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कमजोर मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर वाला बिहार कैसे जीतेगा कोरोना से जंग ? राज्य में 69 % डॉक्टर, 92% नर्सों की कमी

कमजोर मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर वाला बिहार कैसे जीतेगा कोरोना से जंग ? राज्य में 69 % डॉक्टर, 92% नर्सों की कमी

डिजिटल डेस्क, पटना। बिहार में कोरोनावायरस से हालात बेकाबू हो चुके हैं। कोविड इंडिया वेबसाइट (covid19india.org) के आंकड़े बताते हैं कि पिछले 24 घंटे में बिहार में 12 हजार 604 नए कोरोना केस दर्ज़ किए गए। वहीं, बिगड़ती स्थिति को कंट्रोल करने में सरकार की 77 स्वास्थ्य योजनाएं शून्य साबित हो रही हैं। अब तक 94 हज़ार से ज्यादा मामले दर्ज होने के बाद भी सरकार की नींद नहीं खुली। स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार बिहार में सिर्फ़ 2 करोड़ लोगों की कोरोना टेस्टिंग हुई है। जो कुल जनसंख्या का आधा भी नहीं है। कोरोना की दूसरी लहर बिहार सरकार की नाकामी को दिखा रही है। अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि कमजोर मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर वाला बिहार कैसे जीतेगा कोरोना से जंग ? राज्य में 69 % डॉक्टर, 92% नर्सों की कमी है। ऐसे में स्वास्थ व्यवस्थाओं पर सवाल उठना लाजमी हैं। 

सरकार दोहरे बोल
जहां एक तरफ स्वास्थ्य मंत्री यह बताने से चूक नहीं रहे कि राज्य में पर्याप्त मात्रा में डॉक्टर है। लेकिन सच्चाई इसके विपरित है। 3 मार्च 2021 को बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने विधानसभा में बजट पर बहस के दौरान बताया था कि बिहार में 12 करोड़ की जनसंख्या पर कुल 1 लाख 19 हज़ार डॉक्टर मौजूद हैं। डब्ल्यूएचओ के अनुसार 12 करोड़ पर 1 लाख 20 हज़ार डॉक्टरों की नियुक्ति होनी चाहिए।

स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि बिहार ने डब्ल्यूएचओ के मानक को लगभग पूरा कर लिया है। राज्य में अभी 40 हज़ार 200 एलोपैथिक डॉक्टर, 33 हज़ार 922 आयुष, 34 हज़ार 257 होमियोपैथिक, 5 हज़ार 203 यूनानी 6 हज़ार 130 डेंटिस्ट मौजूद हैं। उन्होंने आगे कहा कि बिहार में सिर्फ़ 1 हज़ार डॉक्टरों की कमी है, डब्ल्यूएचओ के मानकों के अनुसार। सरकार स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारने के लिए 11 नए मेडिकल कॉलेज खोलने जा रही है।

वहीं, कोरोना के दौरान सरकार की यह बात झूठी नज़र आ रही हैं। बिहार में मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर एवं डॉक्टरों की भारी कमी है। इसका अंदाजा आप इन आकंड़ो से लगा सकते है। CAG की रिपोर्ट के अनुसार बिहार में 69 प्रतिशत पोस्ट डॉक्टर और 92 प्रतिशत पोस्ट नर्स के लिए खाली है। नीति आयोग ने इस बात पर तवज्जो देते हुए कहा कि बिहार में मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर और सुविधाएं बहुत कमजोर है। बिहार सरकार ने पिछले 10 सालों में 11 मेडिकल कॉलेज, 61 नर्सिंग ट्रेनिंग इस्टीट्यूट और एक डेंटल कॉलेज खोलने की घोषणा की थी पर वास्तव में 2 मेडिकल कॉलेज और 2 नर्सिंग ट्रेनिंग इस्टीट्यूट खुल पाए है। वहीं, 56 प्रतिशत मेडिकल टीचिंग स्टाफ की जरुरत है। 

