विमान व अंतरिक्ष यान से जुड़ी सामग्री में भारत की नई तकनीक को मिला पेटेंट
नई दिल्ली, 31 जुलाई (आईएएनएस)। हवाई जहाज को हल्का लेकिन पहले से भी अधिक मजबूत बनाने की दिशा में भारत ने एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) राउरकेला के शोधकर्ताओं ने एक विशेष 3-डी रीइन्फोर्स्ड एडवांस्ड कंपोजिट तकनीक विकसित की है।
यह तकनीक विमान, अंतरिक्ष यान, रक्षा उपकरण, ऑटोमोबाइल और पवन ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में इस्तेमाल होने वाली कंपोजिट सामग्री को अधिक मजबूत, टिकाऊ और क्षति-सहनशील बना सकती है। इस नवाचार के लिए संस्थान को पेटेंट भी प्राप्त हुआ है।
दरअसल, आज के आधुनिक विमान और अंतरिक्ष यान धातुओं के बजाय बड़ी मात्रा में फाइबर-रीइन्फोर्स्ड पॉलिमर (एफआरपी) कंपोजिट से बनाए जाते हैं। ये सामग्री वजन में बेहद हल्की होती है, लेकिन मजबूती के मामले में धातुओं को भी चुनौती देती है। यही वजह है कि इनका इस्तेमाल वाणिज्यिक विमानों, लड़ाकू विमानों, रॉकेट, उपग्रह प्रक्षेपण यान, रक्षा प्रणालियों, हाई-स्पीड रेल, पवन टरबाइन और हाइड्रोजन भंडारण टैंकों तक में किया जाता है। हालांकि, लंबे समय तक अत्यधिक दबाव और भार सहने के दौरान इन कंपोजिट सामग्रियों में दरारें पड़ने, परतों के अलग होने और मजबूती घटने जैसी समस्याएं सामने आती हैं।
इन्हीं चुनौतियों का समाधान एनआईटी राउरकेला के शोधकर्ताओं ने अपनी नई तकनीक के माध्यम से किया है। शोधकर्ताओं ने ग्लास फाइबर और ग्राफीन नैनोप्लेटलेट्स को मिलाकर एक नया 3-डी रीइन्फोर्स्ड हाइब्रिड कंपोजिट तैयार किया है। निर्माण प्रक्रिया के दौरान इन दोनों सामग्रियों को कंपोजिट की मोटाई की दिशा में व्यवस्थित किया जाता है, जिससे पूरी आंतरिक संरचना अधिक मजबूत हो जाती है। इससे फाइबर, ग्राफीन और एपॉक्सी मैट्रिक्स के बीच बेहतर जुड़ाव बनता है और तैयार सामग्री पहले की तुलना में अधिक टिकाऊ बन जाती है। इस तकनीक की खास बात यह है कि इसमें ग्राफीन नैनोप्लेटलेट्स का इस्तेमाल बिना किसी रासायनिक संशोधन के किया गया है।
शोधकर्ताओं ने पारंपरिक निर्माण प्रक्रिया में केवल मामूली बदलाव करते हुए क्योरिंग के दौरान 800 वोल्ट, 50 हर्ट्ज एसी विद्युत क्षेत्र का उपयोग किया। इससे यह तकनीक मौजूदा औद्योगिक उत्पादन प्रणाली के साथ आसानी से अपनाई जा सकती है। एनआईटी राउरकेला के सहायक प्रोफेसर डॉ. राजेश कुमार प्रस्ती के अनुसार यह तकनीक उन सभी क्षेत्रों के लिए उपयोगी है, जहां हल्के लेकिन अत्यधिक मजबूत और क्षति-सहनशील मटेरियल की आवश्यकता होती है। विमानों के पैनल, ऑटोमोबाइल की क्रैश संरचनाएं, पवन टरबाइन ब्लेड, प्रेशर वेसल, समुद्री संरचनाएं और अन्य उन्नत इंजीनियरिंग उत्पाद इसके प्रमुख उपयोग होंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विमान का वजन कम रखते हुए उसकी मजबूती बढ़ाई जाए तो ईंधन की खपत कम होती है, रखरखाव का खर्च घटता है और विमान की परिचालन क्षमता भी बढ़ती है। यही कारण है कि दुनिया भर की एयरोस्पेस कंपनियां लगातार नई कंपोजिट तकनीकों पर काम कर रही हैं।
संस्थान के मुताबिक प्रयोगशाला में किए गए परीक्षणों में विकसित कंपोजिट ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। ये परिणाम बताते हैं कि नया कंपोजिट पहले की तुलना में अधिक मजबूत होने के साथ-साथ क्षति का बेहतर तरीके से सामना कर सकता है।
एनआईटी के प्रोफेसर बंकिम चंद्र राय ने कहा कि यह तकनीक हल्के और मजबूत मटेरियल के जरिए ऊर्जा दक्षता बढ़ाने, रखरखाव लागत कम करने और सतत विनिर्माण को बढ़ावा देने में मदद करेगी। उनका कहना है कि उन्नत सामग्री के क्षेत्र में यह नवाचार भारत के आत्मनिर्भर भारत अभियान को भी मजबूती देगा।
शोध दल अब इस नई सामग्री का वास्तविक आकार की संरचनाओं पर परीक्षण करेगा और विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों में इसकी दीर्घकालिक टिकाऊपन का अध्ययन करेगा। साथ ही इस तकनीक को प्रयोगशाला से उद्योग तक पहुंचाने के लिए प्रौद्योगिकी लाइसेंसिंग और औद्योगिक साझेदारी पर भी काम शुरू कर दिया गया है।
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Created On :   31 July 2026 3:22 PM IST












