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झाबुआ उप-चुनाव से होगा कमलनाथ सरकार के कामकाज का लिटमस टेस्ट

झाबुआ उप-चुनाव से होगा कमलनाथ सरकार के कामकाज का लिटमस टेस्ट

भोपाल, 11 अक्टूबर (आईएएनएस)। वैसे तो एक विधानसभा क्षेत्र के उप-चुनाव का सियासी तौर पर ज्यादा महत्व नहीं होता है, मगर मध्यप्रदेश के झाबुआ में होने जा रहे उप-चुनाव में बड़ा संदेश छुपा हुआ है, क्योंकि यह चुनाव जहां नौ माह पुरानी कमलनाथ सरकार के कामकाज का लिटमस टेस्ट होगा। वहीं सरकार के भविष्य को लेकर चल रही कयासबाजी पर विराम लगाने वाला भी हो सकता है।

झाबुआ में 21 अक्टूबर को चुनाव होने वाला है। इस चुनाव को जीतने में सत्ताधारी दल कांग्रेस और विपक्षी दल भाजपा ने पूरा जोर लगाना शुरू कर दिया है। एक तरफ जहां राज्य के मुख्यमंत्री कमलनाथ कांग्रेस उम्मीदवार कांतिलाल भूरिया के लिए सभा और रोड शो कर चुके है। वहीं भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने उम्मीदवार भानू भूरिया के पक्ष में जोर लगाने वाले हैं।

यह चुनाव कांग्रेस के लिए ज्यादा अहमियत वाला है क्योंकि उसके पास विधानसभा में पूर्ण बहुमत नहीं है। राज्य की 230 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस का 114 और भाजपा का 108 सीटों पर कब्जा है। वर्तमान कमलनाथ सरकार समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और निर्दलीय विधायकों के समर्थन से चल रही है। यह चुनाव जीतने से कांग्रेस की स्थिति कुछ मजबूत होगी क्योंकि उसकी सदस्य संख्या बढ़कर 115 हो जाएगी। वहीं भाजपा इस चुनाव में कांग्रेस को हराकर यह बताने की कोशिश में है कि, राज्य सरकार के कामकाज से प्रदेश की जनता संतुष्ट नहीं है।

मुख्यमंत्री कमलनाथ का कहना है, कांग्रेस की सरकार ने सत्ता में आते ही अपने वचन को पूरा किया है, जुमले नहीं होंगे, जो कहा जाएगा उसे हकीकत में पूरा किया जाएगा। बीते 15 सालों भाजपा की सरकार का शासन रहा, जिसके नेता सिर्फ घोषणाएं और जुमलेबाजी कर अपने चेहरा चमकाते रहे।

उन्होंने कहा, भाजपा ने जो काम 15 साल में नहीं किए, वह काम कांग्रेस की सरकार 15 माह में करके दिखाएगी, बीते आठ माह इस बात की गवाही देते है। चुनाव से पहले जो वादे किए गए, चाहे किसान कर्ज माफी हो, सामाजिक सुरक्षा पेंशन हो, सभी को पूरा किया गया है।

वहीं भाजपा ने कांग्रेस के शासनकाल पर हमले तेज कर दिए हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह का कहना है कि, राज्य की कांग्रेस सरकार ने जनता से वादा खिलाफी की है। न तो किसानों का कर्ज माफ हुआ, न ही बेरोजगारों को भत्ता मिला। वहीं आदिवासियों के साथ अन्याय हो रहा है। इतना ही नहीं भाजपा के शासनकाल में शुरू की गई जनहितकारी योजनाओं को बंद कर दिया गया । इससे जनता में भारी असंतोष है और झाबुआ उपचुनाव में इसका जवाब जनता देगी।

झाबुआ में उपचुनाव का शोर लगाातर बढ़ता जा रहा है। दोनों दलों के उम्मीदवार और नेताओं ने जनता के बीच जाकर अपनी बात कहने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। राजनीतिक विश्लेषक साजी थामस ने कहा, आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र का यह चुनाव कांग्रेस के लिए भाजपा के मुकाबले कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस चुनाव में जीतने से कांग्रेस के विधायकों की संख्या तो बढ़ेगी ही साथ में यह संदेश भी जाएगा कि, राज्य मे कमलनाथ सरकार के प्रति अभी जनता में असंतोष नहीं है। एक लिहाज से यह चुनाव कमलनाथ सरकार के नौ माह के कामकाज का लिटमस टेस्ट भी होगा। वहीं अगर भाजपा जीत गई तो बहुमत से दूर कांग्रेस सरकार के लिए आने वाले दिन ज्यादा मुसीबत भरे हो सकते है, क्योंकि समर्थन देने वाले विधायक वैसे ही सरकार पर दवाब बनाए रहते हैं।

