जम्मू-कश्मीर में शिक्षकों के लिए बड़ी खबर, विधानसभा में टीईटी से छूट का प्रस्ताव पारित

जम्मू-कश्मीर में शिक्षकों के लिए बड़ी खबर, विधानसभा में टीईटी से छूट का प्रस्ताव पारित
जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने गुरुवार को एक प्रस्ताव पारित किया, जिसके तहत 2019 से पहले नियुक्त शिक्षकों को शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) पास करने की अनिवार्यता से छूट दी गई है।

श्रीनगर, 24 सितंबर (आईएएनएस)। जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने गुरुवार को एक प्रस्ताव पारित किया, जिसके तहत 2019 से पहले नियुक्त शिक्षकों को शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) पास करने की अनिवार्यता से छूट दी गई है।

दरअसल, 31 अक्टूबर 2019 की तय तारीख से पहले नियुक्त किए गए शिक्षकों की चिंताओं को दूर करने के लिए विधानसभा में चर्चा और मंजूरी के लिए एक प्रस्ताव पेश किया गया। विधायकों ने ऐसे शिक्षकों की मुश्किलों पर जोर दिया और टीईटी की जरूरत से उचित राहत की मांग की।

इस प्रस्ताव का पास होना इस मुद्दे पर विचार करने की दिशा में एक अहम कदम है और अब इस मामले पर सही स्तर पर आगे की कार्रवाई की जरूरत है।

जम्मू-कश्मीर के शिक्षकों को नौकरी की असुरक्षा, मानसिक तनाव और पेशेवर अपमान का सामना करना पड़ रहा था, क्योंकि नौकरी कर रहे शिक्षकों के लिए टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (टीईटी) पास करना जरूरी कर दिया गया था।

शिक्षकों का कहना था कि 10 से 25 वर्ष तक पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए एंट्री-लेवल टेस्ट पास करने की शर्त उनके पेशेवर सम्मान को कम करती है और उनके अब तक के काम के रिकॉर्ड को नजरअंदाज करती है।

शिक्षकों का दावा था कि मानसिक दबाव, लगातार चिंता और करियर को लेकर अनिश्चितता के कारण वे क्लासरूम में पढ़ाने पर पूरी तरह ध्यान नहीं दे पा रहे थे। उनका तर्क था कि वे पहले से ही रोजाना की क्लास के अलावा चुनाव ड्यूटी, जनगणना के काम और सरकारी कार्यक्रमों जैसे गैर-शिक्षण कार्यों से जूझ रहे हैं।

उन्होंने दावा किया कि उन शिक्षकों पर नियम लागू किए जा रहे हैं, जिनकी नियुक्ति इस क्षेत्र में राष्ट्रीय शिक्षा कानून औपचारिक रूप से लागू होने से बहुत पहले हुई थी, जिससे दूसरे राज्यों की तुलना में निष्पक्षता को लेकर चिंताएं पैदा हो रही हैं।

शिक्षकों का एक और तर्क यह है कि जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम लागू होने से पहले, जम्मू-कश्मीर एक अलग संवैधानिक ढांचे के तहत काम करता था। राइट टू एजुकेशन (आरटीई) एक्ट, 2009 के प्रावधान अलग तरह से लागू किए गए थे।

भर्ती के नियम पूरी तरह से अलग थे, इसलिए नौकरी कर रहे स्थानीय शिक्षकों को अपनी दशकों की सेवा के दौरान टीईटी क्वालिफाई करने के लिए कभी भी जरूरी मौके, समय-समय पर टेस्ट या प्रशासनिक इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं मिला।

शिक्षकों को डर है कि प्रशासन टीईटी की शर्त का इस्तेमाल एक प्रशासनिक फिल्टर के तौर पर करेगा। यहां तक कि जिन शिक्षकों को जबरदस्ती रिटायरमेंट से छूट मिली थी, जैसे कि वे जिनकी रिटायरमेंट में 5 वर्ष से कम समय बचा था, उनके लिए भी लंबे समय से रुके हुए प्रमोशन और ग्रेड बढ़ाने के लिए टीईटी पास करना जरूरी कर दिया गया था।

एडवांस्ड रिसर्च डिग्री (जैसे एमएड या पीएचडी) रखने वाले अनुभवी शिक्षकों को एंट्री-लेवल, रटकर याद करने वाले कॉम्पिटिटिव एग्जाम की तैयारी करना बुनियादी तौर पर अपमानजनक और अव्यावहारिक लगा।

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Created On :   24 Sept 2026 9:03 PM IST

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