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ससुराल से महिला पहुंची मायके, छोटी बहन ने ही कराया क्वारेंटाइन  

ससुराल से महिला पहुंची मायके, छोटी बहन ने ही कराया क्वारेंटाइन  

डिजिटल डेस्क, नागपुर।  दिन : 28 अप्रैल। स्थान : कौशल्या नगर। डेंटल हॉस्पिटल में जांच करवाने के बाद महिला अपने मायके क्या पहुंची, पड़ोसियों में सुगबुगाहट शुरू हो गई। पड़ोसियों का कहना था कि वह जिस इलाके में रहती है, वहां रोजाना कोरोना मरीज मिलने के कारण प्रशासन ने इलाके को सील किया है। ऐसी स्थिति में वह मायके क्यों आई? हालांकि कुछ देर बाद स्वास्थ्य विभाग का दल कौशल्या नगर पहुंचा और महिला को जांच के लिए मेडिकल अस्पताल ले गया। वहां उसकी सामान्य जांच की गई। कोरोना के लक्षण नहीं मिलने पर मायके वालों ने राहत की सांस ली, लेकिन पड़ोसियों की नाराजगी कम नहीं हुई। तीसरे दिन वे इस बात पर अड़ गए कि उसकी कोरोना टेस्ट करवाओ या फिर उसे ससुराल वापस भेज दो। 

पड़ोसी इस कदर नाराज हुए कि महिला के मायके के सामने से गुजरना तो दूर, बातचीत भी बंद कर दी। मायके वाले क्वारेंटाइन होने के डर से कोरोना टेस्ट से बचना चाहते थे। उनका कहना था कि जब सामान्य जांच में कोरोना के कोई लक्षण नहीं हैं, तो फिर कोरोना टेस्ट क्यों करवाए? लेकिन महिला की छोटी बहन को क्वारेंटाइन से बचने के लिए सचाई को छिपाना मंजूर नहीं था। उसे लगा कि सच को छुपाना भी बीमारी है। उसने पड़ोसियों से दो टूक में जवाब दिया। पड़ोसियों ने तुरंत मनपा को फोन कर दिया। तत्काल दो पुलिस कर्मियों के साथ मनपा का स्वास्थ्य विभाग का दल घर आ धमका और कहा कि पूरे परिवार को क्वारेंटाइन होना पड़ेगा। 30 मई की शाम करीब 5 बजे महिला को उसकी मम्मी, पापा और छोटी बहन के साथ रविभवन स्थित क्वारेंटाइन सेंटर ले जाया गया। वहां उन्हें दो कमरे दिए गए जिसमें सभी सुविधाएं मुहैया थीं। एक कमरे में दो लोगों को रहने की इजाजत थी। दूसरे दिन कोरोना टेस्ट के लिए बस से एमएलए होस्टल ले जाया गया। जांच के दौरान वहां और लोग होने के कारण संक्रमण की आशंका से उनके दिल की धड़कनें तेज हो गईं। थ्रोट स्वैब के नमूने लिए गए। तीसरे दिन रिपोर्ट निगेटिव आई तो खुशी से आंखें छलछला गईं। अल्लाह ने उनकी दुआएं जो कबूल कर ली थीं।

"क्वारेंटाइन सेंटर में रहना कोई सजा नहीं '
महिला की छोटी बहन के अनुसार क्वारेंटाइन सेंटर को लेकर उनके मन में जो खौफ था, वह धीरे-धीरे खत्म हो गया। भले ही कमरे में ही रहना था, लेकिन आवश्यकताओं का पूरा ध्यान रखा गया। चिकित्सकों की टीम 24 घंटे तैनात थी। 14 दिन तक एक ही कमरे में रहना आसान नहीं था। कमरे का दरवाजा खोलने की सख्त मनाही थी। मनोरंजन के कोई संसाधन नहीं थे। फोन के अलावा संपर्क का अन्य कोई साधन नहीं था। दोस्तों, परिचितों और रिश्तेदार फोन पर सभी हाल-चाल पूछते, हिम्मत बंधाते रहे, जिससे सेंटर में रहना आसान हो गया। क्वारेंटाइन को 14 दिन होने से 3 दिन पहले फिर एक बार जांच के लिए भेजा गया। दूसरी रिपोर्ट भी निगेटिव आई तो सभी के चेहरों पर मुस्कान आ गई।

घर जाने के लिए हरी झंडी मिल गई। घर तो लौट आए, लेकिन मम्मी-पापा नाराज थे, क्योंकि छोटी बेटी के कारण 14 दिन क्वारेंटाइन सेंटर में रहना पड़ा। दबाव बनाकर क्वारेंटाइन सेंटर में रहने पर मजबूर किया गया। मम्मी-पापा का कहना था कि जहां से बड़ी बेटी आई थी, वह इलाका प्रतिबंधित क्षेत्र से दूर था। वे यह बात समझ ही नहीं पा रहे थे कि  जरा-सी लापरवाही सब पर भारी पड़ सकती थी। क्वारेंटाइन सेंटर से लौटने के बाद पड़ोसियों का रवैया बेहद सहयोगात्मक रहा। संबंध फिर मधुर हो गए थे। हालांकि मम्मी-पापा से नाराज थे। पड़ोसियों ने कुछ दिन उनसे बात भी नहीं की। एक बार फिर 14 दिन घर में ही क्वारेंटाइन होना पड़ा। इस तरह करीब 1 माह गुजर गया और  धीरे-धीरे स्थिति सामान्य हो गई। पड़ोसियों ने महिला की छोटी बहन का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि तुम्हारी पहल से यह इलाका सील होने से बच गया। 
 

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