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धारा 377: सुप्रीम कोर्ट का बेहद अहम फैसला, अब समलैंगिकता अपराध नहीं

September 07th, 2018 10:16 IST

हाईलाइट

  • समलैंगिकता सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला
  • आईपीसी की धारा 377 के तहत होमो सेक्शुएलिटी यानि समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर रखा गया।
  • चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनाया फैसला

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत में समलैंगिकता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने 377 पर फैसला सुनाते हुए समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर रखा है। इस मामले की सुनवाई जस्टिस रोहिंटन नरीमन, एएम खानविल्कर, डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा की संवैधानिक पीठ ने की है। फैसला सुनाते हुए सीजेआई दीपक मिश्रा ने कहा कि LGBT कम्युनिटी को भी किसी आम नागरिक की तरह अधिकार हैं। एक दूसरे के अधिकारों का सम्मान करें, यही सर्वोच्च मानवता हैं। समलैंगिक सेक्स को आपराधिक कहना तर्कहीन है। धारा 377 पर सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की पीठ ने समलैंगिक संबंधों को अपराध मुक्त करार दिया है।

इससे पहले जनवरी 2018 में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि न्यायाधीशों का एक बड़ा समूह पिछले निर्णय पर फिर से विचार करेगा और धारा 377 की संवैधानिक वैधता की जांच करेगा। अपने 2013 के फैसले की समीक्षा करते हुए, शीर्ष अदालत ने कहा था कि मुकदमा चलाने के डर में रहने वाले पांच लोगों द्वारा दायर याचिका पर फैसला किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने उस वक्त कहा था, 'जो लोग अपनी पसंद और स्वेच्छा का प्रयोग करते हैं, उन्हें कभी भी डर की स्थिति में नहीं रहना चाहिए। इस मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र ने इस मामले पर कोई भी स्टैंड लेने से मना कर दिया था। केंद्र ने कहा था कि इन सभी संवेदनशील मुद्दों को कोर्ट पर ही छोड़ देना चाहिए। धारा 377 उन महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक है जिसे चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा रिटायर होने से पहले फैसला करेंगे।

बता दें कि यह मामला सबसे पहले 2001 में सामने आया था। उस वक्त नाज फाउंडेशन ने दिल्ली हाईकोर्ट में इस मामले को उठाया था। इसके बाद 2009 में दिल्ली हाई कोर्ट ने होमो सेक्शुएलिटी को बैन कर दिया था। हालांकि 2013 में, सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया था। वहीं कोर्ट ने इस फैसले की समीक्षा करने का भी निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संवैधानिक मुद्दों के कारण इस निर्णय पर पुनर्विचार की जरूरत है।

आईपीसी की धारा 377 में कहा गया है,"अगर कोई भी इंसान स्वेच्छा से किसी भी पुरुष, महिला या पशु के साथ प्रकृति के आदेश के खिलाफ शारीरिक संबंध बनाता है, उसे दंड के रूप में 10 साल की सजा भुगतनी पड़ सकती है। दोषी पर  जेल के साथ-साथ जुर्माना भी लगाया जा सकता है। यह कानून सबसे पहले 1861 में ब्रिटिश शासन के दौरान आया था। 

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