मद्रास हाई कोर्ट ने सेंथिल बालाजी के कार्यकाल में हुए 397 करोड़ के टेंडर घोटाले की जांच सीबीआई को सौंपी

मद्रास हाई कोर्ट ने सेंथिल बालाजी के कार्यकाल में हुए 397 करोड़ के टेंडर घोटाले की जांच सीबीआई को सौंपी
मद्रास उच्च न्यायालय ने बुधवार को केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को तमिलनाडु के विद्युत और निषेध एवं उत्पाद शुल्क मंत्री के रूप में सेंथिल बालाजी के 2021 से 2023 के कार्यकाल के दौरान ट्रांसफार्मर टेंडर खरीद में कथित 397 करोड़ रुपए की अनियमितताओं की जांच करने का आदेश दिया।

चेन्नई, 29 अप्रैल (आईएएनएस)। मद्रास उच्च न्यायालय ने बुधवार को केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को तमिलनाडु के विद्युत और निषेध एवं उत्पाद शुल्क मंत्री के रूप में सेंथिल बालाजी के 2021 से 2023 के कार्यकाल के दौरान ट्रांसफार्मर टेंडर खरीद में कथित 397 करोड़ रुपए की अनियमितताओं की जांच करने का आदेश दिया।

मुख्य न्यायाधीश एसए धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने तमिलनाडु सतर्कता एवं भ्रष्टाचार-विरोधी निदेशालय (डीवीएसी) को मामले से संबंधित सभी रिकॉर्ड सीबीआई को सौंपने का निर्देश दिया।

अदालत ने कहा कि जांच का नेतृत्व करने के लिए दो सप्ताह के भीतर एक अधिकारी की नियुक्ति की जानी चाहिए। पीठ ने उपलब्ध सामग्री के आधार पर सीबीआई द्वारा नए सिरे से जांच का आदेश दिया और एक स्वतंत्र एवं व्यापक जांच की आवश्यकता पर बल दिया।

कोर्ट ने राज्य सरकार, तमिलनाडु जनरेशन एंड डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन और डीवीएसी को केंद्रीय एजेंसी के साथ पूर्ण सहयोग करने और यह सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया कि सभी प्रासंगिक दस्तावेज शीघ्रता से सौंप दिए जाएं।

अदालत ने सीबीआई को प्रभावी जांच करने और रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए ठोस कदम उठाने का निर्देश दिया। मामले में विस्तृत आदेश का इंतजार है।

गौरतलब है कि अरप्पोर इयक्कम और विभिन्न राजनीतिक दलों से संबद्ध सदस्यों ने याचिकाएं दायर की हैं, जिनमें आरोप लगाया गया है कि राज्य सरकार कथित घोटाले में शामिल लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग वाली शिकायतों पर कार्रवाई करने में विफल रही है।

याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि सरकार को बार-बार प्रस्तुत किए जाने के बावजूद कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है। पिछली सुनवाई के दौरान, पीठ ने डीवीएसी द्वारा की गई प्रारंभिक जांच का विवरण, टेंडर संबंधी दस्तावेजों और अन्य सामग्री की मांग की थी।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि पूर्व मंत्री पर मुकदमा चलाने के लिए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत मंजूरी देने में देरी हुई थी।

हालांकि, राज्य सरकार ने कहा कि मंजूरी पहले ही दी जा चुकी है। याचिकाओं का विरोध करते हुए राज्य सरकार ने तर्क दिया कि ये राजनीतिक रूप से प्रेरित हैं, चुनाव से पहले प्रतिद्वंद्वी दलों से जुड़े व्यक्तियों द्वारा दायर की गई हैं, इसलिए सुनवाई योग्य नहीं हैं।

हालांकि, अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं की राजनीतिक संबद्धताओं के आधार पर गंभीर आरोपों को खारिज नहीं किया जा सकता।

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Created On :   29 April 2026 6:21 PM IST

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