लंदन में आचार्य प्रशांत का पेटा फाउंडेशन की अध्यक्ष मिमी बेखेची से संवाद, बोले-जो पशु के प्रति हिंसक है, वो सबके प्रति हिंसा करेगा
लंदन, 5 जुलाई (आईएएनएस)। विश्व की सबसे बड़ी पशु अधिकार संस्था पेटा ने प्रख्यात दार्शनिक और लेखक आचार्य प्रशांत को गुरुवार को लंदन स्थित पेटा फाउंडेशन के कार्यालय में एक विशेष संवाद के लिए आमंत्रित किया। पेटा फाउंडेशन की प्रेसिडेंट मिमी बेखेची के साथ हुए इस फायरसाइड संवाद में खचाखच भरे सभागार के बीच पशु-चेतना, शाकाहार और अहिंसा के दार्शनिक आधारों पर गहन चर्चा हुई। आचार्य प्रशांत ने कहा कि करुणा कोई सिखाया जाने वाला गुण नहीं बल्कि मनुष्य का स्वभाव है, और असली प्रश्न ये है कि हमें हिंसा किसने सिखाई।
यह पेटा के शीर्ष नेतृत्व के साथ आचार्य प्रशांत का चौथा संवाद था। इससे पहले उनकी पेटा की सह-संस्थापक इंग्रिड न्यूकर्क और पेटा की अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष पूर्वा जोशीपुरा के साथ बातचीत हो चुकी है और इसी ब्रिटेन यात्रा के दौरान लंदन में जोशीपुरा के साथ उनका पुनः विस्तृत संवाद हुआ। उल्लेखनीय है कि पेटा ने वर्ष 2022 में आचार्य प्रशांत को 'मोस्ट इन्फ्लुएंशियल वीगन ऑफ द ईयर' सम्मान से सम्मानित किया था।
संवाद की शुरुआत में बेखेची ने आचार्य प्रशांत की पुस्तक 'इज़ शी जस्ट फूड टू यू' की सराहना करते हुए कहा कि यह पुस्तक पशु अधिकार आंदोलन की उसी केंद्रीय चुनौती को संबोधित करती है कि लोग पशुओं को उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि सोचने और अनुभव करने वाले जीव के रूप में देखें।
आचार्य प्रशांत ने कहा कि छोटा बच्चा किसी खरगोश या मेमने को देखकर उससे खेलना चाहता है, उसे मारना नहीं। उन्होंने पूछा, "क्या मनुष्य को करुणा सिखानी पड़ती है, या उसे सिखाई गई हिंसा से मुक्त करना पड़ता है? फिर देखना होगा कि बच्चे को किसने बिगाड़ा, किसने उसके मन में यह बैठाया कि कोई जीव भोजन है।"
उन्होंने चेताया कि जिस बच्चे को किसी एक जीव के प्रति हिंसक बनाया जाता है, वह किसी एक दिशा में हिंसक नहीं रहता। उन्होंने कहा, "अब आपके पास खरगोश या बकरी के प्रति हिंसक बच्चा नहीं है, अब आपके पास बस एक हिंसक बच्चा है। हम एक हिंसक समाज खड़ा कर रहे हैं।"
अपनी पुस्तक के शीर्षक की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि पशुओं और स्त्रियों पर मानवता ने जो हिंसा की है, वे दो अलग बातें नहीं हैं, इसीलिए पुस्तक का शीर्षक इज़ ‘शी’ जस्ट फूड टू यू रखा गया। उन्होंने कहा कि शोषित कोई भी हो सकता है, जंगल, नदी, स्त्री या गाय, पर शोषक एक ही है, और वह है संस्कारित मानवीय अहंकार ।
संवाद का केंद्रीय सूत्र रखते हुए उन्होंने कहा, "मनुष्य हत्यारा नहीं है, अहंकार हत्यारा है। शरीर को मांस से कुछ नहीं मिलता, अहंकार अपनी भीतरी अपूर्णता को तीस सेकंड के लिए बहलाता है। पशुओं के प्रति हमारा व्यवहार केवल एक दर्पण है जो दिखाता है कि हम भीतर से कैसे हैं।"
