लोककंठ में अमर, पर इतिहास में उपेक्षित महेन्द्र मिसिर पर नए विमर्श की जरूरत

भारतीय साहित्य और संस्कृति के इतिहास में अनेक ऐसे रचनाकार मिलते हैं जिनकी प्रतिभा और योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण होने के बावजूद उन्हें वह स्थान नहीं मिल पाया जिसके वे वास्तविक अधिकारी थे। भोजपुरी लोकसाहित्य के महान गीतकार पंडित महेन्द्र मिसिर इसी श्रेणी के रचनाकार हैं। लोकजीवन में उनकी लोकप्रियता निर्विवाद है।आज भी उनके गीत गाँव-गाँव में गूँजते हैं किन्तु साहित्यिक विमर्श और अकादमिक अध्ययन में जिस व्यापकता के साथ उन पर काम होना चाहिए था, वह अब तक पर्याप्त रूप से नहीं हो पाया है। यह स्थिति केवल एक कवि की उपेक्षा नहीं, बल्कि उस समूची लोकपरंपरा की उपेक्षा है जिसकी वे सशक्त आवाज थे।
महेन्द्र मिसिर का जन्म बिहार के सारण ज़िले के मिश्रवलिया गाँव में 19 मार्च 1886 को हुआ था। औपचारिक शिक्षा सीमित होने के बावजूद उन्होंने स्वाध्याय और सांस्कृतिक वातावरण के सहारे संस्कृत, हिंदी, भोजपुरी, उर्दू और बंगला जैसी कई भाषाओं का ज्ञान अर्जित किया। वे केवल कवि ही नहीं थे, बल्कि गायक, वादक, आशुकवि, कीर्तनकार और लोकसंस्कृति के जीवंत प्रतिनिधि भी थे। भोजपुरी लोकसंगीत की प्रसिद्ध शैली ‘पूरबी’ को जिस प्रतिष्ठा के साथ लोकमानस में स्थान मिला, उसमें महेन्द्र मिसिर का योगदान अत्यंत निर्णायक माना जाता है। यही कारण है कि लोकपरंपरा ने उन्हें “पूरबी के बेताज बादशाह” और “पूरबी के जनक” जैसे सम्मानसूचक संबोधनों से याद किया।
उनकी रचनाओं का संसार अत्यंत व्यापक है। उनके गीतों में लोकजीवन की सहजता, प्रेम और विरह की मार्मिकता, ग्रामीण संस्कृति की आत्मीयता, पलायन क दर्द और मानवीय संवेदना का गहरा स्वर मिलता है। वे केवल श्रृंगार के कवि नहीं थे।
उनके गीतों में मानवतावादी दृष्टि, प्रकृति-चेतना, सामाजिक सरोकार और आध्यात्मिक अनुभूति का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। उनकी भाषा में लोकजीवन की मिट्टी की गंध है और शास्त्रीय संगीत की लयात्मकता दोनो दिखाई देती है। यही कारण है कि उनके गीत मंदिरों से लेकर उत्सवों तक, खेत-खलिहानों से लेकर लोकमंचों तक गाए जाते हैं।
भोजपुरी लोकधारा में उनकी रचनाएँ केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि सामाजिक दस्तावेज़ के रूप में भी सामने आती हैं। नारी मन की पीड़ा, विरह की वेदना, पारिवारिक संबंधों की जटिलता और ग्रामीण समाज की भावनात्मक संरचना का अत्यंत मार्मिक चित्रण उनके गीतों में मिलता है। “अंगुरी में डंसले बिया नगिनिया” या “सासु मोरा मारे रामा बांस के छिउंकिया” जैसे गीत केवल लोकगायन नहीं हैं बल्कि वे उस समय के समाज और संवेदना का जीवंत चित्र प्रस्तुत करते हैं।
महेन्द्र मिसिर के गीतों की लोकप्रियता का एक कारण यह भी है कि उनमें प्रेम का स्वर अत्यंत संवेदनशील और मानवीय है।
