इंजीनियरिंग परीक्षाओं के बाद बढ़ी कॉलेज चयन को लेकर उलझन

इंजीनियरिंग परीक्षाओं के बाद बढ़ी कॉलेज चयन को लेकर उलझन
जेईई मेन परीक्षा समाप्त होते ही छात्रों और अभिभावकों के सामने सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है कि कौन सा इंजीनियरिंग कॉलेज और कौन सी ब्रांच उनके लिए दीर्घकालिक रूप से उपयुक्त रहेगी।

परीक्षा के बाद असली चुनौती

हाल ही में घोषित जेईई मेन परिणामों के बाद देशभर में इंजीनियरिंग एडमिशन 2026 को लेकर गतिविधियां तेज हो गई हैं। राज्य स्तरीय इंजीनियरिंग परीक्षाएं और निजी विश्वविद्यालयों की प्रवेश प्रक्रियाएं भी समानांतर रूप से चल रही हैं। हर वर्ष करीब 12 से 13 लाख छात्र केवल जेईई मेन में शामिल होते हैं, जबकि इसके अतिरिक्त लाखों छात्र अन्य परीक्षाओं के माध्यम से इंजीनियरिंग एडमिशन प्रक्रिया का हिस्सा बनते हैं।

परीक्षा समाप्त होते ही छात्रों और अभिभावकों के सामने सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है कि कौन सा कॉलेज और कौन सी ब्रांच उनके लिए दीर्घकालिक रूप से उपयुक्त रहेगी।

कॉलेज चयन में असमंजस की वास्तविक वजह

एजुकेशन प्लेटफॉर्म्स और काउंसलिंग से जुड़े आंकड़े संकेत देते हैं कि लगभग 60 प्रतिशत छात्र परिणाम आने के बाद कॉलेज चयन को लेकर स्पष्ट निर्णय नहीं ले पाते।

इसका मूल कारण जानकारी की कमी नहीं, बल्कि अत्यधिक और असंगठित जानकारी है। कटऑफ, फीस, प्लेसमेंट और पात्रता जैसे अहम डेटा अलग-अलग स्रोतों पर बिखरे रहते हैं, जिससे समग्र तस्वीर बन पाना कठिन हो जाता है।

हालिया एडमिशन सीज़न के दौरान KollegeApply प्लेटफॉर्म पर आने वाले लगभग 45 प्रतिशत छात्रों ने सबसे पहले कॉलेज तुलना टूल का उपयोग किया। यह दर्शाता है कि अब छात्र कॉलेज ब्रांड से आगे बढ़कर तथ्य आधारित तुलना करना चाहते हैं।

अभिभावकों के स्तर पर भी यही चिंता देखने को मिलती है। उनका मानना है कि अधिकांश जानकारी प्रचार आधारित होती है, जबकि वास्तविक अंतर समझाने वाले स्रोत सीमित हैं।

रैंक से आगे सोचने की आवश्यकता

इंजीनियरिंग शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। आज कंपनियां केवल डिग्री या ब्रांच को नहीं, बल्कि उम्मीदवार की स्किल प्रोफाइल, प्रोजेक्ट एक्सपोज़र और समस्या-समाधान क्षमता को प्राथमिकता देती हैं।

कई हायरिंग रिपोर्ट्स के अनुसार, 70 प्रतिशत से अधिक फ्रेशर हायरिंग में स्किल्स को कॉलेज ब्रांड से ऊपर रखा जा रहा है। ऐसे में कॉलेज चयन करते समय यह देखना आवश्यक हो गया है कि संस्थान छात्रों को किस स्तर का प्रैक्टिकल और इंडस्ट्री एक्सपोज़र उपलब्ध कराता है।

काउंसलिंग चरण में होने वाली आम चूक काउंसलिंग प्रक्रिया आज पहले से अधिक जटिल हो चुकी है। अलग-अलग संस्थानों की अलग-अलग पात्रता शर्तें, समयसीमा और विकल्प भरने के नियम हैं।

आंकड़ों के अनुसार, लगभग हर तीसरा छात्र काउंसलिंग के दौरान कोई न कोई गलती कर देता है, जिसका सीधा प्रभाव सीट अलॉटमेंट और कॉलेज विकल्पों पर पड़ता है।

KollegeApply की भूमिका

इसी परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए KollegeApply इंजीनियरिंग उम्मीदवारों के लिए एक ऐसा डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित कर रहा है, जहां कॉलेज, कोर्स, फीस, पात्रता, प्रवेश प्रक्रिया और प्लेसमेंट से संबंधित जानकारी को एक ही स्थान पर संरचित रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

प्लेटफॉर्म का उद्देश्य छात्रों को केवल विकल्प दिखाना नहीं, बल्कि विकल्पों के बीच वास्तविक अंतर स्पष्ट करना है, ताकि वे प्रचार आधारित दावों के बजाय तथ्य आधारित निर्णय ले सकें। हजारों इंजीनियरिंग कॉलेजों और कोर्सेस से जुड़ी जानकारी यहां नियमित रूप से अपडेट की जाती है।

उभरते संस्थान और बदलता परिदृश्य

बीते कुछ वर्षों में टियर-2 और टियर-3 शहरों के कई इंजीनियरिंग कॉलेजों ने अकादमिक गुणवत्ता और प्लेसमेंट के स्तर पर उल्लेखनीय सुधार किया है। औसत पैकेज में 25 से 30 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है।

इसके बावजूद बड़ी संख्या में छात्र अभी भी केवल बड़े शहरों के संस्थानों तक सीमित रहते हैं, जबकि कई उभरते संस्थान भी व्यावहारिक रूप से मजबूत विकल्प बन चुके हैं।

कॉलेज चयन के समय किन पहलुओं पर ध्यान दें

● पिछले तीन से चार वर्षों के प्लेसमेंट ट्रेंड

● इंटर्नशिप और इंडस्ट्री प्रोजेक्ट्स की उपलब्धता

● कोर्स कंटेंट और लैब इंफ्रास्ट्रक्चर

● कुल फीस और संभावित रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट

इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा केवल एक चरण है। असली प्रभाव उस निर्णय से पड़ता है, जो छात्र इसके बाद लेते हैं। सही जानकारी और संतुलित दृष्टिकोण के साथ किया गया कॉलेज चयन ही मजबूत करियर की आधारशिला रखता है।

Created On :   18 Feb 2026 3:01 PM IST

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