मध्य प्रदेश स्थापना दिवस: जब भोपाल को मिला राजधानी का ताज, तब जबलपुर में पसरा था सन्नाटा, लोगों ने क्यों नहीं मनाई थी दिवाली?

डिजिटल डेस्क, भोपाल। मध्य प्रदेश का स्थापना दिवस हर साल 1 नवंबर को मनाया जाता है। इसका गठन 1 नवंबर 1956 में हुआ था। इसके बाद से अब तक जबलपुर को इस बात का मलाल है कि वह राजधानी बनते-बनते रह गया था। यह बात वहां के निवासियों को आज भी चुभती है। जैसे ही भोपाल को राजधानी बनाने का ऐलान किया गया, वैसे ही जबलपुर में सन्नाटा पसर गया। ऐसे में समझते हैं कि जबलपुर को राजधानी नहीं बनाए जाने पर क्या-क्या हुआ?
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लोगों ने नहीं मनाई दिवाली
राजधानी के लिए भोपाल के नाम की घोषणा की गई थी। इसके कुछ दिन बाद भगवान श्रीराम के 14 वर्ष का वनवास पूरा होने की खुशी में दिवाली मनाई जाती है, लेकिन लोगों ने इसे भी नहीं मनाया था। हालांकि, जबलपुर में इस दौरान विधानसभा भवन के लिए जमीन भी जुटा ली गई थी। इतना ही नहीं, इसकी इमारत भी लगभग बनकर तैयार हो गई थी। लेकिन ये सभी बातें और बिल्डिंग अब इतिहास के पन्नों तक सीमित रह गई हैं।
मध्य भारत में ये इलाके थे शामिल?
वर्ष 1956 से पहले तक मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के नागपुर समेत कुछ भाग एक ही प्रदेश का हिस्सा हुआ करते थे। इसे मध्य भारत के नाम से पहचाना जाता था। साल 1956 में राज्य के पुनर्गठन की मांग उठने लगी। इसके लिए बाकायदा कमेटी का गठन किया गया। इसी कमेटी ने पूरी पृष्ठभूमि तैयार की। इस दौरान नागपुर को महाराष्ट्र की सीमा में शामिल कर दिया गया।
हालांकि, मध्य भारत का कार्यालय नागपुर में ही था। यहीं से सारे कामकाज हुआ करते थे। लेकिन जब मध्य प्रदेश अलग राज्य बना, तो इसकी राजधानी बनाने की भी बात सामने आई। इस दौरान जबलपुर के अलावा कई शहरों के नामों पर चर्चा होने लगी।
जबलपुर का नाम सबसे आगे क्यों?
जब जबलपुर को राजधानी बनाने की बात सामने आई, तो इस दौरान कई शहरों ने दावेदारी की थी। हालांकि, नागपुर के नजदीक जबलपुर शहर ही था। इससे लोगों की उम्मीदें बढ़ गई थीं कि अब मध्य प्रदेश की राजधानी जबलपुर ही बनने वाली है। लेकिन इस रेस में भोपाल और ग्वालियर का नाम भी काफी आगे चल रहा था। इनमें सबसे ऊपर जबलपुर का ही नाम था।
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ऐसा इसलिए था क्योंकि यह नर्मदा किनारे बसा सबसे बड़ा शहर था। यह अंग्रेजों का गढ़ भी रह चुका था। इसके अलावा यहां डिफेंस की फैक्ट्रियां थीं और बड़ी-बड़ी इमारतें बनी हुई थीं। नेताजी सुभाष चंद्र बोस को भी इसी शहर की सेंट्रल जेल में बंद किया गया था।
खास बात यह भी है कि आजादी से पहले टाउन हॉल में पहली बार यहीं पर झंडा फहराया गया था। इसके अलावा यहां हाईकोर्ट भी था। यानी कुल मिलाकर जबलपुर की दावेदारी काफी मजबूत थी। इसके बावजूद उसकी उम्मीदों पर पानी फिर गया।
लोगों का गुस्सा कैसे हुआ शांत?
जब राजधानी के लिए भोपाल शहर के नाम का ऐलान हुआ, तो इसके बाद जबलपुर के लोगों में काफी गुस्सा देखने को मिला था। इसका नजारा दिवाली पर भी देखने को मिला था। शहरवासियों ने दिवाली तक नहीं मनाई थी। हालांकि, सरकार ने लोगों के गुस्से को शांत करने के लिए भरपूर कोशिश की और काफी हद तक सफल भी रही।
आचार्य विनोबा भावे ने जबलपुर शहर को संस्कारधानी का नाम दिया। इसके साथ ही शहर को न्यायधानी के नाम से भी पहचान मिली। यहीं से प्रदेश के सभी कानूनी काम हाईकोर्ट के माध्यम से शुरू हुए। इसके अलावा शहर के गोलबाजार में मौजूद शहीद स्मारक भवन को विधानसभा भवन के रूप में तैयार किया गया था। इसे लगभग तैयार भी कर दिया गया था। इसे वल्लभ भवन की तरह ही बनाया गया था। लेकिन इन तमाम घटनाक्रमों के बाद भी जबलपुर राजधानी नहीं बन पाया।
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