डॉक्टर बनने की अनदेखी कहानी: मेडिकल सीट मिलने के बाद शुरू होता है असली संघर्ष

मेडिकल सीट मिलने के बाद शुरू होता है असली संघर्ष

नई दिल्ली: भारत में हर साल लाखों छात्र देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक, नीट (NEET) में शामिल होते हैं। जिन छात्रों को मेडिकल सीट मिल जाती है, उनके लिए यह अक्सर वर्षों की मेहनत और त्याग का परिणाम होता है।

लेकिन कम आय वाले परिवारों से आने वाले कई छात्रों के लिए मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिलना सिर्फ आधी लड़ाई जीतने जैसा ही है।

जब सौरभ को मुंबई के ग्रांट गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज (Grant Government Medical College) में प्रवेश मिला, तो यह उसके जीवन का सबसे खुशी का पल होना चाहिए था। महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव में पले-बढ़े सौरभ के लिए डॉक्टर बनना लगभग नामुमकिन जैसा लगता था।

फिर, जब वह नीट की तैयारी कर रहा था, उसके पिता को दिल का दौरा पड़ा।

रातों-रात परिवार की स्थिर आय का स्रोत खत्म हो गया। उसके पिता नियमित रूप से काम करने की स्थिति में नहीं रहे और परिवार की जिम्मेदारी घर के अन्य सदस्यों पर आ गई।

फिर भी सौरभ ने अपनी पढ़ाई जारी रखी।

उसने ऑनलाइन कोचिंग के माध्यम से तैयारी की और अक्सर पढ़ाई के दबाव के साथ-साथ घर की आर्थिक चिंताओं से भी जूझता रहा। महीनों की तैयारी, मॉक टेस्ट और लगातार अनुशासन का परिणाम तब मिला जब उसे सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीट मिल गई।

लेकिन मेडिकल कॉलेज में प्रवेश के साथ ही चुनौतियों का एक नया दौर शुरू हो गया।

हॉस्टल में रहने का खर्च, मेस का खर्च, किताबें, यात्रा, परीक्षा शुल्क, अध्ययन सामग्री और रोज़मर्रा के खर्च तेजी से बढ़ने लगे। सरकारी मेडिकल कॉलेज शिक्षा को अधिक सुलभ बनाते हैं, लेकिन मेडिकल शिक्षा के पांच वर्षों का खर्च आज भी कई परिवारों के लिए एक बड़ी आर्थिक चुनौती है।

सौरभ कहते हैं, "मुझे सिर्फ पैसों की जरूरत नहीं थी। मुझे किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जो यह विश्वास करे कि मैं यह कर सकता हूं |”

ऐसी कहानियां भारत में मेडिकल शिक्षा की एक कम चर्चित वास्तविकता को सामने लाती हैं।

अधिकांश सार्वजनिक चर्चाएं मेडिकल सीटों की संख्या, नए मेडिकल कॉलेजों और डॉक्टर-रोगी अनुपात पर केंद्रित रहती हैं। लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आने वाले हजारों छात्रों के लिए चुनौतियां दाखिले के बाद भी समाप्त नहीं होतीं।

मेडिकल शिक्षा का खर्च केवल ट्यूशन फीस तक सीमित नहीं है। पहली पीढ़ी के शिक्षार्थियों के लिए परिवार में कोई आपात स्थिति, आय का नुकसान या नियमित खर्चों को पूरा न कर पाना वर्षों की मेहनत को खतरे में डाल सकता है।

इनमें से कई छात्र ग्रामीण और वंचित समुदायों से आते हैं, जहां आज भी स्वास्थ्य सेवाओं और चिकित्सा पेशेवरों की कमी है। वे सीमित स्वास्थ्य सुविधाओं, इलाज के लिए लंबी यात्राओं और स्थानीय स्वास्थ्य व्यवस्था की चुनौतियों को करीब से समझते हैं।

आज जीएसके स्कॉलर्स प्रोग्राम (GSK Scholars Programme) के माध्यम से, जिसे बडी4स्टडी (Buddy4Study) और फाउंडेशन फॉर एक्सीलेंस (एफएफई) [Foundation For Excellence (FFE)] के सहयोग से संचालित किया जा रहा है, 23 राज्यों के 564 मेडिकल स्कॉलर्स को अपनी शिक्षा जारी रखने के लिए सहायता प्रदान की जा रही है।

लेकिन इन आंकड़ों के पीछे एक बड़ा सवाल छिपा हुआ है।

जब भारत अपने स्वास्थ्यकर्मी तंत्र को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब यह चर्चा केवल मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश तक सीमित नहीं रह सकती। प्रतिभाशाली छात्रों को मेडिकल कॉलेज तक पहुंचाना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण यह सुनिश्चित करना भी है कि वे अपनी शिक्षा पूरी कर सकें।

क्योंकि कई भावी डॉक्टरों के लिए सबसे कठिन सफर उस समय शुरू होता है, जब वे अपनी मेडिकल सीट हासिल कर चुके होते हैं।

Created On :   13 Jun 2026 3:11 PM IST

Tags

Next Story