असम चुनाव में 10 दिनों के अभियान के बाद लौटे हेमंत सोरेन, क्या झामुमो का ‘मिशन’ छोड़ पाया सियासी असर?

असम चुनाव में 10 दिनों के अभियान के बाद लौटे हेमंत सोरेन, क्या झामुमो का ‘मिशन’ छोड़ पाया सियासी असर?
असम में लगातार 10 दिनों तक झामुमो प्रत्याशियों के पक्ष में चुनावी कैंप करने के बाद झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन मंगलवार की शाम को रांची लौट आए हैं। इसके पहले उन्होंने गुवाहाटी में मीडिया से बात करते हुए कहा कि इस चुनावी अभियान का नतीजा चाहे जो हो, हमारी पार्टी ग्राउंड पर मजबूती के साथ डटी है। हमने असम में अपना काम कर दिया है, और अब हम जनता की अदालत में हैं।

रांची/गुवाहाटी, 7 अप्रैल (आईएएनएस)। असम में लगातार 10 दिनों तक झामुमो प्रत्याशियों के पक्ष में चुनावी कैंप करने के बाद झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन मंगलवार की शाम को रांची लौट आए हैं। इसके पहले उन्होंने गुवाहाटी में मीडिया से बात करते हुए कहा कि इस चुनावी अभियान का नतीजा चाहे जो हो, हमारी पार्टी ग्राउंड पर मजबूती के साथ डटी है। हमने असम में अपना काम कर दिया है, और अब हम जनता की अदालत में हैं।

असम विधानसभा चुनाव में पहली बार झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने 126 में से 16 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे हैं। यह संख्या भले सीमित हो, लेकिन पार्टी ने जिन क्षेत्रों को चुना है, वे रणनीतिक दृष्टि से अहम माने जा रहे हैं। खासकर चाय बागान इलाकों में रहने वाले ‘टी-ट्राइब्स’ को केंद्र में रखकर झामुमो ने अपनी पूरी चुनावी रणनीति तैयार की।

सीएम हेमंत सोरेन ने अपने 10 दिवसीय दौरे के दौरान चाय बागानों, ग्रामीण इलाकों और आदिवासी बहुल क्षेत्रों में लगातार रैलियां और रोड शो किए। उनके साथ उनकी पत्नी और विधायक कल्पना सोरेन भी कई दिनों तक मैदान में सक्रिय रहीं। इस दौरान झामुमो ने ‘पहचान’ और ‘अधिकार’ को केंद्रीय मुद्दा बनाते हुए टी-ट्राइब्स के लिए अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा और न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने का वादा प्रमुखता से उठाया।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि झामुमो ने असम में पारंपरिक चुनावी मुद्दों से हटकर ‘आइडेंटिटी पॉलिटिक्स’ को केंद्र में लाने की कोशिश की है। सीएम हेमंत सोरेन ने चाय बागान समुदायों के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों को झारखंड से जोड़ते हुए भावनात्मक अपील की, जो इन इलाकों में एक हद तक चर्चा का विषय बनी।

हालांकि, इस रणनीति की सफलता को लेकर मतभेद हैं। एक तरफ, झामुमो के अभियान ने टी-ट्राइब्स के मुद्दों को मुख्यधारा की राजनीति में फिर से प्रमुखता से ला दिया है, वहीं दूसरी ओर असम की जटिल सामाजिक संरचना और मजबूत क्षेत्रीय-राष्ट्रीय दलों की मौजूदगी इसे सीमित प्रभाव वाला प्रयास भी बना सकती है। चुनाव प्रचार के दौरान कुछ विवाद भी सामने आए।

झामुमो नेतृत्व ने आरोप लगाया कि उन्हें कुछ स्थानों पर सभाओं की अनुमति नहीं दी गई और हेलीकॉप्टर संचालन में भी बाधाएं डाली गईं। पार्टी ने इन घटनाओं को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप बताते हुए राजनीतिक मुद्दा बनाया और इसे अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश की।

असम की जनसभाओं में हेमंत सोरेन ने दावा किया है कि यदि उनकी पार्टी 8 से 10 सीटें भी जीतती है तो वह सत्ता के समीकरणों में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। विश्लेषकों के अनुसार, झामुमो का ‘मिशन असम’ तत्काल चुनावी जीत से ज्यादा दीर्घकालिक राजनीतिक विस्तार की रणनीति का हिस्सा है। यह प्रयास पार्टी को झारखंड से बाहर पहचान दिलाने, राष्ट्रीय पार्टी बनने की दिशा में कदम बढ़ाने और हेमंत सोरेन को एक व्यापक आदिवासी नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

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Created On :   7 April 2026 6:59 PM IST

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