बिहार के अस्पतालों की स्थिति 
बिहार में अस्पतालों की स्थिति इतनी खस्ता है, कि कैंसर से लेकर कोरोना के मरीज, एक ही अस्पताल में इलाज कराने को मजबूर है। मरीजों की जनसंख्या दिन- प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। बिहार के प्रसिद्ध NMCH अस्पताल के कंट्रोलरुम में फोन की घंटिया दिन-रात बज रही है पर डॉक्टर समय से वार्ड में नहीं पहुंच रहे है। मेडिसिन, इमरजेंसी, ICU समेत अन्य वार्डो में भर्ती कोरोना मरीज एवं उनके परिजन फोन पर अपील कर रहे है कि हालत बिगड़ रही है डॉक्टर को भेज दीजिए पर इमरजेंसी तक डॉक्टर नहीं पहुंच रहे है। केवल नर्स की मौजूदगी में वार्ड को छोड़ दिया गया।

गुणा-भाग कर लाए जा रहे है बेड
बिहार के स्वास्थ्य प्रधान सचिव प्रत्यय अमृत बेड के लिए रोज गुणा-भाग करने को मजबूर है। 15 अप्रैल तक बिहार के ज़्यादातर सरकारी अस्पतालों में बेड की संख्या बढ़ाई गई। पहले जहां PMCH में 80 बेड कोरोना संक्रमितों के लिए रिजर्व थे। अब उनकी संख्या बढ़ा कर 120 कर दी गई है। इसके अलावा राज्य के अन्य अस्पतालों में भी बेड की संख्या बढ़ाने के लिए निर्देश दिए गए है। पटना एम्स में 30, IGIMS में 50, NMCH में 40 पर जिस हिसाब से मरीजों की संख्या बढ़ रही है। उससे साफ़ है कि सरकार ने पिछले एक साल में कोरोना से कोई सीख नहीं ली। 

10 करोड़ से ऊपर की आबादी पर 2 करोड़ की टेस्टिंग
2011 की रिपोर्ट के अनुसार बिहार की कुल जनसंख्या 10 करोड़ 41 लाख थी। अभी तक कुल 66 लाख 62 हजार 906 लोगों को वैक्सीन की दोनों डोज लग चुकी है। पहली डोज लगवाने वाले कुल 56 लाख 87 हजार 362 हैं, वहीं दूसरी डोज की संख्या 9 लाख 75 हजार 544 है। इतनी बड़ी जनसंख्या में सिर्फ़ 66 लाख लोगों को वैक्सीन की डोज लगी है। अगर टेस्टिंग की बात की जाए तो कुल 2 करोड़ 6 लाख लोगों की टेस्टिंग हुई है। 10 करोड़ से ऊपर की आबादी में कुल दो करोड़ लोगों की टेस्टिंग हो पाई है। सरकार की नाकामी इसमें साफ़ नज़र आ रही है। 

योजनाएं जिन पर अमल नहीं किया गया
2020 में बिहार में विधानसभा चुनाव थे, इस दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने रैलियों में स्वास्थ्य को लेकर कई वादे किए थे पर इनमें से एक भी अमल नहीं हो पाए है। उन्होंने 2 हज़ार 814 करोड़ के स्वास्थ्य योजनाओं का उद्घाटन किया था। नीतीश कुमार ने शिलान्यास करते वक्त कहा था कि मुजफ्फपुर में चमकी बुखार से जूझ रहे बच्चों के लिए यह ज़रुरी है। 2006 से पहले बिहार में अस्पताल तो थे मगर आम जनता इलाज करवाने से डरती थी लेकिन आज जब वो इलाज के लिए अस्पतालों का रुख कर रही है। आज जब जनता अस्पतालों का रुख कर रही है तो डॉक्टर घबरा रहा हैं क्योंकि अस्पताल में मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर काफ़ी कमजोर है। अस्पताल इतनी भीड़ को संभलाने में असफल है। इस दौरान हमने जाना कि राज्य में सरकार ने किस तरह की व्यवस्था की है कोरोना को हराने के लिए।

