अनूठी परंपरा: महंगाई की मार - इस बार दामाद जी को नहीं मिल सकी भेंट में सोने की अंगूठी, गाजे-बाजे के साथ गधे पर निकली सवारी.....जोगी जी वाह जोगी जी...

महंगाई की मार - इस बार दामाद जी को नहीं मिल सकी भेंट में सोने की अंगूठी, गाजे-बाजे के साथ गधे पर निकली सवारी.....जोगी जी वाह जोगी जी...
  • अनोखी और सौ साल पुरानी परंपरा हंसी-ठिठोली के साथ निभाई
  • अनंतरा देशमुख ने वर्षों पहले अपने दामाद का हंसी-मजाक में गधे पर जुलूस निकाला था
  • हंसी और ठिठोली के बीच होली का पर्व मनाया गया

Beed News. बिना उसे रंग लगाए – जोगी जी वाह, जोगी जी… फागुन लौट ना जाए…जोगी जी वाह, जोगी जी....इन्हीं फागुनी सुरों और रंगों की मस्ती के बीच केज तहसील के विडा गांव में होली पर एक अनोखी और सौ साल पुरानी परंपरा हंसी-ठिठोली के साथ निभाई गई, लेकिन इस बार यह परंपरा निभा पाना इतना आसान नहीं था, नियन के हिसाब से नए दामाद को गधे की सवारी कराई जाती है, लिहाजा जब नया दामाद गांव के खोजी दलों के हाथ नहीं लगा, तो गांव के उस शख्स को रोका गया, जो पहले कभी इस परंपरा में शामिल नहीं हुआ था। इसके अलावा इस बार महंगाई बढ़ने के कारण दामाद जी को सोने की अंगूठी नहीं दी जा रही। कपड़ा ही दिया गया। आखिरकार जैसे तैसे परंपारा पूरी की गई।

पिछले सौ साल से बदस्तूर निभायी जा रही है प्रथा

बामुश्किल जुटाए गधे को खूब सजाया गया। इसके बाद शुरु हुई दामाद जी की सवारी, जिन्हें होलिका दहन की रात एक अनजान स्थान पर विश्राम कराया गया था। इसके दूसरे दिन मुकम्मल की गई वो अनूठी प्रथा जिसे पिछले सौ साल से बदस्तूर निभाया जा रहा है, लेकिन

जोगी जी वाह, जोगी जी…कोई ढूंढे मूंगा कोई ढूंढे मोतिया, हम ढूंढे अपनी जोगनिया को ...

कभी यह शख्स इस गांव में अपनी दुल्हन की तलाश में आया था। बात पक्की हुई और शादी हो गई, इसके बाद गांव की असल परंपरा की बारी आई, तो दामाद जी को यह सुनहरा अवसर भी प्राप्त हुआ। विडा गांव में होली के अवसर पर दामाद को गधे पर बिठाकर जुलूस निकालने की अनूठी परंपरा इस वर्ष भी हर्षोल्लास और गाजे-बाजे के साथ निभाई गई।


कैसे शुरू हुई परंपरा?

बताया जाता है कि विडा निवासी अनंतरा देशमुख ने वर्षों पहले अपने दामाद का हंसी-मजाक में गधे पर जुलूस निकाला था। वही प्रसंग समय के साथ परंपरा में बदल गया। तब से हर वर्ष होली के अवसर पर गांव के युवा ‘दामाद’ की तलाश करते हैं। होली से लगभग आठ दिन पहले चयन की प्रक्रिया शुरू होती है और होली के दिन पूरे गांव में उसका जुलूस निकाला जाता है।

इस वर्ष शिवाजी गालफाड़े बने ‘सम्मानित दामाद’

इस वर्ष यह अनोखा ‘सम्मान’ शिवाजी गालफाड़े को मिला। गालफाड़े मूल रूप से केज तहसील के डोंनगांव के निवासी हैं, लेकिन विवाह के बाद वे अपनी ससुराल विडा में ही बस गए। वे बाबूराव दुनघव के दामाद हैं और गांव में घर बनाकर दिहाड़ी मजदूरी से परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं।

होली के दिन ग्रामीण उनके घर पहुंचे और पारंपरिक ढंग से उन्हें गधे पर बिठाकर पूरे गांव में जुलूस निकाला। जुलूस के दौरान उन्हें पुरानी चप्पलों और जूतों की माला पहनाई गई तथा रंग-गुलाल उड़ाते हुए गांव की परिक्रमा कराई गई। गालफाड़े ने बताया कि उन्हें इस आयोजन की पूर्व जानकारी नहीं थी, जिससे पूरा माहौल और भी रोचक बन गया।


परंपरा के अनुसार दामाद को कपड़े और सोने की अंगूठी भेंट की जाती है। हालांकि, इस वर्ष सोने की बढ़ती कीमतों के कारण केवल कपड़े का एक टुकड़ा भेंट किया गया। जुलूस की शुरुआत दिवंगत अजित पवार की तस्वीर पर पुष्पमाला अर्पित कर श्रद्धांजलि देने के साथ हुई।

इस अनोखी परंपरा को देखने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे और रंग, हंसी और ठिठोली के बीच होली का पर्व मनाया गया।

होली की धूम

जिले के माजलगांव, गेवराई, परली वैद्यनाथ, आष्टी, पाटोदा, धारूर, वडवणी, केज, अंबाजोगाई और शिरूर कासार समेत विभिन्न तहसीलों में रंगों का त्योहार परंपरागत रीति से हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। ग्रामीण अंचलों तक “रंग बरसे” और “होली के दिन दिल खिल जाते हैं” जैसे लोकप्रिय गीतों की धुन पर युवा झूमते नजर आए। लोगों ने एक-दूसरे को रंग और गुलाल लगाकर गले मिलते हुए शुभकामनाएं दीं। छोटे बच्चों ने बुजुर्गों को रंग लगाकर उनका आशीर्वाद लिया। मंगलवार सुबह से ही रंगोत्सव की शुरुआत हो गई। परिवार के मुखिया और वृद्ध परिजनों के माथे पर अबीर-गुलाल का तिलक कर दीर्घायु का आशीर्वाद लिया गया। युवक-युवतियां टोलियां बनाकर रंगों की मस्ती में सराबोर दिखे। बच्चों ने पिचकारियों से रंगों की बौछार कर उत्सव का आनंद लिया, वहीं महिलाएं भी एक-दूसरे के घर पहुंचकर अबीर-गुलाल लगाकर होली की बधाई देती नजर आईं। दोपहर तक शहर और गांव रंगों से सराबोर हो चुके थे और फागुन की मस्ती अपने चरम पर थी।

Created On :   4 March 2026 5:52 PM IST

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