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बॉम्बे हाई कोर्ट: वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत संपत्ति का मालिकाना विवाद नहीं सुलझाया जा सकता, शेयर मूल्य निर्धारण मामले में विदेशी मध्यस्थता आदेश लागू करने योग्य

Mumbai News. बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत संपत्ति का मालिकाना विवाद नहीं सुलझाया जा सकता है। वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत ट्रिब्यूनल संपत्ति का मालिकाना घोषित नहीं कर सकता। धारा 23 तभी लागू होता है, जब वरिष्ठ नागरिक ने अपनी संपत्ति शर्त के साथ ट्रांसफर की हो। यहां ऐसा मामला नहीं है। अदालत ने वरिष्ठ नागरिक को पत्नी और बेटियों से संपत्ति के बीच विवाद के निपटारे के लिए सिविल कोर्ट जाने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति शर्मिला देशमुख की एकल पीठ ने भांडुप निवासी 65 वर्षीय भाऊसाहेब महतारजी कडवे की याचिका खारिज करते हुए कहा कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक के भरण पोषण और कल्याण अधिनियम 2007 के तहत अपीलीय अथॉरिटी एडिशनल कलेक्टर ने वरिष्ठ नागरिक अधिनियम की धारा 23 के नियमों और मामले के तथ्यों पर सही ढंग से विचार किया है। पुणे और भांडुप के फ्रेंड्स कॉलोनी में संपत्ति याचिकाकर्ता द्वारा ट्रांसफर नहीं की गई हैं, बल्कि असल में पत्नी कल्पना कड़वे के नाम पर खरीदी गई हैं। इसके रजिस्टर्ड डॉक्यूमेंट्स की वैलिडिटी पर किसी भी आपत्ति की स्थिति में सही फोरम सिविल कोर्ट है। पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला दिया, जिसमें वरिष्ठ नागरिक अधिनियम की धारा 23 के नियमों पर विचार किया और कहा कि ट्रिब्यूनल को बेदखली का आदेश देने का अधिकार है, जहां एक्ट के मकसद को पूरा करने के लिए ऐसा करना जरूरी हो। पीठ ने कहा कि यह देखा गया कि यह वरिष्ठ नागरिकों को उन मामलों में अपने अधिकार तेजी से हासिल करने में मदद करता है, जहा प्रॉपर्टी ट्रांसफर की गई है। यह फैसला तथ्यों के आधार पर अलग है और इस मामले में लागू नहीं होता है। यह मामला संपत्ति के स्वामित्व का विवाद है। वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत संपत्ति का मालिकाना विवाद नहीं सुलझाया जा सकता। पीठ ने अपीलीय प्राधिकरण के आदेश को सही माना और याचिका खारिज कर दी।याचिकाकर्ता ने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक के भरण पोषण और कल्याण अधिनियम 2007 के तहत अपनी पत्नी और बेटियों के खिलाफ याचिका दायर किया था। उसने याचिका में आरोप लगाया कि वह अपनी कमाई से पुणे और भांडुप में फ्लैट खरीदे थे। उन्होंने उस संपत्ति को पत्नी के नाम कर दी। पत्नी ने उन्हें प्रताड़ित किया। अब वे संपत्ति वापस अपने नाम करवाना चाहते हैं, जिसमें पत्नी और बेटियां फ्लैट बेचने में बाधा डाल रही हैं। इस पर पीठ ने सब-डिविजनल ऑफिसर के उस फैसले को सही माना, जिसमें कहा गया था कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत केवल भरण-पोषण दिया जा सकता है। संपत्ति का मालिकाना विवाद इस अधिनियम के दायरे में नहीं आता। संपत्ति पत्नी के नाम रजिस्टर्ड थी। यह साबित नहीं हुआ कि संपत्ति पति ने इस शर्त पर ट्रांसफर की थी कि पत्नी उनकी देखभाल करेगी। इसलिए धारा 23 लागू नहीं होती। यदि संपत्ति के स्वामित्व पर विवाद है, तो याचिकाकर्ता को सिविल कोर्ट जाना होगा। भांडुप का जो फ्लैट याचिकाकर्ता के अपने नाम था, उसके बिक्री में पत्नी और बेटियों को बाधा न डालने का निर्देश दिया गया।
