दिलीप कुमार की दीवानी थीं टुन टुन, पहली फिल्म के लिए रखी थी ये खास शर्त

दिलीप कुमार की दीवानी थीं टुन टुन, पहली फिल्म के लिए रखी थी ये खास शर्त
हिंदी सिनेमा की एक कलाकार टुन टुन, जिनका असली नाम उमा देवी खत्री था, पर्दे पर आते ही अपने चेहरे के एक्सप्रेशन, बोलने के तरीके और शानदार कॉमिक टाइमिंग से लोगों को हंसने पर मजबूर कर देती थी। हालांकि, उनका सफर संघर्षों से भरा रहा। वह एक गायिका बनने का सपना लेकर फिल्मी दुनिया में आईं थी लेकिन बाद में उन्होंने कॉमेडी की दुनिया में ऐसा मुकाम बनाया कि उन्हें हिंदी सिनेमा की पहली महिला कॉमेडियन कहा जाने लगा। दिलचस्प बात यह भी है कि अभिनय की शुरुआत से पहले उनकी एक खास इच्छा थी कि वह अपनी पहली फिल्म अपने पसंदीदा अभिनेता दिलीप कुमार के साथ करें।

मुंबई, 10 जुलाई (आईएएनएस)। हिंदी सिनेमा की एक कलाकार टुन टुन, जिनका असली नाम उमा देवी खत्री था, पर्दे पर आते ही अपने चेहरे के एक्सप्रेशन, बोलने के तरीके और शानदार कॉमिक टाइमिंग से लोगों को हंसने पर मजबूर कर देती थी। हालांकि, उनका सफर संघर्षों से भरा रहा। वह एक गायिका बनने का सपना लेकर फिल्मी दुनिया में आईं थी लेकिन बाद में उन्होंने कॉमेडी की दुनिया में ऐसा मुकाम बनाया कि उन्हें हिंदी सिनेमा की पहली महिला कॉमेडियन कहा जाने लगा। दिलचस्प बात यह भी है कि अभिनय की शुरुआत से पहले उनकी एक खास इच्छा थी कि वह अपनी पहली फिल्म अपने पसंदीदा अभिनेता दिलीप कुमार के साथ करें।

टुन टुन का जन्म 11 जुलाई 1923 को उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के पास एक छोटे से गांव में हुआ था। उनका बचपन बेहद कठिन परिस्थितियों में गुजरा। जब वह बहुत छोटी थीं, तभी जमीन विवाद के चलते उनके माता-पिता की हत्या कर दी गई। इसके कुछ समय बाद उनके भाई की भी मौत हो गई। माता-पिता और भाई को खोने के बाद टुन टुन का बचपन रिश्तेदारों के सहारे बीता लेकिन वहां भी उन्हें प्यार और आराम की जिंदगी नहीं मिली।

बचपन से ही टुन टुन को संगीत से बहुत लगाव था। उनके पास संगीत की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं थी, लेकिन वह रेडियो पर गाने सुनकर उनका अभ्यास करती थीं। उनकी आवाज में एक अलग मिठास थी। वह हमेशा से चाहती थीं कि वह मुंबई जाकर गायिका बनें और अपनी पहचान बनाएं। इसी सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने संघर्षों के बावजूद हिम्मत नहीं छोड़ी।

मुंबई पहुंचने के बाद टुन टुन की मुलाकात मशहूर संगीतकार नौशाद से हुई। कहा जाता है कि उन्होंने नौशाद से गाने का मौका मांगा, जिसके बाद उन्हें 1946 की फिल्म 'वामिक अजरा' में गाने का मौका मिला। हालांकि उनकी असली पहचान 1947 में आई फिल्म 'दर्द' के गाने 'अफसाना लिख रही हूं' से बनी। यह गाना बहुत लोकप्रिय हुआ और टुन टुन की आवाज घर-घर पहुंच गई।

सिंगर के तौर पर सफलता मिलने के बाद भी समय के साथ फिल्म संगीत बदलने लगा। नई आवाजों के आने के बाद टुन टुन को पहले जैसी सफलता नहीं मिल रही थी। इसी दौरान नौशाद ने उनके अंदर छिपी अभिनय प्रतिभा को पहचाना। उन्होंने टुन टुन को सलाह दी कि उन्हें अभिनय में हाथ आजमाना चाहिए। शुरुआत में टुन टुन इसके लिए तैयार हुईं लेकिन उन्होंने एक खास शर्त रख दी।

टुन टुन दिलीप कुमार की बहुत बड़ी प्रशंसक थीं। वह हमेशा से चाहती थीं कि अगर वह कभी अभिनय करें तो उनकी पहली फिल्म दिलीप कुमार के साथ हो। नौशाद की दिलीप कुमार से अच्छी दोस्ती थी, इसलिए उन्होंने उनकी यह इच्छा पूरी करवाई। साल 1950 में आई फिल्म 'बाबुल' में टुन टुन को दिलीप कुमार और नरगिस के साथ काम करने का मौका मिला। इसी फिल्म के दौरान उनका नाम उमा देवी से बदलकर टुन टुन पड़ गया। इसके बाद यही नाम उनकी पहचान बन गया।

'बाबुल' के बाद टुन टुन ने कॉमेडी किरदारों में अपनी अलग जगह बनाई। उनकी मासूमियत, शानदार हाव-भाव और मजेदार संवाद बोलने का तरीका दर्शकों को खूब पसंद आया। उन्होंने गुरु दत्त की फिल्मों 'आर-पार', 'मिस्टर एंड मिसेज 55' और 'प्यासा' जैसी यादगार फिल्मों में काम किया। इसके अलावा 'नमक हलाल', 'कोहिनूर' और कई अन्य फिल्मों में भी उन्होंने अपनी कॉमेडी से लोगों का मनोरंजन किया।

करीब पांच दशक लंबे करियर में टुन टुन ने लगभग 200 फिल्मों में काम किया। उन्होंने हिंदी के अलावा दूसरी भाषाओं की फिल्मों में भी अभिनय किया। उस दौर के कई बड़े कलाकारों के साथ उन्होंने स्क्रीन साझा की। उनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ गई थी कि फिल्मों में उनके लिए खासतौर पर हास्य किरदार लिखे जाने लगे थे।

पति अख्तर अब्बास काजी के निधन के बाद टुन टुन ने धीरे-धीरे फिल्मों से दूरी बना ली। उनकी आखिरी हिंदी फिल्म 1990 में आई 'कसम धंधे की' थी। लंबे समय तक बीमारी से जूझने के बाद 23 नवंबर 2003 को मुंबई में 80 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।

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Created On :   10 July 2026 5:37 PM IST

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