रणजीत सिंह जामनगर के महाराज, जिन्होंने अंग्रेजों की क्रिकेट में अपनी धाक जमाई
नई दिल्ली, 1 अप्रैल (आईएएनएस)। महाराजा रणजीत सिंह भारत के महान क्रिकेटर्स में गिने जाते हैं। वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इंग्लैंड के लिए खेलने वाले पहले भारतीय थे। शानदार बल्लेबाजी शैली के लिए प्रसिद्ध इस दिग्गज खिलाड़ी के नाम पर 'रणजी ट्रॉफी' का नाम रखा गया, जो भारत का प्रमुख घरेलू क्रिकेट टूर्नामेंट है।
10 सितंबर 1872 को गुजरात स्थित काठियावाड़ के नवानगर (जामनगर) राजघराने में जन्मे रणजीतसिंहजी को भारतीय क्रिकेट का 'पितामह' कहा जाता है, जो जामनगर के महाराज थे। 16 साल की उम्र में रणजीत सिंह पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चले गए थे।
कलाई के जादूगर रणजीत सिंह 'लेट कट' और 'लेग ग्लांस' जैसे स्टाइलिश शॉट्स के लिए मशहूर थे। इसमें उन्होंने 'बैक-फुट डिफेंस' की कला को भी शामिल किया था। मई 1895 में लॉर्ड्स के मैदान पर एमसीसी के खिलाफ ससेक्स टीम के लिए खेलते हुए उन्होंने अपने पहले ही मैच में 77 और 150 रन बनाकर शानदार शुरुआत की। उनके इसी कौशल ने इंग्लैंड क्रिकेट टीम के चयनकर्ताओं को उन्हें अपनी टीम में शामिल करने के लिए मजबूर कर दिया था। उस दौर में भारत में अंग्रेजों का शासन था, जिसके चलते रणजीत सिंह का चयन इंग्लैंड टीम के लिए हुआ।
16-18 जुलाई 1896 के बीच मैनचेस्टर में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ दाएं हाथ के बल्लेबाज रणजीत सिंह ने इंग्लैंड की दूसरी पारी में नाबाद 154 रन बनाए। हालांकि, ऑस्ट्रेलिया ने इस मैच को 3 विकेट से अपने नाम कर लिया था।
साल 1897 में इंग्लिश टीम ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर गई थी। सीरीज की शुरुआत से पहले रणजीत सिंह बीमार थे। वह काफी कमजोरी महसूस कर रहे थे, लेकिन इंग्लैंड ने उन्हें प्लेइंग इलेवन में शामिल कर लिया।
पहले दिन 39 रन बनाने के बाद रणजीत सिंह बेहद कमजोरी महसूस कर रहे थे। दूसरे दिन का खेल शुरू होने से पहले डॉक्टर से इलाज चल रहा था। इसके बावजूद सातवें नंबर पर बल्लेबाजी के लिए उतरे रणजीत सिंह ने 175 रन की पारी खेली। इंग्लैंड ने यह मैच 9 विकेट से अपने नाम किया था। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 15 टेस्ट मैच खेले, जिसकी 26 पारियों में 44.95 की औसत के साथ 989 रन निकाले। इस दौरान उनके बल्ले से 2 शतक और 6 अर्धशतक निकले।
फर्स्ट क्लास करियर पर नजर डालें, तो उन्होंने 307 मुकाबलों में 56.37 की औसत के साथ 24,692 रन बनाए, जिसमें 72 शतक और 109 अर्धशतक शामिल रहे। 1,895 से लगातार 10 घरेलू सत्रों तक उन्होंने हर बार 1,000 से ज्यादा रन बनाए। साल 1899 और 1900 में उन्होंने 3,000 रन का आंकड़ा भी पार कर लिया था। रणजीत सिंह ने साल 1899 से 1903 तक काउंटी टीम की कप्तानी की, लेकिन 1904 के अंत में बढ़ती घरेलू जिम्मेदारियों को संभालने के लिए वे भारत लौट आए। इसके बाद उन्होंने केवल दो और पूरे ग्रीष्मकालीन सत्रों (1908 और 1912) में क्रिकेट खेला। साल 1920 में रणजीत सिंह अंतिम बार फर्स्ट क्लास मैच खेलने उतरे।
साल 1907 में रणजी नवानगर रियासत के 'महाराजा जाम साहब' बन गए थे। 2 अप्रैल 1933 को 60 साल की उम्र में रणजीत सिंह दुनिया को अलविदा कह गए।
अस्वीकरण: यह न्यूज़ ऑटो फ़ीड्स द्वारा स्वतः प्रकाशित हुई खबर है। इस न्यूज़ में BhaskarHindi.com टीम के द्वारा किसी भी तरह का कोई बदलाव या परिवर्तन (एडिटिंग) नहीं किया गया है| इस न्यूज की एवं न्यूज में उपयोग में ली गई सामग्रियों की सम्पूर्ण जवाबदारी केवल और केवल न्यूज़ एजेंसी की है एवं इस न्यूज में दी गई जानकारी का उपयोग करने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञों (वकील / इंजीनियर / ज्योतिष / वास्तुशास्त्री / डॉक्टर / न्यूज़ एजेंसी / अन्य विषय एक्सपर्ट) की सलाह जरूर लें। अतः संबंधित खबर एवं उपयोग में लिए गए टेक्स्ट मैटर, फोटो, विडियो एवं ऑडिओ को लेकर BhaskarHindi.com न्यूज पोर्टल की कोई भी जिम्मेदारी नहीं है|
Created On :   1 April 2026 6:43 PM IST










