अंग्रेजी हुकूमत के रंगभेद को चुनौती दे बने महान वैज्ञानिक, जानिए आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय की प्रेरक गाथा

अंग्रेजी हुकूमत के रंगभेद को चुनौती दे बने महान वैज्ञानिक, जानिए आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय की प्रेरक गाथा
आधुनिक भारत के इतिहास में ऐसे अनेक महान व्यक्तित्व हुए हैं जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन, शिक्षा, विज्ञान और समाज सुधार के क्षेत्र में अमिट योगदान दिया। इन्हीं विभूतियों में एक नाम है आचार्य डॉ. प्रफुल्ल चंद्र राय, जिन्हें भारत में रसायन विज्ञान का जनक और स्वदेशी रासायनिक उद्योग का आधार स्तंभ माना जाता है।

नई दिल्ली, 1 अगस्त (आईएएनएस)। आधुनिक भारत के इतिहास में ऐसे अनेक महान व्यक्तित्व हुए हैं जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन, शिक्षा, विज्ञान और समाज सुधार के क्षेत्र में अमिट योगदान दिया। इन्हीं विभूतियों में एक नाम है आचार्य डॉ. प्रफुल्ल चंद्र राय, जिन्हें भारत में रसायन विज्ञान का जनक और स्वदेशी रासायनिक उद्योग का आधार स्तंभ माना जाता है।

2 अगस्त 1861 को तत्कालीन बंगाल (अब बांग्लादेश) के खुलना जिले के ररूली-कतिपरा गांव में जन्मे डॉ. राय केवल एक महान वैज्ञानिक ही नहीं थे, बल्कि एक शिक्षक, इतिहासकार, उद्यमी, समाजसेवी और सच्चे राष्ट्रभक्त भी थे। उनका पूरा जीवन इस बात का उदाहरण है कि विज्ञान का उद्देश्य केवल नई खोज करना नहीं, बल्कि समाज की समस्याओं का समाधान और लोगों के जीवन को बेहतर बनाना भी है।

डॉ. राय के पिता हरिश्चंद्र राय फारसी भाषा के विद्वान थे और उन्होंने अपने गांव में एक मॉडल स्कूल की स्थापना की थी। प्रारंभिक शिक्षा वहीं से प्राप्त करने के बाद परिवार के कोलकाता आने पर उन्होंने हेयर स्कूल और एल्बर्ट स्कूल में अध्ययन किया। वर्ष 1879 में उन्होंने मेट्रोपॉलिटन इंस्टीट्यूट में प्रवेश लिया, जबकि विज्ञान की पढ़ाई के लिए उन्हें प्रेसिडेंसी कॉलेज जाना पड़ता था। यहीं पर प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर जॉन इलियट और सर एलेक्जेंडर पेडलर के मार्गदर्शन में उनकी रुचि रसायन विज्ञान की ओर गहराई से बढ़ी।

1882 में गिलक्राइस्ट छात्रवृत्ति मिलने के बाद वे उच्च शिक्षा के लिए स्कॉटलैंड के एडिनबरा विश्वविद्यालय पहुंचे। वहां छह वर्षों तक अध्ययन करते हुए उन्होंने रसायन विज्ञान में शोध किया और 1887 में डीएससी की उपाधि प्राप्त की। विश्वविद्यालय की केमिकल सोसायटी के उपसभापति चुने जाना उनकी प्रतिभा का प्रमाण था। विदेश में शानदार उपलब्धियों के बावजूद भारत लौटने पर उन्हें अंग्रेजी शासन की रंगभेदी नीतियों का सामना करना पड़ा। इंडियन एजुकेशनल सर्विस में प्रवेश नहीं मिला और प्रांतीय शिक्षा विभाग में नियुक्ति पाने के लिए भी उन्हें लगभग एक वर्ष तक इंतजार करना पड़ा। अंततः उन्हें प्रेसिडेंसी कॉलेज में सहायक प्राध्यापक बनाया गया।

प्रेसिडेंसी कॉलेज में भी उन्होंने भेदभाव का सामना किया। कई अंग्रेज अधिकारी उनसे कम योग्य होने के बावजूद ऊंचे पद और अधिक वेतन पा रहे थे। जब उन्होंने इसका विरोध किया तो एक अंग्रेज अधिकारी ने व्यंग्य करते हुए कहा कि यदि वे इतने ही योग्य हैं तो अपना व्यवसाय क्यों नहीं शुरू कर लेते। यह तंज उनके जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। उन्होंने ठान लिया कि भारत में स्वदेशी रासायनिक उद्योग की स्थापना करेंगे और विज्ञान को रोजगार तथा आत्मनिर्भरता से जोड़ेंगे।

