मध्यप्रदेश स्थापना दिवस विशेष: बेगमों के भोपाल की राजधानी बनने की दिलचस्प कहानी, जबलपुर को ऐसे दी थी मात!

November 1st, 2021

डिजिटल डेस्क, भोपाल। राज्य पुनर्गठन आयोग ने राजधानी के लिए जबलपुर को अपनी पहली पसंद बताई थी, इसके बाद भी यह ताज भोपाल के सर जा चढ़ा। उस समय भोपाल में जबलपुर के मुकाबले ज्यादा भवन थे जो आगे चलकर सरकारी कार्य स्थल को बढ़ावा देते यहीं इसके राजधानी बनने की मुख्य वजह थी। 

1 नवंबर,1956 के दिन मध्य प्रदेश की स्थापना की गई थी। यह तारीख इस राज्य के वासियों के लिए बेहद खुशी का माहौल लेकर आई थी। मध्य प्रदेश की राजधानी बनाने का समय आ गया था और इस दौर में जबलपुर, भोपाल से आगे था। लेकिन कुछ कारणों की वजह से इसे यह मौका नहीं दिया गया। जबलपुर राजधानी बनने में सफल तो नहीं हुआ पर उसे हाईकोर्ट द्वारा दो खास उपहार दिए गए। इन उपहारों में शामिल था मप्र विद्युत मंडल और सेन्ट्रल लाइब्रेरी।

सरदार पटेल ने किया नेतृत्व
भारत के स्वतंत्रता में जबलपुर ने एक अहम रोल निभाया है, स्वाधीनता आंदोलन हो या कांग्रेस के झंडा आंदोलन की शुरुआत, दोनों में ही जबलपुर एक खास केंद्र के रूप में सामने आया था, स्वाधीनता आंदोलन को जोड़ देने के लिए हर एक बड़े नेता ने यहां दौरा किया था। हर पहलू में खरा उतरने वाले जबलपुर को राजधानी बनाने की प्रक्रिया शुरु कर दी गई थी, उसी समय सरदार पटेल को पता चला की भोपाल के नबाब हमीदुल्ला खान, हैदराबाद के निजाम के साथ मिलकर भारत में विभाजन करना चाहते हैं। यह देखते ही सरदार पटेल देश की अखंडता व सौहार्द को अपना मूल आधार बनाया और भोपाल को मध्यप्रदेश की राजधानी घोषित कर दिया।  

इस नाम से जाना जाता था जबलपुर
अपने साथ कई अहम पहलू समेटे जबलपुर एक ऐसा स्थान था जहां आजादी मिलनेसे पहले ही कमिश्नरी की स्थापना कई गई थी। जबलपुर 11 से 15 शताब्दी तक गढ़ा गोन्ड राज्य की राजधानी के रूप में स्थापित था। इस राज्य को गोंडा के राजा मदन शाह ने बसाया था। एक अच्छे वातावरण का प्रतीक था जबलपुर, जिसे देखते हुए अंग्रेजों ने अपनी तीन कम्पनियां वहां बसाई थी। इसका नाम उस समय सागर-नर्मदा टेरेटरी था। 1 अगस्त 1867 में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा चलाई गई पहली ट्रेन कोलकाता से इलाहाबाद के रास्ते जबलपुर आई थी।

कैसे रखा गया जबलपुर का नाम?

जबलपुर का नाम तीन बार बदला गया, जाबालि ऋषि इस जगह से जुड़े थे इसलिए इसका पहला नाम जाबालिपुरम था, कुछ समय बाद इसे झब्बलपुर किया गया और आखिर में जबलपुर। आचार्य विनोबा द्वारा इसे खास नाम 'संस्‍कारधानी' मिला था। 

राजधानी के रेस में थे यह शहर

राजधानी के लिए शहरों के बीच होड़ मची थी, सबसे पहला नाम ग्वालियर तो दूसरा नाम इंदौर का था। राज्य पुनर्गठन आयोग ने अपनी तरफ से जबलपुर का नाम साझा किया था, पर कुछ कमियों की वजह से भोपाल को यह सौभाग्य हासिल हुआ। बताया जाता है उस समय भोपाल में भवनों की संख्या ज्यादा थी इसलिए इसे उपयुक्त माना गया।