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कंपनी के विवाद में विदेशी मध्यस्थता आदेश लागू करने योग्य
उधर बॉम्बे हाई कोर्ट ने कंपनी में शेयर मूल्य निर्धारण पर विवाद के मामले में कहा कि कंपनियों के विवाद में विदेशी मध्यस्थता आदेश लागू करने योग्य है। अदालत ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) और रिजर्व बैंक आफ इंडिया (आरबीआई) की अनुमति संबंधी आपत्ति को मानने से इनकार कर दिया। लंदन की अदालत ने इटली की कंपनी ‘प्रिस्मियन कैवी ई सिस्टेमी एस.आर.एल.’ के पक्ष में एक करोड़ शेयर ट्रांसफर करने का आदेश दिया था। न्यायमूर्ति अभय आहुजा की एकल पीठ ने इटली की कंपनी की याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता का मामला विदेशी मध्यस्थता के निर्णय को भारत में लागू कराने से जुड़ा है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही अवॉर्ड को सही ठहरा चुका है। अब हाई कोर्ट के समक्ष मुख्य प्रश्न यह है कि क्या प्रतिवादियों की नई आपत्तियों के बावजूद अवॉर्ड को पूरी तरह निष्पादित किया जाए और शेयर ट्रांसफर पूरा कराया जाए? पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता का पक्ष अवॉर्ड पहले ही घोषित हो चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने आपत्तियां खारिज कर दी था। अब प्रतिवादी नई तकनीकी आपत्तियां उठाकर देरी कर रहे हैं। पीठ को आदेश लागू करवाना चाहिए और शेयर ट्रांसफर पूरा करवाना चाहिए। जबकि प्रतिवादियों का दावा है कि पक्ष फेमा के तहत आरबीआई की अनुमति जरूरी है। अवॉर्ड को आंशिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता। कुछ कानूनी अड़चनें हैं, जिनके बिना ट्रांसफर संभव नहीं। पीठ ने माना कि लंदन में एलसीआईए नियमों के तहत इटली की कंपनी ‘प्रिस्मियन कैवी ई सिस्टेमी एस.आर.एल.’ के पक्ष में जो फाइनल आर्बिट्रेशन अवॉर्ड पारित हुआ था, वह भारत में लागू है। यह अवॉर्ड पहले ही 2019 में हाई कोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट द्वारा वैध और लागू करने योग्य घोषित किया जा चुका था। ऐसे में फेमा और आरबीआई की अनुमति संबंधी आपत्ति वैल्यूएशन (शेयर मूल्य निर्धारण) पर विवाद यह है कि अवॉर्ड पूरी तरह एक साथ ही लागू नहीं हो सकता है। पीठ ने कहा कि निष्पादन कोर्ट अवॉर्ड के पीछे नहीं जा सकती, जो पहले तय हो चुका है और उसे फिर से नहीं उठाया जा सकता। प्रतिवादियों को निर्देश दिया गया कि वे अपने 1 करोड़ 2 लाख 52 हजार 275 शेयर याचिकाकर्ता कंपनी को ट्रांसफर करें, जैसा कि आर्बिट्रेशन अवॉर्ड में आदेशित है। प्रतिवादी विजय करिया अब कंपनी के डायरेक्टर या मैनेजिंग डायेक्टर के रूप में कार्य नहीं कर सकते। उन्हें कंपनी के प्रबंधन में हस्तक्षेप करने से रोका गया। आरबीआई के पत्र में केवल यह कहा गया कि शेयर ट्रांसफर विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम फेमा नियमों के अनुसार होना चाहिए।
Created On :   22 Feb 2026 8:41 PM IST








