शैव-वैष्णव टिप्पणी मामले में पूर्व मंत्री पोनमुडी को मद्रास हाईकोर्ट से झटका, शिकायत रद्द करने से किया इनकार
चेन्नई, 2 जुलाई (आईएएनएस)। मद्रास हाईकोर्ट ने गुरुवार को तमिलनाडु के पूर्व मंत्री और डीएमके के वरिष्ठ नेता के. पोनमुडी के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई में दखल देने से इंकार कर दिया। पोनमुडी पर शैव, वैष्णव और महिलाओं के बारे में विवादित टिप्पणी करने का आरोप है। कोर्ट ने कहा कि उनके खिलाफ निजी शिकायत पर ट्रायल कोर्ट में कार्यवाही आगे बढ़ सकती है।
जस्टिस जीके इलानथिरायण ने पोनमुडी की एक क्रिमिनल रिविजन याचिका खारिज कर दी। इस याचिका में चेन्नई के जॉर्ज टाउन स्थित तृतीय मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन की भाजपा पार्षद उमा आनंदन की शिकायत का संज्ञान लेते हुए उन्हें इस साल की शुरुआत में समन जारी किया गया था।
यह शिकायत अप्रैल 2025 में चेन्नई में हुए एक कार्यक्रम के दौरान पोनमुडी द्वारा दिए गए भाषण से जुड़ी है, जब वे राज्य के वन मंत्री थे। शिकायतकर्ता के अनुसार, भाषण में शैव, वैष्णव और महिलाओं के बारे में अपमानजनक टिप्पणियां थीं और यह घृणास्पद भाषण था, जिससे धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंची और समुदायों के बीच शत्रुता को बढ़ावा मिला।
शिकायत में उमा आनंदन ने कहा कि उन्होंने यूट्यूब पर भाषण का एक वीडियो देखा और उसमें की गई टिप्पणियां उन्हें बेहद आपत्तिजनक लगीं। उन्होंने आरोप लगाया कि पोनमुडी ने एक किस्से का जिक्र किया था, जिसमें शैवों द्वारा धारण किए जाने वाले क्षैतिज पवित्र चिह्न पट्टाई और वैष्णवों द्वारा माथे पर धारण किए जाने वाले ऊर्ध्वाधर चिह्न तिरुमन की तुलना "एक यौनकर्मी द्वारा यौन मुद्राओं के वर्णन" से की गई थी।
उन्होंने कहा कि ऐसी बातों से दोनों समुदायों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंची और इससे सांप्रदायिक सद्भाव बिगड़ा।
भाजपा पार्षद ने बताया कि उन्होंने पहले पुलिस से मिलकर आपराधिक कार्रवाई की मांग की थी। पुलिस द्वारा बिना किसी कार्रवाई के शिकायत बंद कर दिए जाने के बाद उन्होंने मजिस्ट्रेट कोर्ट में एक निजी शिकायत दर्ज कराई। कोर्ट ने मामले का संज्ञान लिया और 23 फरवरी 2026 को पोनमुडी को समन जारी करने का आदेश दिया।
हाईकोर्ट में इस आदेश को चुनौती देते हुए पोनमुडी ने तर्क दिया कि उन्होंने बस किसी और व्यक्ति द्वारा सालों पहले कही गई बातों को दोहराया था, जिसे उन्होंने बंद कमरे में हुई बैठक बताया और ये बातें उनकी अपनी नहीं थीं।
उनके वकील ने यह भी तर्क दिया कि शिकायत में भारतीय न्याय संहिता की धारा 196(1)(ए), 299 और 302 के तहत अपराधों का कोई मामला नहीं बनता है। ये धाराएं समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने और जानबूझकर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने से संबंधित हैं।
इन दलीलों को खारिज करते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने कार्रवाई को रद्द करने से इनकार कर दिया और मजिस्ट्रेट कोर्ट में चल रहे आपराधिक मामले को जारी रखने की अनुमति दे दी।
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Created On :   2 July 2026 3:35 PM IST











