पंडित किशन महाराज जब वचन निभाने के लिए ठुकरा दिया था अमेरिका का ऑफर
नई दिल्ली, 3 मई (आईएएनएस)। 9 अप्रैल सिर्फ एक तारीख नहीं है। यह वो दिन है जो भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास में एक खालीपन छोड़ गया। इसी दिन 2008 में भारत के महान तबला वादक पंडित किशन महाराज ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। 84 साल की उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली, लेकिन उनकी धुन, उनकी थाप और उनका समर्पण आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है।
उनकी पहचान सिर्फ एक कलाकार की नहीं थी, बल्कि एक ऐसे साधक की थी जिसने अपने जीवन को संगीत के नाम कर दिया था। बनारस घराने की यह शख्सियत आज भी तबला प्रेमियों के लिए एक आदर्श मानी जाती है।
पंडित किशन महाराज का जन्म 3 सितंबर 1923 को बनारस (वर्तमान वाराणसी) के कबीर चौरा इलाके में एक संगीत परिवार में हुआ था। उनके पिता हरि महाराज और माता अंजोरा देवी थीं। संगीत उनके खून में था, लेकिन जीवन ने उन्हें बहुत जल्दी कठिनाइयों से भी मिला दिया। महज छह साल की उम्र में ही उनके पिता का निधन हो गया था।
इसके बाद उनका पालन-पोषण उनके चाचा कंठे महाराज ने किया, जो खुद भी तबला वादन के बड़े नाम थे। वहीं से किशन महाराज को संगीत की पहली औपचारिक शिक्षा मिली। बचपन से ही उनकी उंगलियों में ऐसा जादू था कि लोग उन्हें देखकर ही समझ जाते थे कि यह बच्चा आगे चलकर कुछ बड़ा करेगा।
धीरे-धीरे किशन महाराज ने तबला वादन में अपनी अलग पहचान बनानी शुरू कर दी। बनारस घराने की परंपरा के अनुसार उन्होंने गहराई, ताल और लय पर विशेष काम किया। उनकी शैली को 'गंभीर शैली' कहा जाता था, जिसमें बाएं हाथ के उपयोग पर खास जोर दिया जाता था।
उनकी उंगलियों की थाप में एक अलग ही ताकत थी। वह सिर्फ संगत करने वाले कलाकार नहीं थे, बल्कि खुद एक पूरे कार्यक्रम को दिशा देने की क्षमता रखते थे। उन्होंने भारत के लगभग हर बड़े शास्त्रीय कलाकार के साथ मंच साझा किया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारतीय संगीत की पहचान को मजबूत किया।
उनकी कला सिर्फ तकनीक नहीं थी, बल्कि भावनाओं से जुड़ी हुई थी। जब वे तबला बजाते थे तो ऐसा लगता था जैसे हर ताल अपने आप बोल रही हो।
किशन महाराज का जीवन आसान नहीं था। उन्होंने बहुत छोटी उम्र से ही संघर्ष देखा, लेकिन संगीत से कभी दूरी नहीं बनाई। उनकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्होंने संगीत को सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि जीवन का धर्म माना।
उनकी जर्नी में कई ऐसे किस्से हैं जो आज भी लोगों को प्रेरित करते हैं। एक बार उन्होंने अपने ही परिवार की शादी की दावत छोड़ दी, क्योंकि उन्हें उसी समय एक संगीत कार्यक्रम में जाना था। जब परिवार ने उनसे पूछा, तो उन्होंने कहा था कि “तबला मेरा जीवन है, मैं इसे नहीं छोड़ सकता।”
इसी तरह एक और घटना में उन्होंने अमेरिका का बड़ा कार्यक्रम ऑफर ठुकरा दिया था, क्योंकि उन्होंने पहले किसी को वचन दिया था। उनके लिए वचन तोड़ना असंभव था।
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Created On :   3 May 2026 3:22 PM IST












