मैरिटल रेप पर सीजेआई सूर्यकांत बोले- शादी से महिला की सहमति का अधिकार खत्म नहीं होता

मैरिटल रेप पर सीजेआई सूर्यकांत बोले- शादी से महिला की सहमति का अधिकार खत्म नहीं होता
वैवाहिक बलात्कार (मैरिटल रेप) को अपराध घोषित करने की मांग से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई अब निर्णायक चरण में पहुंच गई है। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि विवाह किसी महिला की शारीरिक स्वतंत्रता और उसकी सहमति के संवैधानिक अधिकार को समाप्त नहीं कर सकता। वहीं, केंद्र सरकार ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) में मौजूद प्रावधान का बचाव करते हुए कहा कि इस विषय पर फैसला करना संसद का अधिकार क्षेत्र है, न कि अदालत का।

नई दिल्ली, 9 सितंबर (आईएएनएस)। वैवाहिक बलात्कार (मैरिटल रेप) को अपराध घोषित करने की मांग से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई अब निर्णायक चरण में पहुंच गई है। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि विवाह किसी महिला की शारीरिक स्वतंत्रता और उसकी सहमति के संवैधानिक अधिकार को समाप्त नहीं कर सकता। वहीं, केंद्र सरकार ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) में मौजूद प्रावधान का बचाव करते हुए कहा कि इस विषय पर फैसला करना संसद का अधिकार क्षेत्र है, न कि अदालत का।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार का हलफनामा रिकॉर्ड पर लेने के बाद मामले की अंतिम सुनवाई अगले महीने तय कर दी है। अदालत ने निर्देश दिया कि तीन सप्ताह बाद बुधवार और गुरुवार को इस मामले को अंतिम बहस के लिए सूचीबद्ध किया जाए। इससे संकेत मिला है कि अब इस संवेदनशील मुद्दे पर विस्तृत सुनवाई होगी।

सुनवाई के दौरान पीठ ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि विवाह का संबंध किसी महिला से उसकी व्यक्तिगत स्वायत्तता या सहमति का अधिकार नहीं छीन सकता। अदालत ने सवाल उठाया कि क्या केवल विवाह के आधार पर किसी महिला की इच्छा के विरुद्ध शारीरिक संबंध बनाने की कानूनी छूट दी जा सकती है। पीठ ने कहा कि यह मामला केवल पति-पत्नी के संबंधों का नहीं, बल्कि महिला की गरिमा, स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों का भी है।

केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में दलील दी कि संसद ने 2023 में भारतीय न्याय संहिता बनाते समय इस मुद्दे पर व्यापक विचार-विमर्श किया था। उन्होंने कहा कि विवाह संस्था के भीतर यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी में लाना या नहीं लाना एक नीतिगत और सामाजिक फैसला है, जिसे संसद ही तय कर सकती है। अदालत को इस तरह के नीति संबंधी निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

याचिकाओं में भारतीय न्याय संहिता के उस अपवाद को चुनौती दी गई है, जिसके तहत बालिग पत्नी के साथ पति द्वारा उसकी इच्छा के विरुद्ध बनाए गए शारीरिक संबंधों को बलात्कार की परिभाषा से बाहर रखा गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अंतिम सुनवाई के दौरान इस वैधानिक अपवाद की संवैधानिक वैधता की विस्तार से जांच की जाएगी। यदि अदालत इसे असंवैधानिक या मनमाना मानती है, तो इस संबंध में आपराधिक कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है।

अब सभी पक्षों की अंतिम दलीलों के बाद सुप्रीम कोर्ट इस महत्वपूर्ण कानूनी और संवैधानिक प्रश्न पर अपना फैसला सुनाएगा, जिसका असर देश में विवाह, सहमति और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े कानूनों पर पड़ सकता है।

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Created On :   9 Sept 2026 10:34 PM IST

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