पत्रकार से धक्का-मुक्की मामले में राहुल गांधी के खिलाफ याचिका पर 3 नवंबर को सुनवाई, सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस

नई दिल्ली, 27 अक्टूबर (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि वह 3 नवंबर को एक गर्भवती महिला पत्रकार की उस याचिका पर सुनवाई करेगा, जिसमें लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर धक्का-मुक्की करने का आरोप लगाया गया है।
यह मामला इंडिया ब्लॉक के नेताओं के वोटर लिस्ट के एसआईआर को लेकर सुप्रीम कोर्ट परिसर तक निकाले गए मार्च के दौरान का है।
मामले का जिक्र वरिष्ठ वकील गौरव भाटिया ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत के सामने किया। उन्होंने कहा कि महिला पत्रकार से जुड़ी याचिका अभी तक सुनवाई के लिए लिस्ट नहीं हुई है।
गौरव भाटिया के जवाब में सीजेआई की अध्यक्षता वाली बेंच ने स्पष्ट किया कि मामले में पहले ही नोटिस जारी किया जा चुका है और इस पर 3 नवंबर को सुनवाई होगी।
पत्रकार रिचा पराशर ने आरोप लगाया था कि जब वह विपक्षी नेताओं के मार्च को कवर कर रही थीं, तो राहुल गांधी ने उनका हाथ पकड़ा और आक्रामक तरीके से खींचा, जिसके बाद उनके सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें धक्का दिया और वह गिर गईं।
इसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। तीन महीने की गर्भवती रिचा पराशर ने आरोप लगाया कि यह घटना 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट परिसर में विपक्षी नेताओं के विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई अफरा-तफरी के बीच हुई।
कांग्रेस ने आरोपों से इनकार किया है और इसे राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया है। वहीं पार्टी नेताओं और समर्थकों ने घटना के वीडियो प्रसारित किए हैं और सवाल उठाया है कि क्या वीडियो से यह साबित होता है कि राहुल गांधी ने पत्रकार को धक्का दिया।
यह घटनाक्रम शीर्ष अदालत परिसर में और उसके आसपास राजनीतिक प्रदर्शनों के खिलाफ सुरक्षा उपायों की मांग वाली एक अलग याचिका की पृष्ठभूमि में आया है।
15 अक्टूबर को सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने उस याचिका पर नोटिस जारी किया था और घटना से संबंधित सीसीटीवी फुटेज और अन्य डिजिटल सबूतों को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया था।
यह मार्च इंडिया ब्लॉक के नेताओं ने तब निकाला था, जब सीजेआई ने राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से एसआईआर को लेकर ज्ञापन सौंपने के लिए मिलने के अनुरोध को ठुकरा दिया था।
सीजेआई ने विपक्षी नेताओं को स्थापित कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट आने की सलाह दी थी और कहा था कि लंबित मामलों पर चर्चा के लिए बैठक बुलाना शक्तियों के पृथक्करण के संवैधानिक सिद्धांत के विपरीत होगा।
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