दैनिक भास्कर हिंदी: एट्रोसिटी एक्ट मामले में IAS अधिकारी को मिली राहत, कानून में संशोधन का मिला लाभ

October 20th, 2018

डिजिटल डेस्क, मुंबई। बांबे हाईकोर्ट ने जाति सूचक टिप्पणी के मामले में आपराधिक मामले का सामना कर रहे उल्हासनगर महानगरपालिका के पूर्व आयुक्त राजेंद्र निंबालकर को राहत प्रदान की है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से आईएएस अधिकारियों को सरंक्षण प्रदान करने के उद्देश्य से कानून में किए गए संसोधन के मद्देनजर यह राहत दी है। कानून में किए गए संसोधन के मुताबिक सक्षम प्राधिकरण के मंजूरी के बगैर मजिस्ट्रेट आईएस अधिकारियों के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का निर्देश नहीं दे सकता है।

पूर्व मनपा आयुक्त के खिलाफ आरपीआई (ए) के नगरसवेक भगवान भालेराव ने मैजिस्ट्रेट कोर्ट में शिकायत की थी। भालेराव की शिकायत के अनुसार उल्हासनगर महानगर पालिका के तत्कालिन मनपा आयुक्त ने उन्हें  3 जुलाई 2017 को अपमानित किया था। यहीं नहीं कई नगरसेवकों की मौजूदगी में जातिसूचक टिप्पणी भी की थी। भालेराव की शिकायत पर गौर करने के बाद मैजिस्ट्रेट ने पुलिस को मनपा आयुक्त निबंलाकर के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का द्वारा मामला दर्ज कर लिए जाने के बाद। इस मामले को रद्द किए जाने की मांग को लेकर निंबालकर ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। 

न्यायमूर्ति आरवी मोरे व न्यायमूर्ति भारती डागरे की खंडपीठ के सामने याचिका पर सुनवाई हुई। इस दौरान पूर्व मनपा आयुक्त निंबालकर की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक मुंदरगी ने कहा कि सरकार ने सीआरपीसी की धारा 197 में संसोधन किया है। जिसके तहत आईएएस अधिकारियों को संरक्षण प्रदान किया गया है। इसके तहत बगैर सक्षम प्राधिकरण की मंजूरी के मैजिस्ट्रेट आईएएस अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश नहीं दे सकता। इसके विपरीत भालेराव के वकील कनिष्क जयंत ने कहा कि तत्कालीन मनपा आयुक्त के खिलाफ विशेष कोर्ट ने मामला दर्ज करने का आदेश दिया था। इसके साथ ही उनके मुवक्किल के पास एक रिकार्डिंग भी मौजूद है, जिसमें तत्कालीन मनपा आयुक्त मेरे मुवक्किल को अपमानित करते हुए नजर आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस मामले में कोर्ट को संसोधन के तहत मिले सरंक्षण पर गौर नहीं करना चाहिए। क्योंकि इससे सामाजिक ताने-बाने पर असर पड़ेगा। इस पर खंडपीठ ने कहा कि हम सरकार द्वारा किए गए संसोधन से खुद को असहाय पाते हैं। यदि शिकायतकर्ता को मनपा आयुक्त के खिलाफ मुकदमा चलाना हो तो सक्षम प्राधिकरण से मंजूरी लाए। यह कहते हुए खंडपीठ ने तत्कालीन मनपा आयुक्त के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द कर दिया और उन्हें राहत प्रदान की। 
                   

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