पाकिस्तान में दो मानवाधिकार वकीलों की गिरफ्तारी पर अमेरिका-ब्रिटेन के शिक्षाविदों ने जताई चिंता
नई दिल्ली, 11 अक्टूबर (आईएएनएस)। पाकिस्तान के दो वकील पिछले कुछ महीनों से दुनिया भर में सुर्खियां बटोर रहे हैं। इन मानवाधिकार वकीलों का नाम इमान जैनब मजारी-हाजिर और हादी अली चट्ठा है। फिलहाल हिरासत में हैं और इसे लेकर अमेरिका और ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों में कार्यरत पाकिस्तानी मूल के कई शिक्षाविदों और विद्वानों ने आवाज उठाई है। उन्होंने दोनों वकीलों के खिलाफ आरोप वापस लेने और उन्हें तत्काल रिहा करने की मांग की है।
शिक्षाविदों ने इस मामले को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के शासन से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताया है। दोनों वकीलों के समर्थन में जारी बयान पर हस्ताक्षर करने वालों ने पाकिस्तानी प्रतिष्ठान की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने के बावजूद उन्हें दोबारा जेल में रखने की साजिश रची गई।
रिपोर्ट्स के अनुसार, जनवरी 2026 में दोनों वकीलों को सोशल मीडिया पोस्ट मामले में इलेक्ट्रॉनिक अपराधों की रोकथाम संबंधी कानून (पीईसीए) के तहत 17 साल की जेल की सजा सुनाई गई थी। उनकी पोस्ट में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों की आलोचना की गई थी।
शिक्षाविदों ने कहा कि पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने 17 सितंबर 2026 को उनकी सजा निलंबित करते हुए उन्हें जमानत दे दी थी। हालांकि, कुछ ही घंटों के भीतर पुलिस ने उन्हें एक अलग मामले में हिरासत में ले लिया। दोनों वकील फिलहाल हिरासत में बताए जा रहे हैं।
पाकिस्तान के अखबार डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक, शिक्षाविदों ने कहा कि मजारी ने जबरन गुमशुदगी के मामलों के खिलाफ आवाज उठाई है, पीड़ितों और उनके परिवारों का प्रतिनिधित्व किया है तथा प्रतिष्ठान को सार्वजनिक रूप से चुनौती दी है। वहीं, चट्ठा ने ईशनिंदा के आरोपों का सामना कर रहे लोगों और मृत्युदंड की सजा पाए कैदियों का बचाव किया है।
बयान में कहा गया, “आपराधिक कानून का इस्तेमाल असहमति की आवाज दबाने या अपनी कानूनी पैरवी के कारण वकीलों को डराने के हथियार के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।”
हस्ताक्षरकर्ताओं ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों की वाचा (आईसीसीपीआर) का पक्षकार होने के नाते पाकिस्तान की जिम्मेदारी है कि वह राज्य के संस्थानों की आलोचना करने के अधिकार की रक्षा करे।
डॉन की रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षाविदों ने यह भी कहा कि सोशल मीडिया पर टिप्पणी करने के लिए 17 साल की सजा देना पाकिस्तान के इस दायित्व के अनुरूप नहीं है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कानूनी संस्थाओं, जिनमें इंटरनेशनल कमीशन ऑफ ज्यूरिस्ट्स भी शामिल है, के रुख का हवाला दिया।
हस्ताक्षरकर्ताओं ने पाकिस्तान की संघीय सरकार, न्यायपालिका और अन्य सरकारी संस्थानों से देश के संवैधानिक तथा अंतरराष्ट्रीय कानूनी दायित्वों का पालन करने की अपील की। उन्होंने यह सुनिश्चित करने की मांग की कि दोनों वकीलों को आगे मनमाने ढंग से हिरासत में न रखा जाए।
बयान पर हस्ताक्षर करने वाले प्रमुख शिक्षाविदों में स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज की आयशा सिद्दीका, टफ्ट्स यूनिवर्सिटी के फहद हमायूं, यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया के हाशिम बिन राशिद, यूनिवर्सिटी ऑफ वॉल्वरहैम्प्टन की मारिया राशिद, सिटी यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क के रजा रूमी, यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की रीम खुर्शीद, यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रैडफोर्ड के यूनुस समद और यूनिवर्सिटी ऑफ वारविक की जोहा वसीम शामिल हैं।
अस्वीकरण: यह न्यूज़ ऑटो फ़ीड्स द्वारा स्वतः प्रकाशित हुई खबर है। इस न्यूज़ में BhaskarHindi.com टीम के द्वारा किसी भी तरह का कोई बदलाव या परिवर्तन (एडिटिंग) नहीं किया गया है| इस न्यूज की एवं न्यूज में उपयोग में ली गई सामग्रियों की सम्पूर्ण जवाबदारी केवल और केवल न्यूज़ एजेंसी की है एवं इस न्यूज में दी गई जानकारी का उपयोग करने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञों (वकील / इंजीनियर / ज्योतिष / वास्तुशास्त्री / डॉक्टर / न्यूज़ एजेंसी / अन्य विषय एक्सपर्ट) की सलाह जरूर लें। अतः संबंधित खबर एवं उपयोग में लिए गए टेक्स्ट मैटर, फोटो, विडियो एवं ऑडिओ को लेकर BhaskarHindi.com न्यूज पोर्टल की कोई भी जिम्मेदारी नहीं है|
Created On :   11 Oct 2026 6:49 PM IST












