश (जीआर) के एक क्लॉज को चुनौती देने वाली श्रमिक जनता संघ समेत अन्य याचिकाओं पर सुनवाई हुई। इस जीआर में राज्य सरकार ने प्राइवेट सोसाइटियों और कॉन्ट्रैक्टरों को, जो हाथ से मैला उठाने के लिए किसी भी व्यक्ति को काम पर रखते हैं, तो किसी भी अनहोनी घटना जैसे कि ऐसे सफाईकर्मियों की मौत होने पर उन्हें मुआवजा देने के लिए जिम्मेदार बनाया गया है।

पीठ ने अपने फैसले में कहा कि 21वीं सदी में हम चांद के दूसरी तरफ पहुंचने की डींगें हांकते हैं। हमारे सामने एक कड़वी सच्चाई यह है कि हमारे देश में जाति व्यवस्था की सामाजिक बुराई अभी भी चलती है, जो हमारे कुछ नागरिकों को ऐसे काम करने के लिए मजबूर करती है, जो इंसानी इज्जत के खिलाफ हैं।

पीठ ने कहा कि हम राज्य सरकार के उस रुख से हैरान हैं, जो 12 दिसंबर 2019 को जारी शासनादेश (जीआर) में दिखता है और जिसे 30 अप्रैल 2025 के जीआर में फिर से दोहराया गया है। पीठ ने राज्य सरकार को ऐसे कर्मचारियों के परिवार के सदस्यों के पुनर्वास के लिए उचित कदम उठाने के निर्देश भी दिए हैं, जिनकी खतरनाक सफाई गतिविधियों के दौरान मौत हो जाती है।

पीठ ने यह भी आदेश दिया कि राज्य सरकार इस आदेश की तारीख से 6 महीने के अंदर उन सभी लोगों की पहचान करें, जिनकी मौत 2013 के एक्ट की धारा 2(डी) के तहत ‘खतरनाक सफाई' का काम करते हुए हुई है। पहचान होने के बाद राज्य सरकार ऐसे हर मृत व्यक्ति के आश्रितों को 30 लाख रुपए का मुआवजा देगी। राज्य और स्थानीय निकाय 2013 के एक्ट के मुताबिक सफाई कर्मचारियों और मैला ढोने वालों के आश्रितों के पुनर्वास के लिए कदम उठाएंगे, और सफाई कर्मचारियों व मैला ढोने वालों के बीच कोई भेदभाव नहीं करेंगे।

पीठ ने कहा कि राज्य सरकार ने अपने एफिडेविट में कहा है कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर के मुताबिक हाथ से मैला ढोने वालों की मौत के 81 ऐसे मामलों की पहचान की गई और उनके हर परिवार को 10 लाख रुपए दिए गए, जिससे राज्य का कुल खर्च 8 करोड़ 10 लाख रुपए हुआ।

पीठ ने कहा कि पहली बार केंद्र सरकार ने इस सामाजिक बुराई में फंसे लोगों को आजादी दिलाने के लिए साल 1993 में हाथ से मैला ढोने वाले का रोजगार और सूखे शौचालयों का निर्माण (रोक) अधिनियम 1993 लागू किया, जिसका मकसद था, जिसमें हाथ से मैला उठाने वालों को रोजगार देने को जुर्म घोषित करके हाथ से मैला उठाने की प्रथा को खत्म करना, इंसानी मल को हटाना जुर्म है और इस तरह देश में सूखे शौचालयों के और बढ़ने पर रोक लगाना था।

Created On :   4 Sept 2026 8:26 PM IST

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