दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारियों के खिलाफ ट्रायल कोर्ट की अनुशासनात्मक कार्रवाई रद्द की
नई दिल्ली, 20 मई (आईएएनएस)। दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में ट्रायल कोर्ट द्वारा पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच और अनुशासनात्मक कार्रवाई की निगरानी संबंधी आदेश को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि अग्रिम जमानत याचिका पर फैसला सुनाने के बाद ट्रायल कोर्ट अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़ गया था।
न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी की एकल पीठ ने इंस्पेक्टर ऐश्वर सिंह और पूर्व एसएचओ ज्ञानेंद्र राणा की याचिकाओं को मंजूर करते हुए कहा कि अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (एएसजे) अग्रिम जमानत आवेदन का निपटारा करने के बाद “फंक्टस ऑफिशियो” हो गए थे। यानी उसके बाद वह पुलिस अधिकारियों को तलब करने, स्टेटस रिपोर्ट मांगने या विभागीय कार्रवाई की निगरानी करने के अधिकार में नहीं थे।
हाईकोर्ट ने कहा, “जमानत याचिका पर सुनवाई करते समय अदालत किसी भी परिस्थिति में अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती जो उसके दायरे में नहीं आते।”
मामला जून 2019 में छावला थाना क्षेत्र में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है, जिसमें एक नाबालिग लड़की के लापता होने पर आईपीसी की धारा 363 के तहत मामला दर्ज किया गया था। बाद में पीड़िता के मिलने और बयान दर्ज होने के बाद आईपीसी की धारा 328 और 376 के साथ पॉक्सो एक्ट की धारा 4 भी जोड़ी गई थी।
सह-आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान एएसजे ने जांच में देरी को लेकर स्पष्टीकरण मांगा था और तत्कालीन जांच अधिकारियों तथा एसएचओ को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का निर्देश दिया था।
इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने इंस्पेक्टर ऐश्वर सिंह, इंस्पेक्टर ज्ञानेंद्र राणा और अन्य पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच के आदेश दिए थे। साथ ही कथित निगरानी में लापरवाही को लेकर डीसीपी और एसीपी स्तर के अधिकारियों से भी जवाब मांगा गया था।
दिल्ली हाईकोर्ट में याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दयान कृष्णन और गौतम नारायण ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट की कार्रवाई न्यायिक अतिक्रमण थी और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करती है, क्योंकि अधिकारियों को सुनवाई का मौका दिए बिना उनके खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां की गईं।
दिल्ली पुलिस ने भी याचिकाकर्ताओं के पक्ष का समर्थन करते हुए कहा कि अग्रिम जमानत याचिका के निपटारे के बाद ट्रायल कोर्ट पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की निगरानी या निर्देश जारी नहीं कर सकता था।
हाईकोर्ट ने इन दलीलों से सहमति जताते हुए कहा कि अग्रिम जमानत कार्यवाही समाप्त होने के बाद एएसजे के समक्ष कोई मामला लंबित नहीं बचा था।
अदालत ने कहा, “विभागीय जांच के आदेश देना, उसकी निगरानी करना और अधिकारियों के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां करना पूरी तरह अनुचित और कानूनन अस्वीकार्य था, खासकर तब जब संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर उनका पक्ष तक नहीं सुना गया।”
हाईकोर्ट ने इस दौरान सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का भी हवाला दिया, जिनमें बिना आवश्यकता और बिना सुनवाई के जांच अधिकारियों के खिलाफ कठोर टिप्पणियां करने से अदालतों को बचने की सलाह दी गई है।
न्यायमूर्ति बनर्जी ने कहा कि आपराधिक अदालतों को जांच अधिकारियों की “अनावश्यक आलोचना” से बचना चाहिए और जांच के दौरान पुलिस के सामने आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों को भी ध्यान में रखना चाहिए।
अदालत ने यह भी कहा कि न्यायिक आदेशों में की गई प्रतिकूल टिप्पणियों का सरकारी कर्मचारियों के करियर और प्रतिष्ठा पर दीर्घकालिक असर पड़ सकता है।
हालांकि हाई कोर्ट ने जांच में देरी को लेकर ट्रायल कोर्ट की चिंता की सराहना की, लेकिन कहा कि जिस तरीके से कार्रवाई की गई वह जमानत मामले की सुनवाई के अधिकार क्षेत्र से बाहर था।
अंत में अदालत ने ट्रायल कोर्ट के आदेश, उससे जुड़ी सभी कार्यवाहियों और प्रतिकूल टिप्पणियों को निरस्त कर दिया। साथ ही फैसले की प्रति दिल्ली के सभी जिला न्यायाधीशों को भेजने का निर्देश दिया, ताकि ट्रायल कोर्ट अग्रिम जमानत याचिकाओं की सुनवाई करते समय अधिकार क्षेत्र की सीमाओं को ध्यान में रखें।
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Created On :   21 May 2026 9:14 PM IST