फिलहाल चुनाव जीतने का दोनों दल दावा कर रहे है, प्रचार में लगे है। एक दूसरे पर आरोप लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। चुनाव कोई भी जीते मगर नतीजा सियासी गर्माहट तो लाएगा ही।

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क्या है ड्रोन ? देश की सुरक्षा के लिए कितना घातक हो सकता है, जानें सबकुछ

क्या है ड्रोन ? देश की सुरक्षा के लिए कितना घातक हो सकता है, जानें सबकुछ

डिजिटल डेस्क, श्रीनगरजम्मू कश्मीर की सीमा के आसपास ड्रोन की हलचलें लगातार तेज होती जा रही हैं। इसके बाद भारत ने भी ये मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया है कि ड्रोन की इस तरह की गतिविधियां न सिर्फ भारत बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सुरक्षा के दृष्टिकोण से घातक साबित हो सकती हैं। इस हमले के बाद से भारत में ड्रोन के इस्तेमाल को लेकर बहस छिड़ गई है। इस रिपोर्ट में जानिए आखिर ड्रोन है क्या और यह कैसे ऑपरेट होते हैं? इसके इस्तेमाल और इससे क्या नुकसान हो सकता है और देश में ड्रोन्स को उड़ाने को लेकर सरकार की क्या गाइडलाइन्स हैं।

ड्रोन क्या होता है?
ड्रोन्स को UAV यानी Unmanned aerial vehicles या RPAS यानी Remotely Piloted Aerial Systems भी कहा जाता है। आम बोल चाल वाली भाषा में इसे मिनी हैलिकॉप्टर भी कहते हैं। अक्सर शादी के दौरान फोटोग्राफी के लिए आपने ड्रोन का इस्तेमाल होते हुए देखा होगा। यह एक ऐसा यंत्र है, जिसमें एचडी कैमरे, ऑनबोर्ड सेंसर और जीपीएस लगा होता है। इसे नियंत्रित करने के लिए एक सॉफ्टवेयर की आवश्यकता होती है। इसके चारों और 4 रोटर्स लगे होते हैं, जिनकी मदद से यह आसमान में ऊंचा उड़ने में सक्षम होता है। एक ड्रोन का वजन 250 ग्राम से लेकर 150 किलोग्राम से भी ज्यादा हो सकता है।

ड्रोन को उड़ाने के लिए सॉफ्टवेयर, जीपीएस और रिमोट की आवश्यकता होती है। रिमोट के जरिए ही ड्रोन को ऑपरेट और कंट्रोल कर सकते हैं। ड्रोन पर लगे रोटर्स की गति को रिमोट की जॉयस्टिक के जरिए कंट्रोल किया जाता है। वहीं, जीपीएस दिशाएं बताता हैं, जीपीएस दुर्घटना होने से पहले ही ऑपरेटर को चेतावनी भेज देता है। 

ड्रोन हमले किस तरह से हो सकते हैं?
ड्रोन का इस्तेमाल कई देशों की सेनाएं कर रही हैं, क्योंकि ये साइज में छोटे होते हैं इसलिए रडार की पकड़ में आसानी से नहीं आ पाते हैं, साथ ही दुर्गम इलाकों में भी गुपचुप घुसपैठ कर सकते हैं। यही कारण है कि सेना में इनका इस्तेमाल बढ़ने लगा है।ड्रोन हमले दो प्रकार से संभव हैं। एक तरीका ये है कि ड्रोन में हथियार या विस्फोटक लगा दिए जाते हैं और ड्रोन इन हथियारों या विस्फोटक को लक्ष्य पर ड्रॉप कर देता है। ड्रोन से हमले का दूसरा तरीका है ड्रोन को खुद ही एक विस्फोटक में बदल दिया जाए। 

