माओवाद के मुद्दे पर संसद में घमासान, शिंदे ने गिनाईं सरकार की उपलब्धियां, कांग्रेस ने किया कड़ा विरोध

माओवाद के मुद्दे पर संसद में घमासान, शिंदे ने गिनाईं सरकार की उपलब्धियां, कांग्रेस ने किया कड़ा विरोध
लोकसभा में सोमवार को वामपंथी उग्रवाद को खत्म करने के सरकार के प्रयासों पर बहस के दौरान विचारों का तीखा आदान-प्रदान देखने को मिला। शिवसेना सांसद श्रीकांत शिंदे ने महाराष्ट्र सरकार की पहलों की सराहना की, खासकर गढ़चिरौली जिले में, जो लंबे समय से माओवादी गतिविधियों से प्रभावित रहा है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार माओवाद को खत्म करने के लिए सार्थक प्रयास कर रही है।

नई दिल्ली, 30 मार्च (आईएएनएस)। लोकसभा में सोमवार को वामपंथी उग्रवाद को खत्म करने के सरकार के प्रयासों पर बहस के दौरान विचारों का तीखा आदान-प्रदान देखने को मिला। शिवसेना सांसद श्रीकांत शिंदे ने महाराष्ट्र सरकार की पहलों की सराहना की, खासकर गढ़चिरौली जिले में, जो लंबे समय से माओवादी गतिविधियों से प्रभावित रहा है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार माओवाद को खत्म करने के लिए सार्थक प्रयास कर रही है।

श्रीकांत शिंदे ने यह भी बताया कि जब एकनाथ शिंदे गढ़चिरौली के पालक मंत्री थे, तो उन्होंने व्यक्तिगत रूप से जिले का दौरा किया था और लोगों के साथ दिवाली मनाई, जो प्रशासन की पहुंच और जनता के विश्वास का प्रतीक था। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में अब माओवाद का पूरी तरह से खात्मा संभव है।

कांग्रेस सांसद सप्तगिरी शंकर ने इसका तीखा खंडन किया। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या सत्ताधारी दल पिछली सरकारों और पुलिस बलों द्वारा दिए गए बलिदानों की अनदेखी कर रहा है, जिन्होंने माओवादी हिंसा का सबसे अधिक सामना किया। कांग्रेस सांसद ने कहा कि सत्ताधारी सांसदों के दावे सुनकर ऐसा लगता है कि गृह मंत्री अमित शाह ने खुद माओवादियों को समाप्त किया, जबकि इसमें अन्य लोगों की भूमिका को नजरअंदाज किया जा रहा है।

सांसद सप्तगिरी शंकर जो ऐसे क्षेत्र से हैं, जहां वामपंथी उग्रवाद अभी मौजूद है, ने सदन को याद दिलाया कि 2006 और 2009 के बीच छत्तीसगढ़ में कांग्रेस नेताओं को माओवादी हमलों में निशाना बनाया गया और उनकी हत्या कर दी गई थी।

उन्होंने साफ-साफ पूछा कि क्या भाजपा के किसी नेता ने आजादी की लड़ाई या माओवादी हिंसा में अपनी जान गंवाई थी, जिससे यह दिखता है कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं की कुर्बानियों को नजरअंदाज किया जा रहा है।

इस बहस में यह भी दिखा कि कट्टरपंथ के खिलाफ लड़ाई में किसे श्रेय दिया जाना चाहिए, इस पर राजनीतिक मतभेद हैं। सत्ता पक्ष ने मौजूदा लीडरशिप और राज्य सरकार की पहलों पर जोर दिया, जबकि विपक्ष ने पिछली कुर्बानियों को मान्यता देने और उनके योगदान को सही ढंग से दिखाने की मांग की।

इस चर्चा में गढ़चिरौली जैसे जिलों में माओवादी असर को कम करने में हुई तरक्की और उन इलाकों में अभी मौजूद चुनौतियों, दोनों पर ध्यान दिया गया। इसमें इतिहास, राजनीतिक जिम्मेदारी और राष्ट्रीय सुरक्षा में हासिल उपलब्धियों को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच मजबूत बहस भी देखने को मिली।

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Created On :   30 March 2026 6:42 PM IST

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