वीरेन डंगवाल पुण्यतिथि ऐसे कवि जिन्होंने अपनी रचना में जीवन की साधारण चीजों को दिया खास अर्थ

वीरेन डंगवाल पुण्यतिथि ऐसे कवि जिन्होंने अपनी रचना में जीवन की साधारण चीजों को दिया खास अर्थ
‘कहीं नहीं था वह शहर, जहां मैं रहा कई बरस’, यह पंक्ति हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण कवि वीरेन डंगवाल की संवेदनशील रचनात्मक दुनिया की झलक देती है। अपनी जनवादी और मानवीय दृष्टि वाली कविताओं के माध्यम से उन्होंने आम इंसान की जिंदगी, उसके संघर्ष, सपनों और उम्मीदों को बेहद सहजता से अभिव्यक्त किया। 28 सितंबर को उनकी पुण्यतिथि है। वीरेन डंगवाल की कविता केवल पढ़ने की चीज नहीं, बल्कि उसे ठहरकर महसूस करने का अनुभव है।

नई दिल्ली, 27 सितंबर (आईएएनएस)। ‘कहीं नहीं था वह शहर, जहां मैं रहा कई बरस’, यह पंक्ति हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण कवि वीरेन डंगवाल की संवेदनशील रचनात्मक दुनिया की झलक देती है। अपनी जनवादी और मानवीय दृष्टि वाली कविताओं के माध्यम से उन्होंने आम इंसान की जिंदगी, उसके संघर्ष, सपनों और उम्मीदों को बेहद सहजता से अभिव्यक्त किया। 28 सितंबर को उनकी पुण्यतिथि है। वीरेन डंगवाल की कविता केवल पढ़ने की चीज नहीं, बल्कि उसे ठहरकर महसूस करने का अनुभव है।

वीरेन डंगवाल की कविता पाठक को जीवन की उन छोटी-छोटी चीजों की ओर देखने के लिए प्रेरित करती है, जिन्हें अक्सर हम अनदेखा कर देते हैं। यही कारण है कि उनकी रचनाएं आम जीवन के मामूली दृश्यों और वस्तुओं के माध्यम से अपने समय की जटिल सामाजिक सच्चाइयों को पकड़ने में सफल होती हैं। उनकी कविताओं में रोजमर्रा के जीवन की सादगी, सामाजिक असमानताओं पर तीखा प्रहार और मानवीय संवेदना का अनूठा संगम दिखाई देता है।

वीरेन डंगवाल को उनकी साहित्यिक उपलब्धियों के लिए कई महत्वपूर्ण सम्मानों से नवाजा गया। उनके प्रमुख कविता संग्रहों में ‘इसी दुनिया में’ (1991), ‘दुश्चक्र में सृष्टा’ (2002) और ‘स्याही ताल’ शामिल हैं। ‘इसी दुनिया में’ के लिए उन्हें 1992 में रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार और 1993 में श्रीकांत वर्मा स्मृति पुरस्कार मिला। वहीं ‘दुश्चक्र में सृष्टा’ के लिए उन्हें 2004 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें शमशेर सम्मान भी प्राप्त हुआ।

वीरेन डंगवाल का जन्म 5 अगस्त 1947 को उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले के कीर्तिनगर में हुआ था। उनके पिता रघुनंदन प्रसाद डंगवाल उत्तर प्रदेश सरकार में कमिश्नरी के प्रथम श्रेणी अधिकारी थे। वीरेन डंगवाल ने मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, कानपुर, बरेली और नैनीताल में शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा पूरी की। उन्होंने 1968 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमए और डीफिल की उपाधियां हासिल कीं।

अध्यापन के साथ-साथ वीरेन डंगवाल ने पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान बनाई। बरेली में अध्यापन के दौरान उन्होंने ‘अमर उजाला’ के संपादन से भी जुड़कर काम किया। वह बेहद मिलनसार, सहज और मददगार स्वभाव के व्यक्ति थे। युवा पीढ़ी के बीच उनकी लोकप्रियता विशेष रूप से उल्लेखनीय रही।

वीरेन डंगवाल लंबे समय तक जन संस्कृति मंच से जुड़े रहे और इसके राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी रहे। बीमारी के दौरान भी उन्होंने अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक सक्रियता को बनाए रखा। मुंह के कैंसर से जूझते हुए भी जब संभव हुआ, वह दिल्ली में धरना-प्रदर्शनों, कविता पाठ और सांस्कृतिक आयोजनों में शामिल होते रहे। उनकी यह सक्रियता उनकी जीवितता और सामाजिक प्रतिबद्धता का उदाहरण थी।

उनकी कविताएं ‘आएंगे, उजले दिन जरूर आएंगे’ और ‘दुश्चक्र में सृष्टा’ कविता पोस्टरों के माध्यम से भी व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचीं। 28 सितंबर 2015 को 68 वर्ष की आयु में बरेली में उनका निधन हो गया। उनके जाने से हिंदी साहित्य जगत ने एक संवेदनशील, जनपक्षधर और सहज कवि को खो दिया।

वीरेन डंगवाल की कविताएं आज भी विद्यार्थियों, शोधार्थियों और साहित्य प्रेमियों के बीच पढ़ी जाती हैं। उनकी रचनाएं बताती हैं कि कविता के लिए विषय केवल बड़े घटनाक्रम नहीं, बल्कि हमारे आसपास का सामान्य जीवन भी हो सकता है। साधारण चीजों में असाधारण अर्थ तलाशना ही उनकी कविता की सबसे बड़ी विशेषता थी। यही कारण है कि उनकी कविताएं आज भी पाठकों को समाज, समय और मनुष्य के प्रति अधिक संवेदनशील बनने की प्रेरणा देती हैं।

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Created On :   27 Sept 2026 11:16 PM IST

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