Pune City News: 353 तहसीलों में से सिर्फ एक ही पर सूखे का संकट

353 तहसीलों में से सिर्फ एक ही पर सूखे का संकट
  • 352 तहसीलें में भूजल स्थिति सामान्य, विदर्भ, मराठवाड़ा और पश्चिम महाराष्ट्र में सुधरा स्तर
  • चिखलदरा सूखे की श्रेणी में

ऋषिकेश जगताप, पुणे। भूजल सर्वेक्षण और विकास संस्था (जीएसडीए) द्वारा जारी 2025 के भूजल सूखा सूचकांक (जीएसडीआई) की रिपोर्ट में राज्य के लिए सकारात्मक और सुकून देने वाली तस्वीर सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक महाराष्ट्र की 353 तहसीलों में से 352 तहसीलों में भूजल की स्थिति सामान्य हैं और केवल एक तहसील को कम भूजल के कारण सूखे की श्रेणी में रखा गया है।

रिपोर्ट के अनुसार अमरावती जिले की चिखलदरा तहसील अकेला ऐसा क्षेत्र है जिसे सूखे की श्रेणी में शामिल किया गया है। जीएसडीआई सूचकांक -0.16 से -0.30 के बीच होने से यह तहसील हलके सूखे का अनुभव कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति चिंताजनक नहीं है और उचित योजना, जल संरक्षण उपाय और जल उपयोग पर नियंत्रण से स्थिति जल्द सुधारी जा सकती है।

राज्य में कोई भी तहसील गंभीर, मध्यम या तीव्र भूजल सूखे में नहीं है, यह पिछले कुछ साल की तुलना में अत्यंत सकारात्मक माना जा रहा है। इस सुधरी स्थिति के पीछे मुख्य कारणों में संतोषजनक मानसून, जल संरक्षण के लिए उठाए गए कदम और भूजल उपयोग पर प्रशासन द्वारा लगाए गए प्रतिबंध शामिल हैं। पिछले 10 साल की तुलना में भूजल स्तर औसतन 1.52 मीटर बढ़ा है, जो राज्य के लिए विशेष रूप से दिलासादायक है।

विदर्भ, मराठवाड़ा और पश्चिम महाराष्ट्र में सुधार

भूजल की दृष्टि से हमेशा संवेदनशील माने जाने वाले विदर्भ और मराठवाड़ा में इस साल सकारात्मक बदलाव दिखाई दे रहे हैं। अकोला, बुलढाणा, यवतमाल, नागपुर, जालना, बीड़, उस्मानाबाद, लातूर और परभणी जैसे जिलों की सभी तहसीलें सामान्य भूजल स्थिति में हैं। इसी प्रकार पश्चिम महाराष्ट्र में भी भूजल स्थिति स्थिर है और पुणे, सातारा, सांगली, कोल्हापुर, नाशिक, अहिल्यानगर जैसे जिलों की तहसीलें भी सामान्य श्रेणी में हैं। यह स्थिति पिछले कुछ साल की तुलना में ज्यादा स्थिर और संतुलित मानी जा रही है, जो पानी के सतत प्रबंधन और जल संरक्षण उपायों का प्रत्यक्ष परिणाम है।

मानसून और जल संरक्षण की अहम भूमिका

भूजल स्थिति सुधार में मानसून की अहम भूमिका है। पिछले साल राज्य के कई हिस्सों में वर्षा का वितरण संतोषजनक रहा। संतुलित वर्षा ने जमीन के जलस्तर को बढ़ाने में मदद की। इसके अलावा कई जिलों में जल संरक्षण के लिए उठाए गए कदम जैसे तालाब, बांध, गड़बंदी, जलाशय, जल टैंक और अन्य संरचनाएं भूमिगत जल भंडार को बनाए रखने में मददगार साबित हुए। शहरों में भी जल संरक्षण पर जोर दिया गया। नागपुर, पुणे, नाशिक जैसे शहरी क्षेत्रों में जलाशयों का प्रबंधन और जल आपूर्ति नियंत्रण प्रणाली लागू की गई। उपायों की वजह से नागरिकों के लिए पानी की कमी टली और भूजल स्तर स्थिर रहा।

कारगर उपायों का परिणाम

भूजल उपयोग पर नियंत्रण रखते हुए प्रशासन ने व्यापक उपाय किए। इसमें नए कुएं-बोरवेल खोदने, औद्योगिक पानी आपूर्ति और कृषि के लिए विस्तृत नियमावली लागू करना शामिल है। ये उपाय भूजल बचाने और उपलब्ध जल भंडार को बनाए रखने में महत्वपूर्ण रहे। पानी की कमी वाले विदर्भ और मराठवाड़ा में प्रशासन के कड़े नियमों का पालन, कृषि में पानी के नियोजन और भूमि के प्रकार के अनुसार पानी प्रबंधन का बड़ा असर दिखाई दिया।

जानकारों का कहना है कि महाराष्ट्र की यह स्थिति अत्यंत सकारात्मक है, लेकिन सतत निगरानी आवश्यक है। भविष्य में मानसून की अनिश्चितता, जल संसाधनों का दोहन, औद्योगिक विकास और बढ़ती आबादी भूजल स्तर पर प्रभाव डाल सकते हैं। इसलिए पानी के उपयोग पर नियंत्रण, जल संरक्षण में नई तकनीकों का उपयोग और जनभागीदारी पर जोर देना जरूरी है। यदि योजना सही ढंग से लागू की गई और पानी का उपयोग संतुलित रखा गया, तो अमरावती जिले में हलकी सूखी श्रेणी की तहसील भी जल्द सामान्य श्रेणी में आ सकता है।

Created On :   3 Feb 2026 4:01 PM IST

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