युद्ध कहीं भी हो, शांति हर जगह खतरे में पड़ती है चिन्मय अमृत महोत्सव ग्लोबल सम्मेलन में जयशंकर

नई दिल्ली, 25 अक्टूबर (आईएएनएस)। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने रविवार को कहा कि दुनिया में कहीं भी होने वाला युद्ध हर जगह शांति के लिए खतरा है। उन्होंने आतंकवाद की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि आतंकवाद को राजकीय नीति या कूटनीतिक उद्देश्य हासिल करने के साधन के रूप में इस्तेमाल करना पूरी तरह अस्वीकार्य है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट और सख्त रुख अपनाने का आह्वान किया।
जयशंकर नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित चिन्मय मिशन के ग्लोबल सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। यह तीन दिवसीय सम्मेलन चिन्मय मिशन की स्थापना के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में साल भर चले आयोजनों के समापन का हिस्सा है।
अपने संबोधन की शुरुआत करते हुए उन्होंने कहा, "हमारे इस सम्मेलन का थीम अद्वैत है। जिसका सामान्य अर्थ हमारे अस्तित्व को एक वास्तविकता के रूप में स्वीकार करना है। हम सभी से आग्रह करते हैं कि हम दुनिया को 'दूसरों' पर ध्यान केंद्रित करने के नजरिए से न देखें।"
वैश्विक व्यवस्था में सहयोग और प्रतिस्पर्धा के बीच जारी बहस का उल्लेख करते हुए जयशंकर ने कहा, " मानवता ने हमेशा उन लोगों के बीच मतभेद देखे हैं, जो प्रतिस्पर्धा को प्राथमिकता देते हैं और वे लोग जो सहयोग को एक महत्वपूर्ण गुण मानते हैं। वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए देशों को आपसी सहयोग और साझा जिम्मेदारी की भावना को मजबूत करना होगा। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 1 में इस संस्था को यह जिम्मेदारी दी गई थी कि वह साझा लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए विभिन्न देशों के कार्यों में तालमेल बिठाने का केंद्र बने।
विदेश मंत्री ने कहा, "आज की दुनिया एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई है। ऐसे में किसी एक क्षेत्र में होने वाला संघर्ष केवल उसी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका असर वैश्विक शांति, आर्थिक समृद्धि और विकास पर भी पड़ता है। शांति की अविभाज्यता पर विचार करें तो पाएंगे कि आज दुनिया में कहीं भी होने वाला युद्ध हर जगह की शांति के लिए खतरा बन जाता है। वर्तमान में दुनिया में दो बड़े संघर्ष चल रहे हैं एक यूक्रेन में और दूसरा पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व) में। संघर्ष और हिंसा दुनिया की प्रगति को बाधित करते हैं और देशों के बीच सहयोग की संभावनाओं को कमजोर करते हैं।"
उन्होंने आगे कहा, "जब हम यह कहते हैं कि संवाद और कूटनीति ही एकमात्र समाधान है, तो भारत पूरी दुनिया की भावना को ही व्यक्त कर रहा होता है। हम स्वयं भी इस दिशा में प्रयास कर रहे हैं और इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए अन्य साझेदारों के साथ मिलकर काम करने के लिए भी तैयार हैं।"
आतंकवाद के मुद्दे पर जयशंकर ने कहा, "यह शांति के लिए एक घातक खतरा है। आतंकवाद को राज्य की नीति के साधन के रूप में इस्तेमाल करना किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता। लेकिन ये बढ़ता है क्योंकि कुछ देश इसको पनपने देते हैं जीरो टोलरेंस की नीति पर काम नहीं करना चाहते हैं।"
उन्होंने उन देशों पर भी निशाना साधा जो ऐतिहासिक अनुभवों से सबक लेने के बजाय राजनीतिक हितों को प्राथमिकता देते हैं। विदेश मंत्री ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से कहा," आतंकवाद के प्रति अधिक सतर्क रहने और उसके खिलाफ शून्य सहिष्णुता की नीति पर काम करने की जरूरत है।" उनका संदेश ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब दुनिया के कई हिस्सों में संघर्ष, हिंसा और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां बनी हुई हैं।
जयशंकर ने एआई के बढ़ते दखल को लेकर कहा, " एआई सभी बदलावों की जड़ बनने की क्षमता रखता है। लेकिन इतनी व्यापक और इतने बड़े परिणाम लाने वाली चीज को केवल कुछ ही लोगों के हाथों में नहीं छोड़ा जा सकता। यह आजादी और लोकतंत्रीकरण के उन रुझानों के खिलाफ होगा, जिन्हें दुनिया ने पिछले 80 वर्षों में देखा है। इसी कारण से, भारत एक जिम्मेदार, समावेशी और मानव-केंद्रित दृष्टिकोण का पुरजोर समर्थन करता है।"
कोविड के दौरान भारत की निभाई जिम्मेदारियों का भी विदेश मंत्री ने उल्लेख किया। उन्होंने कहा, "अपनी क्षमताओं का सबसे अच्छा उपयोग कैसे किया जाए, यह अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए हमेशा से एक अहम मुद्दा रहा है। लेकिन यह केवल हिसाब-किताब का नतीजा नहीं हो सकता। इसके लिए एक खास सोच की जरूरत है। ये दूसरों के साथ बांटने की सोच, योगदान देने की सोच है। इसके लिए जरूरी नहीं कि केवल सबसे विकसित देश ही उदाहरण पेश करें। कोविड महामारी के दौरान, भारत ने उन देशों को वैक्सीन देने का फैसला किया जो पीछे छूट सकते थे, जबकि भारत में खुद भी टीकाकरण अभियान चल रहा था।"
भारत की वसुधैव कुटुंबकम के फलसफे पर भी जयशंकर ने प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, " 'वसुधैव कुटुंबकम' (पूरी दुनिया एक परिवार है) को केवल उपदेश के रूप में नहीं, बल्कि व्यवहार में लाया जाता है। हम जानते हैं कि हम एक अपूर्ण दुनिया में रहते हैं, लेकिन हम सभी लगातार अधिक पूर्णता की ओर बढ़ने का प्रयास करते हैं। संयुक्त राष्ट्र के संदर्भ में, इसका अर्थ है उसकी कमियों और सीमाओं को पहचानना और उनमें सुधार की कोशिश करना। 'सुधारवादी बहुपक्षवाद' की मांग दिन-ब-दिन मजबूत होती जा रही है। दुनिया के बड़े हिस्सों को निर्णय लेने की प्रक्रिया से बाहर नहीं रखा जा सकता। संयुक्त राष्ट्र को वैश्विक संकटों में केवल एक दर्शक बने रहने के बजाय, नेतृत्व दिखाना चाहिए।"
चिन्मय मिशन के इस वैश्विक सम्मेलन का उद्घाटन 23 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था। सम्मेलन चिन्मय मिशन की 75 वर्ष की यात्रा और उसके आध्यात्मिक तथा सामाजिक योगदान को रेखांकित करने के लिए आयोजित किया गया। प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर मिशन की यात्रा को भारत के विकसित भारत-2047 के लक्ष्य से भी जोड़ा था।
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