प्राइवेट अस्पताल में जांच
15 अप्रैल तक कोरोना वायरस के बढ़ते कहर को देखते हुए जिला प्रशासन ने 14 प्राइवेट अस्पतालों को कोविड- 19 से पीड़ित मरीजों का इलाज करने की इज़ाजत दी थी। उसके बाद प्रशासन ने 33 और प्राइवेट अस्पतालों को पंजीकृत किया था। उस वक्त तक बिहार में कुल 47 अस्पताल कोविड- 19 के मरीजों का इलाज कर रहा था लेकिन 27 अप्रैल को सरकार ने 90 प्राइवेट अस्पतालों की एक सूची जारी की है। 

कोविड रिजर्व प्राइवेट अस्पताल

  • श्यान मल्टी स्पेशलिटी
  • आनंदिता हॉस्पिटल
  • एमएस हॉस्पिटल
  • आयुष्मान केयर हॉस्पिटल
  • सत्यदेव सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल
  • पाम व्यू हॉस्पिटल
  • मनोकामना सीसी एंड ई हॉस्पिटल
  • श्याम हॉस्पिटल
  • सत्यम हॉस्पिटल
  • सन हॉस्पिटल
  • कुर्जी होली फैमिली
  • तारा हॉस्पिटल एंड मेडिकल रिसर्च
  • एमआर हॉस्पिटलॉ
  • सत्यव्रत हॉस्पिटल

इन सरकारी अस्पतालों में हो रही है कोरोना जांच

  • पीएमसीएच
  • आईजीआईएमएस
  • जीजीएच पटना सिटी
  • न्यू गार्डिनर
  • एलएनजेपी
  • गर्दनीबाग अस्पताल
  • रुबन
  •  पारस
  • मेडिबर्सल
  • आयुर्वेदिक कॉलेज
  • जयप्रभा

96.34 से गिरकर 77.43 पर पहुंचा रिकवरी रेट
स्वास्थ्य विभाग द्वारा बताया गया कि बिहार में संक्रमण का दर दिन- प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। वहीं, रिकवरी रेट में लगातार कमी आ रही है। राज्य में रिकवरी दर घटकर 77.43 हो गई है। स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार पिछले साल बिहार में 96.34 प्रतिशत रिकवरी रेट थी। पिछले साल के मुक़ाबले इस साल हालात ज़्यादा खराब है। बिहार में एक साल के दौरान राज्य में 2 लाख 28 मरीज मिले हैं, वहीं 3 लाख 31 हज़ार ठीक हो चुके है। वहीं मरने वालों की संख्या 2307 है।

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छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद का खात्मा ठोस रणनीति से संभव - अभय तिवारी

छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद का खात्मा ठोस रणनीति से संभव - अभय तिवारी

डिजिटल डेस्क, भोपाल। 21वीं सदी में भारत की राजनीति में तेजी से बदल रही हैं। देश की राजनीति में युवाओं की बढ़ती रूचि और अपनी मौलिक प्रतिभा से कई आमूलचूल परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। बदलते और सशक्त होते भारत के लिए यह राजनीतिक बदलाव बेहद महत्वपूर्ण साबित होगा ऐसी उम्मीद हैं।

अलबत्ता हमारी खबरों की दुनिया लगातार कई चहरों से निरंतर संवाद करती हैं। जो सियासत में तरह तरह से काम करते हैं। उनको सार्वजनिक जीवन में हमेशा कसौटी पर कसने की कोशिश में मीडिया रहती हैं।

आज हम बात करने वाले हैं मध्यप्रदेश युवा कांग्रेस (सोशल मीडिया) प्रभारी व राष्ट्रीय समन्वयक, भारतीय युवा कांग्रेस अभय तिवारी से जो अपने गृह राज्य छत्तीसगढ़ से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से अपनी राय रखते हैं और छत्तीसगढ़ को बेहतर बनाने के प्रयास के लिए लामबंद हैं।

