मानसिक क्रूरता के पर्याप्त साक्ष्य न हों तो यह तलाक का आधार नहीं बन सकताः झारखंड हाई कोर्ट
रांची, 17 सितंबर (आईएएनएस)। झारखंड हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि पत्नी का एक ही मकान में पति से अलग रहना, वैवाहिक संबंधों में दूरी बनाना या पति के परिजनों के साथ कथित दुर्व्यवहार मात्र मानसिक क्रूरता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। तलाक के लिए क्रूरता का आरोप ठोस, विशिष्ट और विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित करना जरूरी है।
अदालत ने इस आधार पर पति की तलाक संबंधी अपील खारिज करते हुए रांची फैमिली कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें तलाक की याचिका खारिज कर दी गई थी। न्यायालय ने कहा कि वैवाहिक जीवन में सामान्य मतभेद, छोटी-मोटी परेशानियां, स्वभावगत असहमति या पति-पत्नी के बीच असंगति को अपने आप मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। क्रूरता का स्तर इतना गंभीर होना चाहिए कि परिस्थितियों में पति-पत्नी का साथ रहना उचित रूप से असंभव हो जाए।
तलाक के लिए लगाए गए आरोपों को साबित करने की जिम्मेदारी उस पक्ष की है, जो क्रूरता को आधार बनाकर विवाह विच्छेद की मांग कर रहा है। मामला डॉक्टर पति डॉ मयंक और सहायक प्रोफेसर पत्नी रीमा से जुड़ा है। दोनों का विवाह 28 जुलाई 2011 को विशेष विवाह अधिनियम के तहत हुआ था। इसके बाद हिंदू रीति-रिवाज से भी विवाह हुआ। पति ने विशेष विवाह अधिनियम की धारा 27(1)(डी) के तहत क्रूरता को आधार बनाकर रांची फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दी थी।
फैमिली कोर्ट ने 20 मार्च 2023 को उनकी याचिका खारिज कर दी थी, जिसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट में अपील की थी। पति का आरोप था कि पत्नी उसके वृद्ध और बीमार माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार करती थी, वैवाहिक संबंध बनाने से इनकार करती थी और वर्ष 2012 के बाद दोनों के बीच कोई शारीरिक संबंध नहीं रहा। उसका यह भी दावा था कि पत्नी एक ही मकान में अलग चूल्हा-चौका चलाती थी और उससे बातचीत नहीं करती थी।
पति ने कहा था कि इन परिस्थितियों से उसे मानसिक परेशानी हुई और उसकी पढ़ाई तथा करियर भी प्रभावित हुआ। पत्नी ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा था कि शादी के लिए उसके पिता ने 10 लाख रुपए दिए थे और इसके बावजूद पढ़ाई के नाम पर पैसे की मांग की गई। उसने पति की पढ़ाई के लिए ऋण लेने और ससुराल की देखभाल करने का भी दावा किया। पत्नी ने प्रताड़ना के आरोप में बरियातू थाने में मामला दर्ज कराया था। उसने अदालत से कहा कि वह अब भी पति के साथ रहना चाहती है।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और गवाहों के बयानों की समीक्षा के बाद पति के आरोपों को सामान्य और अस्पष्ट पाया। अदालत ने कहा कि कोई ऐसी विशिष्ट घटना या ठोस साक्ष्य सामने नहीं आया, जिससे पत्नी के व्यवहार को वैवाहिक जीवन जारी रखने के लिहाज से गंभीर मानसिक क्रूरता माना जा सके। इस आधार पर खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए अपील खारिज कर दी।
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Created On :   17 Sept 2026 5:34 PM IST