1889 में इंग्लैंड से लौटने के बाद उन्होंने देखा कि विज्ञान के स्नातक युवक क्लर्की की नौकरी करने को मजबूर हैं। यह दृश्य उन्हें बेहद विचलित कर गया। उन्होंने निश्चय किया कि ऐसा उत्पाद विकसित किया जाए जिसकी बाजार में मांग हो और जिसके आधार पर उद्योग स्थापित कर युवाओं को रोजगार दिया जा सके। इसी उद्देश्य से उन्होंने 1895 में मरक्यूरस नाइट्रेट की खोज की और अमोनियम नाइट्रेट, हाइपोनाइट्रेट तथा ऑर्गेनिक नाइट्रेट पर महत्वपूर्ण शोध किए। उनकी उपलब्धियों की देश-विदेश में सराहना हुई लेकिन उनका लक्ष्य केवल वैज्ञानिक सम्मान नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण था।

उद्योग स्थापित करने की राह आसान नहीं थी। उन्होंने पहले नींबू से साइट्रिक एसिड बनाने का विचार किया, लेकिन उसे व्यावहारिक नहीं पाया। फिर कपड़े धोने में इस्तेमाल होने वाली मिट्टी से प्रेरित होकर सोडा बनाने की योजना बनाई, पर बाजार में पहले से मौजूद उत्पादों से प्रतिस्पर्धा कठिन लगी। इसके बाद उन्होंने जानवरों की हड्डियों से उपयोगी रासायनिक पदार्थ बनाने का प्रयोग शुरू किया। घर की छत पर रखी हड्डियों की दुर्गंध से पड़ोसी परेशान हो गए। जब वे उन्हें दूर ले जाकर सुखाने और जलाने लगे तो पुलिस ने उन्हें हत्यारा समझकर पकड़ लिया। काफी समझाने के बाद पुलिस को विश्वास हुआ कि वे हत्या नहीं, बल्कि वैज्ञानिक प्रयोग कर रहे हैं।

डॉ. राय केवल वैज्ञानिक नहीं थे, बल्कि भारतीय विज्ञान के इतिहास को दुनिया के सामने लाने वाले विद्वान भी थे। उन्होंने लगभग एक दशक तक गहन अध्ययन कर 'हिंदू रसायन का इतिहास' नामक प्रसिद्ध ग्रंथ लिखा। इस पुस्तक ने विश्व को यह बताया कि प्राचीन भारत में रसायन विज्ञान कितना विकसित था। इस ग्रंथ का कई यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद हुआ और इसके लिए उन्हें डरहम विश्वविद्यालय ने डीएससी की मानद उपाधि से सम्मानित किया।

उनका जीवन अत्यंत सादा था। वे आजीवन किराए के मकान में रहे, लेकिन शिक्षा और समाज सेवा के लिए उदारतापूर्वक दान देते रहे। उन्होंने कोलकाता के शैक्षणिक संस्थानों को बड़ी आर्थिक सहायता प्रदान की और विद्यार्थियों को आगे बढ़ाने के लिए हमेशा प्रयासरत रहे। उनकी सादगी और उच्च विचारों से महात्मा गांधी भी प्रभावित थे। गांधीजी ने उनके बारे में कहा था कि भारतीय वेशभूषा में रहने वाले इस सरल व्यक्ति को देखकर विश्वास करना कठिन है कि वह विश्वस्तरीय वैज्ञानिक हैं।

16 जून 1944 को 83 वर्ष की आयु में डॉ. प्रफुल्ल चंद्र राय का निधन हो गया, लेकिन उनकी विरासत आज भी भारतीय विज्ञान, शिक्षा और उद्योग को प्रेरित करती है। उन्होंने सिद्ध किया कि वैज्ञानिक शोध तभी सार्थक है जब उसका लाभ समाज तक पहुंचे। विज्ञान, स्वदेशी उद्योग, शिक्षा और राष्ट्र सेवा के प्रति उनका समर्पण उन्हें भारत के महानतम वैज्ञानिकों में विशिष्ट स्थान दिलाता है।

अस्वीकरण: यह न्यूज़ ऑटो फ़ीड्स द्वारा स्वतः प्रकाशित हुई खबर है। इस न्यूज़ में BhaskarHindi.com टीम के द्वारा किसी भी तरह का कोई बदलाव या परिवर्तन (एडिटिंग) नहीं किया गया है| इस न्यूज की एवं न्यूज में उपयोग में ली गई सामग्रियों की सम्पूर्ण जवाबदारी केवल और केवल न्यूज़ एजेंसी की है एवं इस न्यूज में दी गई जानकारी का उपयोग करने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञों (वकील / इंजीनियर / ज्योतिष / वास्तुशास्त्री / डॉक्टर / न्यूज़ एजेंसी / अन्य विषय एक्सपर्ट) की सलाह जरूर लें। अतः संबंधित खबर एवं उपयोग में लिए गए टेक्स्ट मैटर, फोटो, विडियो एवं ऑडिओ को लेकर BhaskarHindi.com न्यूज पोर्टल की कोई भी जिम्मेदारी नहीं है|

Created On :   1 Aug 2026 10:20 PM IST

Tags

Next Story