कितने घातक हो सकते हैं ड्रोन हमले?
ये ड्रोन के प्रकार और पेलोड पर निर्भर है। पेलोड मतलब ड्रोन कितना वजन अपने साथ लेकर उड़ सकता है। ड्रोन की पेलोड क्षमता जितनी ज्यादा होगी वो अपने साथ उतनी ज्यादा मात्रा में विस्फोटक सामग्री लेकर उड़ सकता है। अमेरिका के MQ-9 रीपर ड्रोन अपने साथ 1700 किलो तक वजन ले जाने में सक्षम हैं।

ड्रोन से अबतक के बड़े हमले
2020 में अमेरिका ने ईरानी मेजर जनरल सुलेमानी को मार गिराया था। इससे पहले 2019 में यमन के हूती विद्रोहियों ने साऊदी अरब की अरामको ऑयल कंपनी पर ड्रोन हमला किया था। पाकिस्तान के वजीरिस्तान में 2009 के दौरान एक ड्रोन हमले में 60 लोग मारे गए थे।

देश में ड्रोन्स के इस्तेमाल को लेकर गाइडलाइन्स 
देश में नागरिक उड्डयन मंत्रालय(Ministry of Civil Aviation) ने ड्रोन उड़ाने पर कई तरह के प्रतिबंध लगा रखे हैं। ड्रोन के वजन और साइज के अनुसार इन प्रतिबंधों को कई वर्ग में बांटा गया है।

1.नेनो ड्रोन्स- इसको उड़ाने के लिए लाइसेंस की आवश्यकता नहीं पड़ती।

2.माइक्रो ड्रोन्स- इसको उड़ाने के लिए UAS Operator Permit-I से अनुमति लेनी पड़ती है और ड्रोन पायलट को SOP(Standard operating procedure) का पालन करना होता है। 

इनसे बड़े ड्रोन उड़ाने के लिए डीजीसीए से परमिट(लाइसेंस ) की आवश्यकता होती है। अगर आप किसी प्रतिबंधित जगह पर ड्रोन उड़ाना चाहते हैं तो इसके लिए भी आपको डीजीसीए से अनुमति लेनी पड़ेगी। बिना अनुमति के ड्रोन उड़ाना गैरकानूनी है और इसके लिए ड्रोन ऑपरेटर पर भारी जुर्माने का भी प्रावधान है।

ड्रोन उड़ाने के लिए प्रतिबंधित जगह

  • मिलिट्री एरिया के आसपास या रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इलाका।
  • इंटरनेशनल एयरपोर्ट के 5 किलोमीटर और नेशनल एयरपोर्ट के 3 किलोमीटर का दायरा।
  • इंटरनेशनल बॉर्डर के 25 किलोमीटर का दायरा ।
  • इसके अलावा ड्रोन की कैटेगरी को मद्देनजर रखते हुए इन्हें कितनी ऊंचाई तक उड़ाया जा सकता है वो भी निर्धारित है।

ड्रोन उड़ाने के लिए जरूरी हैं लाइसेंस
नैनो ड्रोन्स को छोडकर किसी भी तरह के ड्रोन्स को उड़ाने के लिए लाइसेंस या परमिट की जरूरत पड़ती है।ड्रोन उड़ाने के लिए लाइसेंस दो कैटेगरी के अंतर्गत दिए जाते हैं, जिसमें पहला है स्टूडेंट रिमोट पायलट लाइसेंस और दूसरा है रिमोट पायलट लाइसेंस।इन दोनों लाइसेंस को प्राप्त करने के लिए ड्रोन ऑपरेटर की न्यूनतम उम्र 18 साल और अधिकतम 65 साल होनी चाहिए। लाइसेंस के लिए ऑपरेटर कम से कम 10वीं पास या 10वीं क्लास के बराबर उसके पास किसी मान्यता प्राप्त बोर्ड से डिग्री होना अति आवश्यक हैं।आवेदन करने वाले व्यक्ति को डीजीसीए स्पेसिफाइड मेडिकल एग्जामिनेशन भी पास करना जरूरी है। लाइसेंस के लिए बैकग्राउंड भी चेक होता है।

जुर्माने का प्रावधान

  • बिना लाइसेंस उड़ाने पर 25000 रुपए का जुर्माना।
  • नो-ऑपरेशन जोन यानी प्रतिबंधित क्षेत्र में उड़ान भरने पर 50000 रुपए का जुर्माना।
  • ड्रोन का थर्ड पार्टी बीमा ना होने पर 10000 रुपए का जुर्माना लग सकता है।