जैसे क्रिकेट की दुनिया में जो खिलाड़ी बॉलिंग फील्डिंग और बल्लेबाजी में बेहतर होता हैं। उसे ऑलराउंडर कहते हैं अभय तिवारी भी युवा तुर्क होने के साथ साथ अपने संगठन व राजनीती  के ऑल राउंडर हैं। अब आप यूं समझिए कि अभय तिवारी देश और प्रदेश के हर उस मुद्दे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगातार अपना योगदान देते हैं। जिससे प्रदेश और देश में सकारात्मक बदलाव और विकास हो सके।

छत्तीसगढ़ में नक्सल समस्या बहुत पुरानी है. लाल आतंक को खत्म करने के लिए लगातार कोशिशें की जा रही है. बावजूद इसके नक्सल समस्या बरकरार है।  यह भी देखने आया की पूर्व की सरकार की कोशिशों से नक्सलवाद नहीं ख़त्म हुआ परन्तु कांग्रेस पार्टी की भूपेश सरकार के कदम का समर्थन करते हुए भारतीय युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय कोऑर्डिनेटर अभय तिवारी ने विश्वास जताया है कि कांग्रेस पार्टी की सरकार एक संवेदनशील सरकार है जो लड़ाई में नहीं विश्वास जीतने में भरोसा करती है।  श्री तिवारी ने आगे कहा कि जितने हमारे फोर्स हैं, उसके 10 प्रतिशत से भी कम नक्सली हैं. उनसे लड़ लेना कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन विश्वास जीतना बहुत कठिन है. हम लोगों ने 2 साल में बहुत विश्वास जीता है और मुख्यमंत्री के दावों पर विश्वास जताया है कि नक्सलवाद को यही सरकार खत्म कर सकती है।  

बरहाल अभय तिवारी छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री बघेल के नक्सलवाद के खात्मे और छत्तीसगढ़ के विकास के संबंध में चलाई जा रही योजनाओं को जन-जन तक पहुंचाने के लिए निरंतर काम कर रहे हैं. ज्ञात हो कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने यह कई बार कहा है कि अगर हथियार छोड़ते हैं नक्सली तो किसी भी मंच पर बातचीत के लिए तैयार है सरकार। वहीं अभय तिवारी  सर्कार के समर्थन में कहा कि नक्सली भारत के संविधान पर विश्वास करें और हथियार छोड़कर संवैधानिक तरीके से बात करें।  कांग्रेस सरकार संवेदनशीलता का परिचय देते हुए हर संभव नक्सलियों को सामाजिक  देने का प्रयास करेगी।  

बीते 6 महीने से ज्यादा लंबे चल रहे किसान आंदोलन में भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अभय तिवारी की खासी महत्वपूर्ण भूमिका हैं। युवा कांग्रेस के बैनर तले वे लगातार किसानों की मदद के लिए लगे हुए हैं। वहीं मौजूदा वक्त में कोरोना की दूसरी लहर के बाद बिगड़ी स्थितियों में मरीजों को ऑक्सीजन और जरूरी दवाऐं निशुल्क उपलब्ध करवाने से लेकर जरूरतमंद लोगों को राशन की व्यवस्था करना। राजनीति से इतर बेहद जरूरी और मानव जीवन की रक्षा के लिए प्रयासरत हैं।

बहरहाल उम्मीद है कि देश जल्दी करोना से मुक्त होगा और छत्तीसगढ़ जैसा राज्य नक्सलवाद को जड़ से उखाड़ देगा। देश के बाकी संपन्न और विकासशील राज्यों की सूची में जल्द शामिल होगा। लेकिन ऐसा तभी संभव होगा जब अभय तिवारी जैसे युवा और विजनरी नेता निरंतर रणनीति के साथ काम करेंगे तो जल्द ही छत्तीसगढ़ भी देश के संपन्न राज्यों की सूची में शामिल होगा।