उनके यहाँ प्रेम केवल देह का विषय नहीं, बल्कि मन और भावनाओं का अनुभव है। स्त्री के अंतर्मन की व्यथा और उसकी भावनात्मक दुनिया को उन्होंने जिस सहानुभूति और गरिमा के साथ व्यक्त किया, वह लोकगीत परंपरा की विशिष्ट उपलब्धि है। आज के समय में जब भोजपुरी के अनेक गीतों में स्त्री को केवल देह तक सीमित करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है, तब महेन्द्र मिसिर की रचनाएँ लोकसंगीत की मूल संवेदनशीलता की याद दिलाती हैं।
महेन्द्र मिसिर के गीतों में केवल प्रेम और लोकजीवन की संवेदनाएँ ही नहीं, बल्कि अपने समय की राजनीतिक बेचैनी और राष्ट्रीय चेतना के स्वर भी सुनाई देते हैं। “हमरा नीको ना लागे राम, गोरन के करनी” जैसे गीत औपनिवेशिक शासन के प्रति असंतोष और प्रतिरोध की भावना को स्वर देते हैं। जनश्रुतियों और कुछ ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार उन्होंने अंग्रेज़ी शासन की आर्थिक व्यवस्था को चुनौती देने के उद्देश्य से जाली नोट छापकर क्रांतिकारियों की सहायता की थी, जिसके कारण उन्हें कारावास भी भोगना पड़ा। कहा जाता है कि बक्सर जेल में रहते हुए उन्होंने “अपूर्व रामायण” की रचना की, जिसे एक महत्त्वपूर्ण महाकाव्य माना जाता है। इन प्रसंगों के कारण उनका व्यक्तित्व केवल एक लोकगायक तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वे अपने समय की राष्ट्रवादी चेतना से जुड़े सांस्कृतिक व्यक्तित्व के रूप में भी सामने आते हैं।
महेन्द्र मिसिर के गीतों का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक चेतना भी है। उन्होंने उस दौर की तवायफ संस्कृति को केवल मनोरंजन की वस्तु के रूप में नहीं देखा, बल्कि संगीत और लोकधुनों के माध्यम से उसे सांस्कृतिक गरिमा देने और उनके पुनर्वास के लिए भी प्रयास किया। कहा जाता है कि कई प्रसिद्ध गायिकाएँ उनकी धुनों और गीतों से प्रभावित होकर उन्हें अपना गुरु मानती थीं। इस प्रकार उनके संगीत ने उस समय की कलात्मक परंपराओं को भी एक नया आयाम दिया।
इसी के साथ भोजपुरी समाज में रोज़गार के लिए होने वाले पलायन की पीड़ा को भी उन्होंने सबसे पह्ले अपने गीतों में अत्यंत मार्मिक ढंग से व्यक्त किया। “पनिया के जहाज से पलटनिया बनी अइह पिया…” और “हमनी के रहब जानी दुनो परानी…” जैसे गीतों में परदेस गए प्रियजन की प्रतीक्षा, बिछोह और प्रवासी जीवन की वेदना का ऐसा चित्र मिलता है, जो आज भी भोजपुरी समाज की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बना हुआ है।
महेन्द्र मिसिर की लोकप्रियता का प्रमाण यह भी है कि उनके जीवन और कृतित्व पर अनेक साहित्यिक कृतियाँ लिखी गई हैं।
आचार्य पांडेय कपिल का प्रसिद्ध भोजपुरी उपन्यास “फुलसुंघी” महेन्द्र मिसिर के जीवन, प्रेम और उनके समय के समाज को चित्रित करता है, जिसका अंग्रेज़ी अनुवाद भी प्रकाशित हो चुका है। इसी प्रकार पंडित रामनाथ पांडेय का उपन्यास “महेन्दर मिसिर” उनके जीवन, व्यक्तित्व और सामाजिक भूमिका पर आधारित एक ऐतिहासिक कृति है। उन पर गंभीर अध्ययन भी समय-समय पर हुआ है। साहित्य अकादमी से प्रकाशित भगवती प्रसाद द्विवेदी का मोनोग्राफ उनके जीवन, साहित्य और सांस्कृतिक योगदान का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। डॉ. सुरेश कुमार मिश्र की पुस्तक “महेन्दर मिसिर के गीत-संसार” उनके गीतों की संरचना, विषयवस्तु और परंपरा का अध्ययन करती है। इसी क्रम में जौहर शाफियाबादी की पुस्तक “पूर्वी के धाह” (नेशनल बुक ट्रस्ट) उन्हें पूरबी परंपरा के महत्त्वपूर्ण प्रवर्तक के रूप में स्थापित करती है।