जन्मदिन विशेष पद्मश्री पंडित शिवनाथ मिश्र ने सितार वादन और ठुमरी गायन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिलाई पहचान

जन्मदिन विशेष पद्मश्री पंडित शिवनाथ मिश्र ने सितार वादन और ठुमरी गायन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिलाई पहचान
देश के ख्याति प्राप्त और पद्मश्री से सम्मानित सितार वादक पंडित शिवनाथ मिश्र का जन्म 12 अक्टूबर 1943 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में हुआ था। उन्होंने सितार वादन और ठुमरी गायन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। वे बनारस घराने से सितार वादक हैं।

नई दिल्ली, 11 अक्टूबर (आईएएनएस)। देश के ख्याति प्राप्त और पद्मश्री से सम्मानित सितार वादक पंडित शिवनाथ मिश्र का जन्म 12 अक्टूबर 1943 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में हुआ था। उन्होंने सितार वादन और ठुमरी गायन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। वे बनारस घराने से सितार वादक हैं।

पंडित शिवनाथ मिश्र सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में संगीत विभाग में विभागाध्यक्ष रह चुके हैं। 8 वर्ष की उम्र में भारतीय शास्त्रीय संगीत (गायन व सितार) की शिक्षा अपने चाचा ठुमरी सम्राट स्वर्गीय पंडित महादेव प्रसाद मिश्र से ली थी। वर्ष 2022 में उनको जैसे ही पद्म श्री देने की घोषणा की गई, बनारस के उनके घर पर बधाई देने वालों का तांता लग गया। भीड़ इस कदर बढ़ी कि लोगों को संभालना मुश्किल हो गया।

सितार वादकों में पंडित रविशंकर के बाद पंडित शिवनाथ मिश्र ही वह हस्ती हैं जिन्हें पद्म पुरस्कार प्राप्त हुआ है। काशी की शास्त्रीय संगीत परंपरा में पंडित शिवनाथ मिश्र का नाम बड़े आदर से लिया जाता है, खासकर जब से उन्हें पद्म श्री सम्मान से नवाजा गया है।

उनके बेटे देवव्रत मिश्र ने उनकी इस उपलब्धि पर गर्व जताते हुए कहा था, "मेरे पिता जी मेरे गुरु भी हैं और उनका पद्म श्री से सम्मानित होना बहुत बड़ी बात है। सितार तंत्रकारी के क्षेत्र में यह सम्मान उनके लिए एक महत्वपूर्ण मान्यता है।"

देवव्रत ने यह भी बताया कि भारतीय शास्त्रीय संगीत में तबला और गायन के लिए कई सम्मान हैं लेकिन तंतु वादन में यह सम्मान कम ही मिलता है। इस उपलब्धि के लिए उन्होंने सरकार का धन्यवाद किया था। उन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि गुरु-शिष्य परंपरा को आज भी जीवित रखा जा रहा है और लोग दुनिया भर से संगीत की शिक्षा लेने आते हैं, साथ ही भारतीय संस्कृति की गहराइयों को भी समझते हैं।

पंडित शिवनाथ मिश्र का संगीत ज्ञान और समर्पण न केवल उनके लिए बल्कि पूरी काशी की सांस्कृतिक विरासत के लिए एक अमूल्य धरोहर है। उनके योगदान ने कई संगीतकारों को प्रेरित किया है और उनकी शिक्षाओं से संगीत की दुनिया में उनका डंका बजता है।

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Created On :   11 Oct 2026 5:28 PM IST

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