केरल में मैंग्रोव का दायरा बढ़ा, बंगाल की खाड़ी में समुद्री हीटवेव का खतरा बढ़ा

केरल में मैंग्रोव का दायरा बढ़ा, बंगाल की खाड़ी में समुद्री हीटवेव का खतरा बढ़ा
केरल में पिछले एक दशक के दौरान मैंग्रोव (तटीय दलदली वनस्पति) का क्षेत्र बढ़ा है। यह राज्य के तटीय पर्यावरण के लिए सकारात्मक संकेत है, जहां पिछले पांच दशकों में मैंग्रोव का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा नष्ट हो चुका है। हालांकि, दूसरी ओर बंगाल की खाड़ी में समुद्री ताप लहरों (मरीन हीटवेव) का खतरा लगातार बढ़ रहा है।

कोच्चि, 6 नवंबर (आईएएनएस)। केरल में पिछले एक दशक के दौरान मैंग्रोव (तटीय दलदली वनस्पति) का क्षेत्र बढ़ा है। यह राज्य के तटीय पर्यावरण के लिए सकारात्मक संकेत है, जहां पिछले पांच दशकों में मैंग्रोव का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा नष्ट हो चुका है। हालांकि, दूसरी ओर बंगाल की खाड़ी में समुद्री ताप लहरों (मरीन हीटवेव) का खतरा लगातार बढ़ रहा है।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान (सीएमएफआरआई) के एक नए अध्ययन में 2017 से 2026 के बीच केरल में मैंग्रोव क्षेत्र में कुल मिलाकर वृद्धि दर्ज की गई है।

अध्ययन में केरल के तटीय जिलों में मैंग्रोव के विस्तार में हुए बदलावों का पता लगाने के लिए उपग्रह से प्राप्त तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया। इसके निष्कर्ष शुक्रवार को सीएमएफआरआई में आयोजित मत्स्य पालन और रिमोट सेंसिंग पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रस्तुत किए गए।

मैंग्रोव तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये मछलियों के प्रजनन और उनके शुरुआती विकास के लिए प्राकृतिक आश्रय स्थल के रूप में काम करते हैं। इसके अलावा, चक्रवात और तूफानी ज्वार से तटीय इलाकों की रक्षा करते हैं।

मैंग्रोव वायुमंडल से कार्बन अवशोषित करते हैं और जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी मददगार होते हैं। अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि उपग्रह तस्वीरों के जरिए मैंग्रोव के पुनर्विकास पर नजर रखने और उनके संरक्षण के प्रयासों को दिशा देने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसी संगोष्ठी में प्रस्तुत एक दूसरे अध्ययन ने समुद्री पारिस्थितिकी के स्वास्थ्य को लेकर नई चिंताएं पैदा की हैं।

बांग्लादेश की शाहजलाल विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के अध्ययन के अनुसार, बंगाल की खाड़ी में 1982 से 2023 के बीच समुद्री हीटवेव की 100 से अधिक घटनाएं दर्ज की गईं। अध्ययन में पाया गया कि इन घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता दोनों में वृद्धि हुई है। वर्ष 2000 के बाद यह रुझान विशेष रूप से तेज हुआ है। वर्ष 2016 में स्थिति विशेष रूप से गंभीर रही। इस दौरान असामान्य रूप से तीव्र समुद्री हीटवेव दर्ज की गईं, जो लंबे समय तक बनी रहीं।

अध्ययन के मुताबिक, समुद्री हीटवेव की घटनाएं सबसे अधिक अगस्त और नवंबर में हुईं, जबकि सबसे तीव्र घटनाएं आमतौर पर मानसून से पहले के महीनों में दर्ज की गईं। समुद्री हीटवेव उस स्थिति को कहते हैं, जब समुद्र का तापमान लगातार कई दिनों तक सामान्य से असामान्य रूप से अधिक बना रहता है। ऐसी परिस्थितियां समुद्री जीवों को नुकसान पहुंचा सकती हैं और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगाड़ सकती हैं।

शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि समुद्री हीटवेव की बढ़ती आवृत्ति और अवधि का असर चरम मौसमी घटनाओं पर भी पड़ सकता है। इससे उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की तीव्रता प्रभावित होने की आशंका है।

दोनों अध्ययन तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रस्तुत किए गए। इसका संयुक्त आयोजन ट्रेवर प्लैट साइंस फाउंडेशन, कोचीन यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (कुसैट) के रासायनिक समुद्र विज्ञान विभाग, सीएमएफआरआई और मरीन बायोलॉजिकल एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने किया है।

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