अनामिका के उपन्यास ‘दस द्वारे का पिंजरा’ में तवायफों के जीवन, स्त्री-अस्मिता और समकालीन सामाजिक संरचना का स्त्री-दृष्टि से चित्रण करते हुए महेंद्र मिश्र को अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध सक्रिय स्वाधीनता संग्राम से जुड़े नायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। प्रतिष्ठित भाषावैज्ञानिक उदय नारायण तिवारी से लेकर हजारी प्रसाद द्विवेदी, विवेकी राय और विद्यानिवास मिश्र जैसे विद्वानों ने भी अपने लेखों और टिप्पणियों में उनके योगदान का उल्लेख किया है। फिर भी यह तथ्य स्वीकार करना होगा कि महेन्द्र मिसिर पर जितना व्यवस्थित शोध और आलोचनात्मक विमर्श होना चाहिए था, वह अभी अधूरा है। उनकी अनेक रचनाएँ अभी भी लोककंठ में बिखरी हुई हैं। कई गीत पीढ़ियों से गाए जाते रहे हैं, पर उनका प्रामाणिक संकलन और पाठ-संपादन अभी भी अपेक्षित है।
भोजपुरी साहित्य के इतिहास में भी कई बार उनके योगदान का संक्षिप्त उल्लेख करके आगे बढ़ जाने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। आज जब वैश्वीकरण और उपभोक्तावादी संस्कृति के प्रभाव से लोकसंस्कृति के स्वर धीरे-धीरे क्षीण होते दिखाई देते हैं,तब महेन्द्र मिसिर की रचनाएँ हमें यह याद दिलाती हैं कि लोकगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज की स्मृति और संवेदना के वाहक होते हैं। उनके गीतों में प्रेम है, विरह है, भक्ति है और सामाजिक चेतना से भरा हुआ एक जीवंत संसार है। समय की माँग है कि महेन्द्र मिसिर के जीवन और साहित्य पर गंभीर और व्यवस्थित शोध को प्रोत्साहित किया जाए।
विश्वविद्यालयों में उनके नाम पर विशेष शोध-पीठ या अध्ययन-केंद्र स्थापित किए जा सकते हैं, जहाँ न केवल महेन्द्र मिसिर बल्कि व्यापक भोजपुरी लोकसंगीत, लोकसाहित्य और लोकसंस्कृति पर भी गहन अध्ययन हो सके। इससे उनकी रचनात्मक विरासत को व्यवस्थित रूप से संरक्षित और समझा जा सकेगा। किसी समाज की सांस्कृतिक स्मृति तभी पूर्ण होती है जब वह अपने उन रचनाकारों को भी याद रखे जिन्होंने लोकजीवन की धड़कनों को शब्द और स्वर दिए। महेन्द्र मिसिर ऐसे ही रचनाकार हैं जिनकी आवाज़ आज भी लोककंठ में गूँजती है, लेकिन जिन पर गंभीर विमर्श अभी भी अपेक्षित है। और इसलिए आज यह प्रश्न फिर सामने खड़ा होता है भोजपुरी लोकजीवन को अमर गीत देने वाले इस महान कलाकार पर जितनी चर्चा होनी चाहिए थी, क्या सचमुच उतनी हुई है? यदि नहीं, तो यह केवल महेन्द्र मिसिर की उपेक्षा नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना की भी परीक्षा है।
जलज कुमार अनुपम
(लेखक लोककला, साहित्य और संस्कृति के चिंतक हैं।)
Created On :   16 March 2026 1:07 PM IST












