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रेन वाटन हार्वेस्टिंग से मिली जलसंकट से मुक्ति, छोटे से गांव में किया प्रयोग

February 25th, 2019 14:35 IST
रेन वाटन हार्वेस्टिंग से मिली जलसंकट से मुक्ति, छोटे से गांव में किया प्रयोग

डिजिटल डेस्क, नागपुर।  रेन वाटर हार्वेस्टिंग से जलसंकट से मुक्ति मिल सकती है यह साबित किया है एक इंजीनियर ने। जिलापरिषद के यांतिर्की विभाग में कार्यरत उपअभियंता ने छोटे से गांव में प्रयोग कर गांंव के लोगों को जलसंकट से मुक्ति दिलाई है। वैसे तो बारिश का पानी नदी, नालों में बहकर चला जाता है। जलस्रोतों के सूख जाने पर गर्मी के दिन में बूंद-बूंद पानी के लिए दर-दर भटकना पड़ता है। जलसंकट की यह कहानी केवल ग्रामीण इलाकों तक सीमित नहीं है, शहरों में भी यह व्यथा है। नागपुर शहर के अनेक इलाकों में नागरिक जलसंकट से जूझ रहे हैं। जलस्रोत सूख जाने पर टैंकर से जलापूर्ति कर उन्हें अस्थाई राहत पहुंचाई जाती है। स्थाई हल नहीं निकाले जाने से दिन-ब-दिन जलसंकट गहराता जाता है। करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद स्थाई हल नहीं निकलने से हर वर्ष जलसंकट से दो-चार होना पड़ता है। जलपुनर्भरण से इस समस्या का स्थाई हल निकल सकता है। जिला परिषद के यांत्रिकी विभाग में उपअभियंता निलेश मानकर ने भिवापुर तहसील के एक छोटे से गांव झमकुली में जलपुनर्भरण कर सूखे बोरवेल को पुनर्जीवित करते हुए  24 घंटे पानी उपलब्ध करने का सफल प्रयोग किया है। अन्य क्षेत्रों में अमल करने पर भूजलस्तर बढ़ाकर जिले को जलसंकट से हमेशा के लिए मुक्ति पाने का रास्ता दिखा दिया है।

200 फीट खुदाई में भी पानी नहीं आया
जलसंकट से राहत के लिए पिछले वर्ष जलसंकट निवारण उपाय योजना अंतर्गत बोरवेल खोदा गया। 200 फीट गहरा बोरवेल खाेदने के बावजूद पानी नहीं लगा। बोरवेल खोदने के लिए किया गया 1 लाख 3 हजार रुपए व्यर्थ चला गया। गांव के लोग निराश हो गए। उनके सामने अपनी किस्मत को कोसने के सिवा और कोई चारा नहीं रहा।

यांत्रिकी विभाग की पहल
जिप के यांत्रिकी विभाग में उपअभियंता निलेश मानकर ने हार नहीं मानी। उन्होंने सूखे बोरवेल में जलपुनर्भरण कर पुनर्जीवित करने का कमाल कर दिखाया। हालांकि शुरुआत में उन्हें प्रतिसाद नहीं मिला, लेकिन उन्होंने जिद नहीं छोड़ी। जलपुनर्भरण के लिए गांव के लोगों से सहयोग लिया। उनका हौंसला देख गांव के लोगों ने साथ दिया। मारोती बोटरे ने जमीन दान दी और प्रयोग शुरू हुआ। सफलता मिली, सूखे बोरवेल से पानी निकलना शुरू हो गया। अब सौर ऊर्जा चलित मोटर-पंप लगाकर टंकी में पानी संग्रहित कर 24 घंटे नल से पानी मिलने लगा है।

ऐसे बढ़ाया जलस्तर
 200 फीट गहरे सूखे बाेरवेल से कुछ ही अंतर पर 100 फीट गहरा दूसरा बोरवेल खोद इसका जलपुनर्भरण के लिए इस्तेमाल किया गया। इसमें कट किए पाइप लगाए गए। पाइप के चारों ओर जमीन की सतह पर 6 बॉय 6 फीट गहरा गड्ढा खोदा गया। इसमें पत्थर डालकर ऊपर से रेत बिछाई गई। पड़ोस के 2 स्लैब के मकान के छत पर जमा होने वाला बारिश का पानी पाइप से जलपुनर्भरण के लिए गड्ढे में छोड़ा गया। जलपुनर्भरण के लिए खोदे गए बोरवेल के पाइप को कट किए जाने से पानी ऊपर से नीचे जमीन में सोखता चला जाने से भूजलस्तर बढ़ गया है।

कुएं पर निर्भर था पूरा गांव
भिवापुर तहसील के झमकुली गांव का जलसंकट से काफी पुराना रिश्ता रहा है। गांव में एक ग्राम पंचायत और एक वन िवभाग का कुआं है। इसी से गांव के लोग पानी की जरूरत पूरी करते थे। आस-पास नदी या नाला भी नहीं, जहां से पानी ला सकें।

गर्मी के दिन में कुएं सूख जाने पर थोड़ा-थोड़ा मटमैला पानी निकाल कर उसी पर गुजर-बसर चलता रहा। गांव की जनसंख्या लगभग 350 है। यहां से 2 किलोमीटर दूर झमकुली टेकड़ी पर 4-5 वर्ष पूर्व जलापूर्ति योजना बनाई गई। वहां से गांव तक पाइप लाइन बिछाकर नल में पानी छोड़ा जाने लगा।  जलस्रोत सूख जाने से सप्ताह में 2-3 बार नल में पानी छोड़ा जाता है, फिर भी पर्याप्त मात्रा में नहीं मिलता।

अब  24 घंटे पानी
वित्तीय वर्ष 2017-2018 के जलसंकट निवारण उपाय योजना कार्यक्रम अंतर्गत मार्च 2018 में बोरवेल खाेदा गया, उस समय पानी नहीं लगा। जलपुनर्भरण करने पर बोरवेल से पानी मिल रहा है। इसी पर नल योजना कार्यान्वित करने से 24 घंटे जलापूर्ति हो रही है। -कृष्णा आंबुलकर, स्थानीय नागरिक

मिली राहत
पानी के लिए 2 किलोमीटर दूर जाना पड़ता था। नल शुरू होने से जब चाहे तब पानी मिल रहा है। पानी के लिए दिन-रात एक करने से राहत मिली है। -सुचिता आंबुलकर, स्थानीय नागरिक

जलसंकट का कारगर उपाय
तेजी से घट रहा जलस्तर चिंता का विषय है। जलपुनर्भरण से इस समस्या का समाधान किया जा सकता है। झमकुली में जलपुनर्भरण कर सूखे बोरवेल को पुनर्जीवित किया गया है। जहां एक बूंद पानी नहीं आ रहा था, उसी बोरवेल पर मोटरपंप लगाकर 24 घंटे नल योजना कार्यान्वित की गई है। इस योजना पर जिले भर में अमल करने से भविष्य में जलसंकट से राहत मिल सकती है। जिले में बंद पड़े बोरवेल पुनर्जीवित करने इस पद्धति का उपयोग करने पर नए बोरवेल खोदने की आवश्यकता भी नहीं पड़ेगी। - निलेश मानकर, उपअभियंता, जिला परिषद यांत्रिकी विभाग

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