दैनिक भास्कर हिंदी:  ‘फुटाला तालाब’ में ऑक्सीजन की मात्रा बेहद घटी, विसर्जन से बढ़ा प्रदूषण

September 30th, 2018

डिजिटल डेस्क, नागपुर। तमाम उपायों के बावजूद महानगर के नैसर्गिक तालाबों को प्रतिमा विसर्जन के कारण अच्छा खासा नुकसान पहुंचा है। ऑक्सीजन, मटमैलापन का प्रमाण व अम्लता जैसे मानकों में  परिवर्तन हुए हैं। फुटाला तालाब पर सबसे ज्यादा असर दिखाई दे रहा है। यहां ऑक्सीजन का प्रमाण 5 मिलीग्राम प्रति लीटर से घटकर 2.5 रहने की आशंका व्यक्त की जा रही है। प्रदूषण नियंत्रण विभाग के अनुसार, जलीय जीव जंतुओं के लिए पानी में ऑक्सीजन की मात्रा 4 मिलीग्राम से अधिक होनी चाहिए। 

फुटाला सबसे ज्यादा प्रभावित
फुटाला तालाब की बात करें तो विसर्जन के पूर्व यहां ऑक्सीजन का प्रमाण 5 मिलीग्राम प्रति लीटर पहुंच गया था। पर्यावरणविद् इसे अच्छा संकेत मान कर चल रहे थे, लेकिन विसर्जन के बाद ऑक्सीजन का प्रमाण घटकर 2.5 मिलीग्राम प्रति लीटर तक पहुंचने की आशंका जताई जाने लगी है। सतह की स्थिति और भी भयावह हो सकती है। 

होना यह चाहिए 
जलीय जीवों के लिए पानी में ऑक्सीजन का प्रमाण 4-6 मिलीग्राम बेहतर माना जाता है। 

ऐसी स्थिति इसलिए 
तालाबों की यह स्थिति फेंके गए निर्माल्य से हुई, जो अब सड़ने लगा है। अब बायोड्रिग्रेडेशन होकर अनएरोबिक कंडीशन बन रही है।
इन प्रतिमाओं पर इनैमल पेंट भी किया जाता है, जिसमें कई खतरनाक रसायन, भारी धातु सीसे के यौगिक होते हैं। याद रहे, इसी सीसे की मात्रा को लेकर मैगी के उत्पाद पर बवाल हुआ था।   

जलीय जीवों के लिए खतरनाक स्थिति
ग्रीन विजिल संस्था के कौस्तुभ चटर्जी कहा कहना है कि जल्द ही सफाई नहीं होने पर ऑक्सीजन का प्रमाण कम होकर 2.5 मिली ग्राम प्रति लीटर पहुंच जाएगा और जलीय जीवों के लिए यह काफी खतरनाक स्थिति हो सकती है।  

टैंक होने से अपेक्षाकृत कम हुआ है प्रदूषण
डॉ. पवन, वाटर टेक्नोलॉजी और मैनेजमेंट के मुतबिक कृत्रिम टैंक बनाने व जागरूकता के चलते प्रदूषण उतना नहीं हुआ, जितना आमतौर पर हो जाता था। हां, डायरेक्ट विसर्जन करने से नैसर्गक  तालाबों में ऑक्सीजन लेवल में कमी आई है। मिट्टी व केमिकल मिलने से पानी पर प्रभाव पड़ता ही है। 

5000 मूर्तियों का विसर्जन हुआ
एक एनजीओ की रिपोर्ट की अनुसार, इस वर्ष शहर के मुख्य तालाबों फुटाला, अंबाझरी और सक्करदरा को मिलाकर लगभग 5000 मूर्तियों का विसर्जन हुआ है। इसमें घरेलू मूर्तियां भी शामिल हैं।

किसी भी हालत में यह खतरनाक

  • विसर्जन बाद पानी में क्रोमियम, तांबा, निकेल, जस्ता, लोहा और आर्सेनिक जैसी भारी धातुओं का अनुपात भी बढ़ जाता है। 
  • मूर्तियों पर लगे केमिकल से बने रंगों के कारण जहरीले तत्व पानी में घुल जाते हैं। इसके अलावा प्लास्टर ऑफ पेरिस भी प्रमुख घटक है। 
  • मूर्तियों पर जो पेंट किया जाता है, वह मर्करी और लेड से निर्मित होता है, जो कि खतरनाक होता है।   
  • मूर्तियों पर चढ़ाई सामग्री से प्रदूषण काफी बढ़ जाता है, तत्काल प्रभाव से ऑक्सीजन कम हो जाता है।
  • पानी में ऑक्सीजन की मात्रा कम और भारी खनिज तत्व जैसे लोहा, तांबा आदि की मात्रा बढ़ गई है।
  • प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी मूर्तियों को पूरी तरह से विघटित होने वर्षों तक का समय लग सकता है।

जल्द ही रिपोर्ट सामने आएगी
एमपीसीबी के अधिकारी राकेश वानखेड़े ने बताया कि कृत्रिम तालाबनुमा गड्ढे बनाए गए थे, लेकिन कुछ उत्साही लोगों ने मूर्तियां सीधे तालाबों में विसर्जित कीं। इस वजह से पानी में अॉक्सीजन लेवल में कमी आई है। हमने नमूने लिए हैं और जल्द ही रिपोर्ट सामने आएगी। 

 

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