दैनिक भास्कर हिंदी: ये रेस्टारेंट है अपने आप में है खास, इशारों में हो जाते हैं आर्डर पास

February 13th, 2018

डिजिटल डेस्क,नागपुर।  संतरानगरी में एक रेस्टोरेंट ऐसा है जहां काम करने वाले बोल नहीं सकते, सुन भी नहीं सकते फिर भी यहां इशारों में आर्डर पास हो जाते हैं।  रेस्टोरेंट में आने वाले लोगों खास अहसास लेकर वापस जाते हैं। यहां ऑर्डर देने के लिए बोलना नहीं पड़ता, सिर्फ इशारा करना होता है।  रेस्टोरेंट के ऑनर आकाश रामटेके का कहना है कि उनका एक दोस्त बधिर था, उसी से प्रेरणा मिली। समाज के लिए कुछ करने की सोचा। जब रेस्टोरेंट की शुरुआत कर रहे थे, तब प्लान था कि कुछ अलग करना है। 
मूक भाषा में बुकलेट
इसे ‘द टॉकिंग हैंड साइन टू वन’ कहते हैं। यहां खाने का अॉर्डर देने से लेकर बिलिंग तक के सारे काम सिर्फ इशारों में ही किए जाते हैं। रेस्त्रां की खासियत यह हैं कि यहां के 10 कर्मचारी मूक-बधिर हैं। बोलने और सुनने में असमर्थ इन युवाओं की टीम ने ही रेस्त्रां में किचन, कैश, वेटर से लेकर पूरा मैनेजमेंट संभाल रखा है। रेस्त्रां में मेनू के साथ ही मूक भाषा के चिह्नों की बुकलेट रखी रहती है। खाने के दौरान ग्राहक को यदि कुछ मंगाना होता है, तो वह बुकलेट में से देखकर मूक भाषा से वेटर को समझाता है। इस तरह से ग्राहक और वेटर के बीच बेहतर संवाद कायम हो जाता है।

काफी समझदार हैं
आकाश बताते हैं कि ये दिव्यांग हमसे कहीं ज्यादा जिम्मेदार और समझदार हैं। मुझे शुरू में साइन लैंग्वेज नहीं आती ​थी, लेकिन इन्होंने ही हमें भी इस भाषा को सिखा दिया। ऐसे में अब कोई समस्या आ भी जाती है, तो वो लिख कर बता देते हैं। इससे भी खास बात ये है कि अब इस रेस्त्रां में दूसरे देशों के लोग भी आते हैं। रेस्त्रां में आने वाले इनसे साइन लैंग्वेज में कोई न कोई शब्द जरूर सीख कर जाते हैं। 

ताकि समाज के दोहरे रवैये का शिकार न होना पड़े
ये बच्चे इंडिपेंडेंट बनें, जिससे इन्हें समाज के दोहरे रवैये का शिकार न होना पड़े। यहां अभी दो शिफ्टों में दिव्यांग युवा काम कर रहे हैं। ये सभी 12वीं पास हैं। इन्हें सामान्य लोगों से भी अच्छी सैलरी दी जा जाती है। भविष्य में जब ये बच्चे बाहर जाएं, तो इन्हें भाषा की समस्या न हो। हमने शहर के कई होटेलों में बच्चों को रोजगार दिलवाया है। अाम्ही आमच्या आरोगय साठी गडचिरोली संस्था शिक्षित विकलांग युवाओं की मदद करती है। उन्हें विविध उद्योग समूहों में नौकरी दिलवाने व प्रशिक्षण देती है। अभी तक  250 युवाओं को रोजगार दिया गया है। नागपुर, बंगलुरु, इंदौर, पुणे जैसे शहरों में ये दिव्यांग काम कर रहे हैं। हमने इस संस्था की स्थापना 1985 में की थी। इसका उद्ेश्य आदिवासी, गरीब व महिला सशक्तिकरण के कार्य करना है। 
-डॉ. सतीश गोकुलवार, संस्थापक, 

इशारों में समझ लेते हैं आर्डर
हम युवा वेटर स्नातक और 12वीं पास हैं। अपने काम को अंजाम देने में जुट जाते हैं। चाय, कॉफी, खाने में मिर्च, नमक की मात्रा से लेकर सब कुछ इशारों ही इशारों में पूरा कर देते हैं। इशारों में नमस्कार, हाय-हैलो करते हैं। कोड पर उंगली रखिए या इशारों में समझाइए, ऑर्डर बुक होता चला जाएगा। 
-शेषराज स्टीवर्ड और कीर्ति, मूक बधिर कर्मचारी

लोग हमारी बातों को समझते हैं
मूक बधिर कर्मचारी साइन लैंग्वेज में बात करते हैं। लोग हमारी बातों को समझते हैं। हमारी मदद करते हैं। कभी िकसी तरह की कोई तकलीफ नहीं हुई। रेस्टोरेंट के मेनू के आइटम वर्कर्स को पहले दिखाया जाता है, फिर मूक भाषा में उनके नाम समझाते हैं। लोगों को अपने आर्डर के सामान आसानी से मिल जाते हैं। बेहतर तरीके से परोसा भी जाता है। जो भी यहां आता है उसे एक अलग ही अनुभव होता है। ये सभी दिव्यांग सामान्य लोगों से किसी भी प्रकार से कम नहीं हैं। मजाल है कि किसी के ऑर्डर में कोई कमी रह जाए।  
-सैयद मोमिन व सैयद आफरीन (ग्राहक)