दिल्ली हाई कोर्ट ने रिश्वत मामले में मृत कांस्टेबल की दोषसिद्धि को बरकरार रखा

दिल्ली हाई कोर्ट ने रिश्वत मामले में मृत कांस्टेबल की दोषसिद्धि को बरकरार रखा
दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार को भ्रष्टाचार के एक मामले में एक पुलिस कांस्टेबल की सजा को बरकरार रखा। कांस्टेबल पर पहचान पत्र लौटाने के बदले 1,000 रुपए की रिश्वत मांगने और लेने का आरोप था। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता के लापता रहने के बावजूद, ‘छाया गवाह’ की भरोसेमंद गवाही और रिश्वत की रकम की बरामदगी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त है।

नई दिल्ली, 27 अप्रैल (आईएएनएस)। दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार को भ्रष्टाचार के एक मामले में एक पुलिस कांस्टेबल की सजा को बरकरार रखा। कांस्टेबल पर पहचान पत्र लौटाने के बदले 1,000 रुपए की रिश्वत मांगने और लेने का आरोप था। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता के लापता रहने के बावजूद, ‘छाया गवाह’ की भरोसेमंद गवाही और रिश्वत की रकम की बरामदगी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त है।

न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा की एकल न्यायाधीश पीठ ने 2004 के निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा। इस फैसले में कांस्टेबल सतीश कुमार को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 और 13(1)(d) के साथ धारा 13(2) के तहत दोषी ठहराया गया था।

ट्रायल कोर्ट ने उसे हर आरोप पर एक साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। साथ ही हर अपराध के लिए 1,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया गया था और यह निर्देश दिया गया था कि सभी सजाएं एक साथ चलेंगी।

अपील का फैसला मामले के गुण-दोष के आधार पर किया गया, भले ही सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता की मृत्यु हो गई थी और मामले को आगे बढ़ाने के लिए कोई भी कानूनी प्रतिनिधि सामने नहीं आया।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, सतीश कुमार ने जुलाई 1994 में महरौली पुलिस स्टेशन में तैनात रहते हुए शिकायतकर्ता नरेंद्र कुमार से उनका पहचान पत्र लौटाने के लिए अवैध रिश्वत मांगी थी। यह पहचान पत्र आया नगर में पुलिस जांच के दौरान जब्त किया गया था।

भ्रष्टाचार-रोधी शाखा में शिकायत दर्ज होने के बाद 30 जुलाई 1994 को एक जाल बिछाया गया। इस दौरान आरोपी को कथित तौर पर रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया गया।

अपने फैसले में दिल्ली हाई कोर्ट ने अपीलकर्ता की इस दलील को खारिज कर दिया कि अभियोजन का मामला सिर्फ इसलिए कमजोर हो जाता है, क्योंकि ट्रायल के दौरान शिकायतकर्ता की गवाही नहीं हो पाई थी।

जस्टिस सुधा ने कहा, “मुखबिर से पूछताछ न होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि मामला कमजोर है। इससे अभियोजन पक्ष को किसी सरकारी कर्मचारी द्वारा रिश्वत मांगने और लेने का अपराध साबित करने से नहीं रोका जा सकता।”

दिल्ली हाई कोर्ट ने पंच गवाह की गवाही पर भरोसा किया। यह गवाह ट्रैप के दौरान शिकायतकर्ता के साथ था और उसने आरोपी द्वारा रिश्वत के पैसे मांगने, लेने और बरामदगी के बारे में अभियोजन पक्ष की बातों का पूरा समर्थन किया।

इसमें आगे यह भी दर्ज किया गया कि ऐसा कोई भी सबूत मौजूद नहीं था, जिससे यह संकेत मिले कि छाया गवाह अविश्वसनीय था या अभियुक्त को झूठा फंसाने का उसका कोई मकसद था।

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि एक बार मांग और स्वीकार करना साबित हो जाने पर, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 20 के तहत कानूनी अनुमान लागू हो जाता है। इसके बाद इस अनुमान को गलत साबित करने की जिम्मेदारी आरोपी पर आ जाती है।

आदेश में कहा गया कि अभियुक्त इस जिम्मेदारी को पूरा करने में विफल रहा, क्योंकि उसने कोई भी विश्वसनीय या संभावित स्पष्टीकरण प्रस्तुत नहीं किया।

अभियोजन की मंजूरी की वैधता को चुनौती देने के मामले में न्यायमूर्ति सुधा ने कहा कि अतिरिक्त उपायुक्त (पुलिस) द्वारा दी गई मंजूरी कानूनी रूप से वैध थी, क्योंकि दिल्ली पुलिस अधिनियम के तहत उस अधिकारी को किसी कांस्टेबल को सेवा से हटाने का अधिकार प्राप्त था।

ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई कमी न पाते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि आरोपी पर लगाया गया दोष और सजा कानूनी रूप से सही है। अपील को खारिज करते हुए जस्टिस सुधा ने कहा, “ऊपर की गई चर्चा के आधार पर मुझे इस फैसले में कोई ऐसी कमी नहीं दिखती, जिसमें इस अदालत के हस्तक्षेप की जरूरत हो।”

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Created On :   27 April 2026 7:15 PM IST

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