अंबोली दोहरे हत्याकांड में बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला, मुख्य आरोपी जितेंद्र राणा की उम्रकैद सजा घटाकर 20 साल की

अंबोली दोहरे हत्याकांड में बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला, मुख्य आरोपी जितेंद्र राणा की उम्रकैद सजा घटाकर 20 साल की
वर्ष 2011 के चर्चित अंबोली दोहरे हत्याकांड में बॉम्बे हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए मुख्य आरोपी जितेंद्र राणा की हत्या के मामले में दोषसिद्धि बरकरार रखी है। हालांकि, अदालत ने उसकी उम्र को ध्यान में रखते हुए आजीवन कारावास की सजा को संशोधित कर बिना किसी वैधानिक छूट के 20 वर्ष के सश्रम कारावास में बदल दिया। वहीं, सह-आरोपी सुनील भोट और दीपक तिवाल को हत्या के आरोप से बरी कर दिया गया।

मुंबई, 5 नवंबर (आईएएनएस)। वर्ष 2011 के चर्चित अंबोली दोहरे हत्याकांड में बॉम्बे हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए मुख्य आरोपी जितेंद्र राणा की हत्या के मामले में दोषसिद्धि बरकरार रखी है। हालांकि, अदालत ने उसकी उम्र को ध्यान में रखते हुए आजीवन कारावास की सजा को संशोधित कर बिना किसी वैधानिक छूट के 20 वर्ष के सश्रम कारावास में बदल दिया। वहीं, सह-आरोपी सुनील भोट और दीपक तिवाल को हत्या के आरोप से बरी कर दिया गया।

न्यायमूर्ति एमएस कार्णिक और न्यायमूर्ति संदीप पाटिल की खंडपीठ ने वर्ष 2016 में विशेष अदालत द्वारा सुनाए गए फैसले के खिलाफ दायर अपीलों पर गुरुवार को यह निर्णय सुनाया। अपील लंबित रहने के दौरान चौथे आरोपी सतीश दुल्हाज की पिछले वर्ष मौत हो गई थी।

यह मामला अक्टूबर 2011 में मुंबई के अंधेरी पश्चिम स्थित अंबोली इलाके में हुए दोहरे हत्याकांड से जुड़ा है। 24 वर्षीय कीनन सैंटोस और 29 वर्षीय रूबेन फर्नांडिस अपनी तीन महिला मित्रों के साथ एक रेस्तरां गए थे। आरोप है कि वहां कुछ लोगों ने महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की, जिसका विरोध करने पर विवाद बढ़ गया। बाद में पान की दुकान के पास कीनन और रूबेन पर चाकू से हमला किया गया। गंभीर रूप से घायल कीनन की 20 अक्टूबर 2011 को मौत हो गई, जबकि रूबेन ने 30 अक्टूबर 2011 को अस्पताल में उपचार के दौरान दम तोड़ दिया।

हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें जितेंद्र राणा को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत हत्या का दोषी ठहराया गया था। हालांकि, उसकी आयु को देखते हुए अदालत ने उम्रकैद की सजा को घटाकर 20 वर्ष के कठोर कारावास में परिवर्तित कर दिया।

वहीं, अदालत ने पाया कि सुनील भोट और दीपक तिवाल के खिलाफ हत्या के आरोप को साबित करने के लिए पर्याप्त और ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। इसके चलते दोनों को हत्या के आरोप से बरी कर दिया गया, हालांकि उनकी अन्य सजाएं यथावत रखी गई हैं।

सुनवाई के दौरान दोषियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने दलील दी कि कथित छेड़छाड़ की घटना साबित नहीं हुई है और अभियोजन पक्ष हमले के पीछे का मकसद सिद्ध करने में विफल रहा। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि घटना अचानक हुए विवाद और उकसावे का परिणाम थी, इसलिए इसे हत्या नहीं माना जाना चाहिए।

दूसरी ओर, विशेष सरकारी वकील आबाद पोंडा ने अदालत को बताया कि प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, फॉरेंसिक साक्ष्य और अन्य सबूत स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि हमला गंभीर और जानलेवा था। उन्होंने कहा कि आरोपियों में से एक विवाद के बाद जान से मारने की धमकी देकर वहां से गया और बाद में हथियारों के साथ लौटकर हमला किया।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, कीनन के शरीर पर धारदार हथियार से किए गए कई गंभीर घाव पाए गए थे और अत्यधिक रक्तस्राव के कारण उसकी मौत हुई थी। मामले में दोषी ठहराए गए चारों आरोपियों ने विशेष अदालत द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी, जिस पर अब यह फैसला आया है।

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