छात्रों को सवाल पूछने पर धमकाया नहीं जा सकता, असहिष्णुता संविधान के खिलाफ जस्टिस उज्ज्वल भुइयां
नई दिल्ली, 30 अगस्त (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा है कि लोकतंत्र में सवाल पूछना या किसी मुद्दे पर अलग राय रखना अवज्ञा नहीं, बल्कि नागरिकता, स्वतंत्रता और संवैधानिक जिम्मेदारी का जरूरी हिस्सा है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि छात्रों को अलग नजरिया रखने या सवाल पूछने पर धमकाया अथवा सजा की चेतावनी नहीं दी जा सकती। ऐसा करना संविधान के खिलाफ है और सत्ता तथा पद का दुरुपयोग माना जाएगा।
जस्टिस भुइयां ने रविवार को नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (एनएलयू) दिल्ली के दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए ये बातें कहीं। उन्होंने कहा कि संविधान समाज और संस्थानों में विचारों की एकरूपता नहीं चाहता। लोकतंत्र की मजबूती के लिए असहमति और स्वतंत्र विचार जरूरी हैं। विश्वविद्यालयों की भूमिका केवल डिग्री देने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उन्हें छात्रों में स्वतंत्र सोच, सवाल करने की क्षमता और तर्कपूर्ण असहमति को बढ़ावा देना चाहिए।
उन्होंने कहा, “लोकतन्त्र में सवाल करने का अधिकार अवज्ञा का काम नहीं है। यह नागरिकता, आजादी और संवैधानिक जिम्मेदारी का एक जरूरी एक्सप्रेशन है।”
जस्टिस भुइयां ने कहा कि जब छात्र अलग दृष्टिकोण सामने रखते हैं या सवाल पूछते हैं, तो उन्हें धमकाया नहीं जा सकता और न ही सजा की धमकी दी जा सकती है। उन्होंने इसे गैर-संवैधानिक और सत्ता के गलत इस्तेमाल के रूप में बताया।
जस्टिस भुइयां ने कानूनी पेशे में नैतिकता और पेशेवर ईमानदारी के महत्व पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि कानून का पेशा ऐसी कई नैतिक जिम्मेदारियों पर आधारित है, जिनमें से अधिकांश लिखित नियमों में दर्ज नहीं हैं। पेशेवर ईमानदारी बनाए रखने के लिए साहस और दृढ़ विश्वास की जरूरत होती है।
उन्होंने अमेरिकी जस्टिस ओलिवर वेंडेल होम्स के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि वकालत को केवल रोजी-रोटी कमाने का जरिया नहीं, बल्कि जीवन जीने के एक तरीके के रूप में देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार शानदार जीवन का अर्थ केवल पैसा या प्रसिद्धि हासिल करना नहीं, बल्कि खुद से बड़ी किसी चीज के लिए प्रयास करना और न्याय की तलाश करना है।
जस्टिस भुइयां ने कानून के पेशे में कदम रखने वाले छात्रों से कहा कि पूरी पेशेवर जिंदगी में उनकी हिम्मत, प्रतिबद्धता और चरित्र की परीक्षा होती रहेगी। उन्होंने कहा कि ईमानदारी बनाए रखने का रास्ता कठिन है, खासकर तब जब कोई व्यक्ति को देख नहीं रहा हो। लेकिन इसी चुनौती में बेहतर और सार्थक जीवन जीने की संभावना भी छिपी है।
उन्होंने छात्रों को आगे उच्च शिक्षा और कानूनी शोध के क्षेत्र में जाने के लिए प्रोत्साहित किया। जस्टिस भुइयां ने कहा कि मजबूत अकादमिक संस्थान न्यायपालिका के लिए महत्वपूर्ण संपत्ति हैं। न्यायपालिका जहां जरूरी बौद्धिक इनपुट के लिए अकादमिक जगत की ओर देख सकती है, वहीं विश्वविद्यालय कानून के विभिन्न क्षेत्रों में शोध को आगे बढ़ाकर न्याय व्यवस्था की बड़ी सेवा कर सकते हैं। उन्होंने न्यायपालिका और अकादमिक जगत को एक-दूसरे का प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि पूरक बताया।
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Created On :   30 Aug 2026 3:56 PM IST












