धर्म: ललिता सप्तमी जानें पूजा विधि, महत्व और शुभ मुहूर्त

नई दिल्ली, 29 अगस्त (आईएएनएस)। भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को ललिता सप्तमी है। यह पावन पर्व राधा रानी की सबसे प्रिय और घनिष्ठ सखी ललिता देवी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन सूर्य सिंह राशि में रहेंगे। वहीं, चंद्रमा 7 बजकर 53 मिनट तक तुला राशि में रहेंगे और इसके बाद वृश्चिक राशि में गोचर करेंगे।
दृक पंचांग के अनुसार, इस दिन अभिजीत मुहूर्त 11 बजकर 56 मिनट से शुरू होकर 12 बजकर 47 मिनट तक रहेगा और राहुकाल का समय सुबह 9 बजकर 10 मिनट से शुरू होकर 10 बजकर 46 मिनट तक रहेगा।
यह व्रत मुख्य रूप से मथुरा, वृंदावन और आसपास के ब्रज क्षेत्र में मनाया जाता है। ललिता देवी राधा और कृष्ण की रासलीला और उनके प्रेम में एक महत्वपूर्ण सूत्रधार और अष्टसखियों में से एक थीं, जो राधा रानी के हर सुख-दुःख में साथ रहती थीं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन ललिता देवी की पूजा करने से राधा रानी और भगवान श्रीकृष्ण दोनों प्रसन्न होते हैं। माना जाता है कि इस व्रत को करने से भक्तों के जीवन में सुख, समृद्धि, प्रेम और सौभाग्य आता है। यह व्रत विशेष रूप से नवविवाहित जोड़ों के लिए बेहद फलदायी माना जाता है। कहते हैं कि जो दंपत्ति श्रद्धापूर्वक ललिता देवी की पूजा करते हैं, उनका वैवाहिक जीवन प्रेम और सुख से भरा रहता है।
कई स्थानों पर इस व्रत को संतान सप्तमी के नाम से भी जाना जाता है। संतान की अच्छी सेहत और लंबी उम्र के लिए भी यह व्रत रखा जाता है।
व्रत रखने के लिए आप इस दिन ब्रह्ममुहूर्त में उठकर नित्य कर्म स्नान आदि करने के बाद पूजा स्थल को साफ करें। इसके बाद आसन बिछाएं, फिर एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर उसमें राधा-कृष्ण और देवी ललिता की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। अब व्रत का संकल्प लेने के बाद देवी ललिता को लाल रंग के वस्त्र, फूल, श्रृंगार सामग्री और मिठाई अर्पित करें। पूजा में तुलसी दल का उपयोग करना शुभ माना जाता है।
देवी ललिता की आरती और तीन बार परिक्रमा करने के बाद 'ॐ ह्रीं ललितायै नमः' मंत्र का जाप करने से विशेष लाभ मिलता है। इसके बाद आरती का आचमन कर आसन को प्रणाम कर प्रसाद ग्रहण करें।
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Created On :   29 Aug 2025 10:23 AM IST