संसद के मानसून सत्र में नहीं पेश होगा 'वन नेशन, वन इलेक्शन' बिल, जेपीसी का कार्यकाल बढ़ा

संसद के मानसून सत्र में नहीं पेश होगा वन नेशन, वन इलेक्शन बिल, जेपीसी का कार्यकाल बढ़ा
संसद के मानसून सत्र में 'वन नेशन, वन इलेक्शन' से जुड़ा संविधान संशोधन बिल पेश नहीं किया जाएगा। इस बिल की गहन जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी का कार्यकाल बढ़ा दिया गया है। अब समिति को अपनी रिपोर्ट शीतकालीन सत्र के अंतिम सप्ताह के पहले दिन तक सौंपनी होगी।

नई दिल्ली, 30 जुलाई (आईएएनएस)। संसद के मानसून सत्र में 'वन नेशन, वन इलेक्शन' से जुड़ा संविधान संशोधन बिल पेश नहीं किया जाएगा। इस बिल की गहन जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी का कार्यकाल बढ़ा दिया गया है। अब समिति को अपनी रिपोर्ट शीतकालीन सत्र के अंतिम सप्ताह के पहले दिन तक सौंपनी होगी।

संसद का मानसून सत्र अभी जारी है। इस सत्र में सरकार द्वारा 'वन नेशन, वन इलेक्शन' बिल लाने की चर्चा थी, लेकिन अब साफ हो गया है कि इस सत्र में इस विधेयक को सदन में पेश नहीं किया जाएगा और न ही इस पर चर्चा होगी।

सूत्रों के मुताबिक, जेपीसी को अभी और समय चाहिए ताकि वह सभी पक्षों से राय ले सके और बिल के हर पहलू की बारीकी से जांच कर सके। इसी वजह से समिति का कार्यकाल बढ़ाया गया है। समिति को शीतकालीन सत्र के अंतिम सप्ताह के पहले दिन तक रिपोर्ट देने का समय दिया गया है।

'वन नेशन, वन इलेक्शन' विधेयक का मकसद लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और स्थानीय निकायों के चुनावों को एक साथ कराना है। सरकार का तर्क है कि इससे चुनावों पर होने वाला खर्च कम होगा, प्रशासनिक मशीनरी पर बार-बार पड़ने वाला बोझ घटेगा और विकास कार्यों में निरंतरता बनी रहेगी।

इस विधेयक को पिछले साल संसद में पेश किया गया था और उसके बाद इसे जांच के लिए जेपीसी को भेज दिया गया था। समिति में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के सांसद शामिल हैं। जेपीसी ने अब तक कई बैठकों में चुनाव आयोग, विधि आयोग, राजनीतिक दलों और संवैधानिक विशेषज्ञों से सुझाव लिए हैं।

जेपीसी का कार्यकाल बढ़ाए जाने के बाद यह तय हो गया है कि समिति अपनी रिपोर्ट मौजूदा मानसून सत्र में पेश नहीं करेगी। ऐसे में 'वन नेशन, वन इलेक्शन' विधेयक पर आगे की प्रक्रिया अब शीतकालीन सत्र में रिपोर्ट आने के बाद ही शुरू हो पाएगी।

बता दें कि विपक्षी दलों ने पहले ही इस बिल को लेकर कई सवाल उठाए थे। उनका कहना है कि एक साथ चुनाव कराने से क्षेत्रीय दलों को नुकसान हो सकता है और संघीय ढांचे पर असर पड़ सकता है। वहीं, सरकार का कहना है कि यह सुधार लोकतंत्र को मजबूत करेगा और देश के संसाधनों की बचत करेगा।

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Created On :   30 July 2026 7:31 PM IST

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