पूरे देश में हिंदु पताका फैलाने के लिए किया जाता है याद: शंकराचार्य के निधन से सिवनी जिले में शोक की लहर

September 11th, 2022


डिजिटल डेस्क सिवनी। रविवार की शाम को जैसे ही द्विपीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज के निधन का समाचार जिले में फैला वैसे ही शोक की लहर फैल गई। उनका जिले से पुराना नाता था। महाराजश्री के निधन के समाचार के बाद जिले के कई स्थानों पर श्रद्धांजलि देने का क्रम शुरू हो गया, वहीं जिले से बड़ी संख्या में भक्त झोतेश्वर रवाना हो गए। यह क्रम खबर लिखे जाने तक बना हुआ था।
सिवनी जिले में हुआ था जन्म
स्वामी स्वरूपानंद जी का जन्म 2 सिंतबर 1924 को सिवनी जिले के दिघौरी में हुआ था। उनका बचपन का नाम पोथी राम था। स्वामी जी के पिता का नाम धनपति उपाध्याय और माता का नाम गिरिजा देवी था। उनके एक भाई रामरक्षा उपाध्याय भी थे जो एसएएफ में छिंदवाड़ा में रहे हैं। स्वामी जी के नाती संतोष उपाध्याय जो सिवनी क्षेत्र के सोमवारी में रहते हैं, ने बताया कि महाराजश्री नौ वर्ष की उम्र में घर से निकल गए थे और बनारस पहुंच गए थे। यहां पर उनकी मुलाकात गुरु महेश्वरानंद जी महाराज से हुई थी। उन्होंने उनसे सन्यास की दीक्षा ली थी। करपात्री महाराज, महर्षि महेश योगी उनके गुरुभाई थे। महाराज के एक और भक्त जेएल मिश्रा ने बताया कि बाद में उनकी भेंट ब्रम्हानंद सरस्वती जी महाराज से हुई जो जोशी मठ जिसे अब द्वारका पीठ के नाम से जाना जाता है के शंकराचार्य थे। ब्रम्हानंद जी ने उन्हे दंड सन्यास की दीक्षा दी।
गांधी से प्रभावित होकर कूदे थे आजादी के संग्राम में
स्वामी स्वरूपानंद जी महात्मा गांधी से प्रभावित होकर 1942 में आजादी के आंदोलन में कूद गए थे। इस दौरान वे बनारस और नरसिंहपुर की जेल में दो बार बंद भी हुए थे। गौहत्या के विरोध में कोलकाता में आंदोलन करते हुए उन्होंने लाठियां भी खाईं थीं।
घरवापसी के लिए भी थे खासे सक्रिय
स्वामी स्वरूपानंद जी ने झारखंड में मनोहरपुर के पास एक आश्रम बनाया था। जहां पर उन्होंने मिशनरियों के द्वारा किए जा रहे धर्मांतरण का विरोध किया था। उन्होंने अपने प्रयासों से लगभग दो लाख लोगों को वापस हिंदु धर्म में जोड़ा था। वे 1972 में जोशीमठ और 1980 में द्वारका मठ के शंकराचार्य घोषित हुए थे।
सिवनी से था खास लगाव
भले स्वामी जी के शिष्य पूरे देश में हैं लेकिन उनका सिवनी से लगाव हमेशा रहा। उन्होंने जिले के दिघौरी में स्फटिक मंदिर का निर्माण कराया था, जिसमें वर्ष 2002 में स्फटिक शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा की गई थी। कातलबोड़ी में भी मातृधाम के मंदिर का निर्माण इसी दौर में कराया था। इस मंदिर को हूबहू कोलकाता के काली मंदिर की तर्ज पर बनाया गया है। नरसिंहपुर में गोटेगांव में मंदिर का निर्माण 1983 में कराया गया था, जिसमें उस वक्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी आईं थी।
रामटेक तक रेल लाइन का किया था समर्थन
ंमहाराज स्वामी स्वरूपानंद जी ने श्रीधाम से लेकर रामटेक तक रेललाइन का समर्थन भी किया था। तत्कालीन नरसिंहराव सरकार के रेलमंत्री माधवराव सिंधिया से मुलाकात भी की थी। जिसके बाद सर्वे की घोषणा भी हुई थी। आंखों का विश्वस्तरीय अस्पताल जो श्रीधाम में है उसे सिवनी में खोलना चाहते थे। वर्ष 2005-06 में जब श्रीधाम का मंदिर और आश्रम बना था, उस समय चारों पीठों के शंकराचार्य और तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी भी आए थे।
आयोजन निरस्त, दी श्रद्धांजलि, झोतेश्वर रवाना
सिवनी जिले में महाराजश्री के निधन की खबर आते ही लोग अवाक रह गए। उन्हें अनेक स्थानों पर श्रद्धांजलि दी गई। दिघौरी, बंडोल सहित अन्य जगह लोगों ने एकत्र होकर महाराजश्री को याद किया, उनके चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की। सिवनी में ब्राम्हण समाज में शोक की लहर है। सिवनी विधायक दिनेश राय ने अपने सभी कार्यक्रम रद्द कर दिए हैं और झोतेश्वर के लिए रवाना हो गए हैं। रविवार शाम सिवनी में फुटबाल प्रतियोगिता में थे, इसी दौरान शंकराचार्य के निधन की जानकारी मिलने पर उन्होंने मौके पर मौजूद लोगों के साथ दो मिनट का मौन रखा और झोतेश्वर रवाना हो गए।
धरना हुआ स्थगित
जिले में रेल चलाए जाने की मांग को लेकर सिवनी रेल विकास समिति 13 सितंबर को धरना करने वाली थी जिसके लिए जोर शोर से तैयारियां जारी थीं। स्वामीजी के निधन के चलते इस आयोजन को अब 20 सितंबर तक के लिए स्थगित कर दिया गया है।
छपारा में थमा डीजे का शोर
रविवार को छपारा में गणपति विसर्जन का क्रम जारी था लेकिन जैसे ही स्वामी जी के निधन का समाचार आया डीजे बंद करा दिए गए। बस स्टैंड, तकिया वार्ड, संजय कॉलोनी, माता वार्ड, शीशगर वार्ड एवं झंडा चौक के सार्वजनिक गणेश पंडालों पर स्थापित मूर्तियों का विसर्जन रविवार को तय था। नगर के सनातन धर्म ट्रस्ट के सदस्यों के द्वारा गणेश मंडल को स्वामी स्वरूपानंद के निधन का समाचार अवगत कराया गया जिस पर सभी गणेश मंडलों के द्वारा डीजे साउंड का शोर बंद कर दिया गया।