शारीरिक रूप से मनुष्य और पशु में अंतर पर उन्होंने कहा कि मनुष्य 99.9 प्रतिशत पशु ही है, और जो दशमलव एक प्रतिशत अतिरिक्त है, वह मनुष्य की श्रेष्ठता नहीं बल्कि उसका रोग है, और वह है सामाजिक और सांस्कृतिक अहंकार । उन्होंने भारतीय अद्वैत परंपरा का हवाला देते हुए कहा कि मुक्त पुरुष का आचरण 'सहज' कहा गया है, पशु जैसा स्वाभाविक, और यही आंतरिक स्वतंत्रता की पहचान है।
श्रोताओं के प्रश्नों के उत्तर में आचार्य प्रशांत ने व्यक्तिगत जिम्मेदारी पर बल दिया। उन्होंने कहा कि कत्लखाने से निकला हर ग्राम मांस अंततः एक अकेला व्यक्ति ही खाता है, इसलिए मांग व्यक्ति से शुरू होती है और परिवर्तन भी व्यक्ति से ही शुरू होगा। उन्होंने कहा कि कानून और नीतिगत समर्थन आवश्यक हैं पर पर्याप्त नहीं, क्योंकि लोकतंत्र में विधायक को चुनने वाला मतदाता ही उपभोक्ता है।
सोशल मीडिया पर पशु-क्रूरता के वायरल वीडियो से जुड़े एक प्रश्न पर उन्होंने कहा, "हिंसा कभी हिंसा के नाम से नहीं सिखाई जाती। हिंसा परंपरा के नाम से, महत्वाकांक्षा के नाम से, जिम्मेदारी के नाम से, यहां तक कि प्रेम के नाम से भी सिखाई जाती है। यदि हिंसा को हिंसा कहकर सिखाया जाता, तो हिंसा कभी सफल न होती।"
संवाद के दौरान आचार्य प्रशांत ने अपने आश्रय में रहे एक घायल खरगोश का मार्मिक संस्मरण भी साझा किया, जो वर्षों उनके अध्ययन-कक्ष में उनके साथ रहा और उन्हीं की बांहों में उसने अंतिम सांस ली। उन्होंने कहा कि यदि कोई संबंध किसी निर्दोष के जीवन की कीमत मांगे, तो वह संबंध पहले से ही मूल्यहीन था।
यह संवाद आचार्य प्रशांत की ब्रिटेन यात्रा का हिस्सा है, जिसके अंतर्गत वे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय, कैंब्रिज विश्वविद्यालय, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, और ब्रिटिश संसद में शिक्षाविदों, नीति-निर्माताओं और विचारकों से चेतना, जलवायु और आंतरिक रूपांतरण के प्रश्नों पर संवाद कर चुके हैं। यात्रा दस जुलाई तक चलेगी, जिसमें यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में प्रोफेसर स्टीवन फ्लेमिंग के साथ संवाद, क्वीन मेरी यूनिवर्सिटी ऑफ़ लंदन में प्रोफेसर लार्स चिट्टिका से संवाद, और वॉटकिंस बुक स्टोर में पुस्तक-हस्ताक्षर सत्र प्रस्तावित हैं।
आचार्य प्रशांत आईआईटी दिल्ली और आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र और प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। भारतीय और वैश्विक दर्शन पर आधारित उनका कार्य सोशल मीडिया पर दस करोड़ से अधिक सब्सक्राइबर्स तक पहुंचता है। हाल ही में उन्हें वाटकिंस 2026 सूची में विश्व के सर्वाधिक प्रभावशाली जीवित विचारकों में सम्मिलित किया गया है।
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Created On :   5 July 2026 1:43 PM IST












