ध्रुपद के प्रहरी ऋत्विक सान्याल, जिन्होंने काशी की मिट्टी की धुन को सात समुंदर पार तक पहुंचाया

ध्रुपद के प्रहरी ऋत्विक सान्याल, जिन्होंने काशी की मिट्टी की धुन को सात समुंदर पार तक पहुंचाया
काशी सिर्फ एक शहर नहीं बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं, घाटों, गंगा और संगीत की गूंज का संगम है। इसी काशी की मिट्टी से निकली एक ऐसी ही गूंज हैं पंडित ऋत्विक सान्याल, जिन्होंने ध्रुपद जैसे गंभीर और आध्यात्मिक संगीत को न सिर्फ संभाला बल्कि उसे सात समुंदर पार तक पहुंचा दिया।

नई दिल्ली, 11 अप्रैल (आईएएनएस)। काशी सिर्फ एक शहर नहीं बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं, घाटों, गंगा और संगीत की गूंज का संगम है। इसी काशी की मिट्टी से निकली एक ऐसी ही गूंज हैं पंडित ऋत्विक सान्याल, जिन्होंने ध्रुपद जैसे गंभीर और आध्यात्मिक संगीत को न सिर्फ संभाला बल्कि उसे सात समुंदर पार तक पहुंचा दिया।

बिहार के कटिहार में 12 अप्रैल 1953 को जन्मे ऋत्विक सान्याल का संगीत से रिश्ता बचपन से ही जुड़ गया था। हालांकि असली सफर तब शुरू हुआ, जब उन्होंने ध्रुपद की डागर परंपरा में विधिवत प्रशिक्षण लेना शुरू किया। उन्होंने जिया फरीदुद्दीन डागर जैसे उस्तादों से तालीम ली। यह कोई आसान रास्ता नहीं था ध्रुपद में हर स्वर साधना मांगता है, हर राग समय और धैर्य की परीक्षा लेता है लेकिन सान्याल ने इसे सिर्फ सीखा नहीं, बल्कि जिया।

वे सिर्फ गायक नहीं हैं बल्कि वे एक विद्वान भी हैं, जिन्होंने संगीत को सिर्फ सुना या गाया ही नहीं, बल्कि उसे समझा, परखा और उस पर लिखा भी। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और डीन के रूप में उन्होंने न जाने कितने छात्रों को ध्रुपद की बारीकियाँ सिखाईं। उनके लिए संगीत सिर्फ मंच तक सीमित नहीं था बल्कि कक्षा में भी उतना ही जीवंत था।

उनकी खासियत यह है कि वे परंपरा को निभाते हुए भी समय के साथ चलना जानते हैं। ध्रुपद को अक्सर लोग गंभीर या कठिन संगीत मानते हैं लेकिन ऋत्विक सान्याल ने इसे आम श्रोताओं के लिए भी सुलभ बनाने की कोशिश की। उन्होंने नए रागों की रचना की, ध्रुपद को नए संदर्भों में प्रस्तुत किया और यह दिखाया कि यह शैली आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।

उनका सफर भारत तक ही सीमित नहीं रहा। उन्होंने यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और एशिया के कई देशों में अपनी प्रस्तुतियों से ध्रुपद का जादू बिखेरा। विदेशी श्रोता, जो शायद इस शैली से पहले परिचित भी नहीं थे, उनकी गायकी सुनकर वे भी मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। उनकी गायकी में काशी की मिट्टी की खुशबू साफ महसूस होती है। गंगा की शांति, मंदिरों की घंटियां और सुबह के रियाज की ताजगी सब कुछ उनकी आवाज में समाया हुआ है। यही वजह है कि जब वे विदेशों में गाते हैं, तो सिर्फ एक कलाकार नहीं बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत के प्रतिनिधि बनकर सामने आते हैं।

उनके योगदान को देश ने भी सराहा है। उन्हें पद्म श्री और संगीत नाटक अकादमी जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। इतनी उपलब्धियों के बावजूद उनके भीतर का साधक आज भी वैसा ही है। वे आज भी उतने ही विनम्र, समर्पित और सीखने को हमेशा तैयार रहते हैं, जितने अपने शुरुआती दिनों में थे।

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Created On :   11 April 2026 9:32 AM IST

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